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21 जनवरी, 2020|2:00|IST

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भाजपा के राजनीतिक विमर्श की परीक्षा

झारखंड विधानसभा चुनाव न केवल इस राज्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि इस समय देश में जो राजनीतिक स्थितियां हैं, उनकी वजह से यह चुनाव पूरे देश के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गया है। झारखंड विधानसभा चुनाव दो महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं के कुछ ही समय बाद हो रहा है। ये दो सामाजिक-राजनीतिक घटनाएं हैं- राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सवार्ेच्च न्यायालय का फैसला और महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी का सरकार बनाने की कोशिश में नाकाम होना। और साथ ही शरद पवार की राजनीतिक छाया तले महाराष्ट्र में विपक्ष का सफल और ताकतवर होकर उभरना भी अहम है। इन दोनों बड़ी घटनाओं से जनमानस पर जो असर हुआ है, झारखंड का चुनाव उसकी परख करेगा। यह पता चलेगा कि लोगों के मन में भाजपा के प्रति क्या भाव हैं? ये दोनों घटनाएं चुनाव में कहीं न कहीं अंतर्विरोधी प्रभाव भी पैदा कर सकती हैं। एक घटना भाजपा को मजबूत कर सकती है, तो दूसरी भाजपा के लिए नकारात्मक प्रभाव पैदा कर सकती है।

झारखंड मूलत: आदिवासी, प्रवासी और सदान (गैर आदिवासी स्थानीय निवासियों) की आबादी वाला राज्य है। सदान में मूलत: पिछड़ी जातियों की आबादी चुनावी रूप से काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है। बिहार, छत्तीसगढ़ और देश के अन्य भागों से कोयले और अन्य उद्योगों में काम करने के साथ व्यवसाय व व्यापार करने के लिए बड़ी संख्या में प्रवासी यहां आए और बसे हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में एक लोकगीत गाया जाता है, फेंक देले थरिया, बलम गइले झरिया, पहुंचले कि ना।  यानी बिहार और उत्तर प्रदेश में आर्थिक तनावों से मुक्ति के लिए लोग प्रवासी बनकर झारखंड जाते रहे हैं। झारखंड की खदान या खनिज आधारित अर्थव्यवस्था लंबे समय से रोजगार देती रही है। बाहर से झारखंड आने का यह क्रम अंग्रेजों के जमाने से ही चला आ रहा है।

इस चुनाव में भाजपा अपने राष्ट्रीय मुद्दों जैसे राम जन्मभूमि, अनुच्छेद 370 और 35ए की समाप्ति, तीन तलाक वगैरह के साथ मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यकाल में किए गए विकास कार्यों और डबल इंजन सरकार जैसे मुद्दों को मिलाकर अपना चुनावी-विमर्श विकसित कर रही है। टिकट वितरण में सामाजिक गणित का ध्यान सभी दलों की तरह भाजपा की भी रणनीति का हिस्सा है। वहीं झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल का संयुक्त विपक्ष अशिक्षा, बेरोजगारी, कुपोषण जैसे स्थानीय मुद्दों के आधार पर भाजपा के खिलाफ लड़ रहा है। जल-जंगल और जमीन की सुरक्षा का मुद्दा तो यहां हमेशा कारगर रहा है। पर्यावरण भी मतदाताओं के एक वर्ग और कुछ राजनीतिक दलों की चिंताओं में शामिल है।

मुद्दों के टकराव के बावजूद इस बार के झारखंड चुनाव में आदिवासी, जनजातीय मतों का झुकाव चुनावी नतीजे तय करने में बड़ी भूमिका निभाएगा। आदिवासियों में कई तरह का असुरक्षा बोध दिखाई पड़ता है। उन्हें बाहर से आए सामाजिक समूहों से उभरे नेतृत्व पर विश्वास करने में समय लगता है। दूसरा, इनके बीच सत्ता प्रतिरोध से उभरे पत्थलगड़ी आंदोलन भी इस चुनाव में आदिवासी मतों की दिशा तय करने में भूमिका निभा सकता है। साथ ही, छोटा नागपुर और संथाल परगना टेनेन्सी ऐक्ट में परिवर्तन की भाजपा सरकार की नाकाम कोशिश ने भी उनके बीच एक असुरक्षा बोध पैदा किया है। अब देखना यह है कि जनजातीय समूहों के एक भाग के बीच उभरे इन असुरक्षा बोध के तत्वों का क्या राजनीतिक अर्थ निकलता है।

