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24 जनवरी, 2020|1:46|IST

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सताए हुए लोगों के साथ खड़े होना

harbansh dixit  legal expert

नागरिकता अधिनियम में संशोधन विधेयक पर संसद और उसके बाहर बहस छिड़ गई है। सरकार इस विधेयक को पारित कराना चाहती है, जबकि बहुत सारे लोग इसे संविधान विरोधी मानते हैं। इसमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से विस्थापित हिंदू, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख और पारसी समुदाय के लोगों को नागरिकता देने की व्यवस्था है। विधेयक में कहा गया है कि जो लोग भारत में 31 दिसंबर, 2014 या उससे पहले आ चुके हैं और भारत में पांच वर्ष तक रह चुके हैं, उन्हें गैर-कानूनी आब्रजक नहीं समझा जाएगा। उन्हें नागरिकता पाने का अधिकार मिलेगा। कई विपक्षी दल तथा देश में बहुत से लोग इसे संविधान विरोधी कह रहे हैं। उनका तर्क है कि यह संविधान के अनुच्छेद 25 में उपलब्ध आस्था के अधिकार तथा अनुच्छेद 21 में प्राप्त दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। कुछ लोग इसे मुस्लिमों के साथ भेदभाव मानते हैं, क्योंकि उन्हें इस विधेयक में मिलने वाले अधिकार से वंचित रखा गया है। उनकी मान्यता है कि यह समता के मूल अधिकारों का उल्लंघन है।

समानता का नियम कोई जड़ अवधारणा नहीं है। न्याय के दूसरे सिद्धांत की तरह इसमें भी विकास होता रहता है। देश-काल, परिस्थितियों के मुताबिक इसमें संशोधन होता रहता है। किसी वर्ग के साथ यदि जाति के आधार पर भेदभाव होता है, तो समानता का सिद्धांत अपने पारस्परिक दायरे से बाहर निकल उसे समाज के दूसरे लोगों के बराबर लाने के लिए आरक्षण के सिद्धांत को समाहित कर लेता है। शासन-व्यवस्था में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15 व 16 में विशेष उपबंध