राष्ट्र्रीय स्वयंसेवक संघ और इनके संबद्ध संगठन भी जमीन पर काफी प्रभावी ढंग से सक्रिय हैं। आदिवासियों के बीच असुरक्षा बोध के प्रभावों को कम करने की दिशा में इनके प्रयास जारी हैं। यह भी ठीक है कि यहां आदिवासी मत एक ही तरफ नहीं झुकते हैं। सामुदायिक और धार्मिक आधार पर आदिवासियों के राजनीतिक निर्णय कई बार अलग-अलग भी होते हैं। देखना है कि आदिवासी मत इस बार किस रूप में इस चुनाव में अपनी भूमिका निभाते हैं? सदान मतों का सबसे प्रभावी महतो समुदाय भी भाजपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजसू में विभाजित हो सकता है। प्रवासियों का मत विभिन्न स्थानीय और अपने-अपने सामाजिक संबंधों से तय हो सकते हैं।

झारखंड चुनाव में भाजपा अपने संगठन के अंतर्विरोध से उभरती हुई स्थितियों को अपने पक्ष में करने में लगी है। उसके सामने विपक्ष विभाजित है। बहुकोणीय संघर्ष अनेक क्षेत्रों में दिख रहा है। इसका फायदा भाजपा को हो सकता है। पर उसकी सबसे बड़ी मुश्किल है, अपने सामाजिक आधारों को बचाए रखना और चुनावी रूप से उन्हें मजबूत करना। झारखंड के चुनाव हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह अगर भाजपा को आशानुकूल परिणाम नहीं देते हैं, तो इससे भाजपा के भविष्य की चिंताएं काफी बढ़ जाएंगी। इसके विपरीत भाजपा इस चुनाव में अगर प्रभावी विजय पा लेती है, तो यहां चुनाव उसके गले की विजयमाला में एक और सुगंधित फूल बनकर गुंथ जाएगा। गौर करने की बात है कि पहले 16 राज्यों में भाजपा की सरकार थी। अब उसके राज्य धीरे-धीरे कम होते जा रहे हैं। झारखंड अगर बचा, तो उसके हाथ से राज्यों के निकलते जाने की प्रक्रिया थमेगी।

महाराष्ट्र चुनाव एक तरफ शहरी मध्य वर्ग, नौकरीपेशा वर्ग की निहित चाहतों का चुनाव था, तो दूसरी तरफ झारखंड चुनाव आदिवासी उपेक्षित जनों की आकांक्षाओं का भी चुनाव होगा। पिछड़े समूहों के कृषक भी इस चुनाव से अपने बेहतर भविष्य की राह देख रहे हैं। बच्चों का कुपोषण यहां की एक बड़ी समस्या है, शिक्षा की स्थिति भी कोई बहुत बेहतर नहीं हो पाई है। यह ठीक है कि ये मुद्दे भी जनता के एक वर्ग के दिमाग में राजनीतिक विकल्प तय करने में कहीं न कहीं होते हैं, पर अनेक किस्म के सामाजिक संबंध, अस्मिता बोध दलों की सांगठनिक मजबूती, विपक्ष की स्थिति, मतों का विभाजन, ये सब मिलकर झारखंड चुनाव में जीत-हार की दिशा तय करेंगे।

इस चुनाव में कोई भी हारे या जीते, लेकिन जनतंत्र में गरीबों, उपेक्षितों और आदिवासियों की चाहत व आकांक्षा बनी रहेगी। देखना यह है कि हमारे राजनीतिक दल इन आकांक्षाओं को कितनी ईमानदारी से महत्व देते हैं। एक साथ बने छोटे राज्यों में झारखंड को विकास के क्रम में छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड की तुलना में अपनी बेहतरी भी सिद्ध करनी है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 12th December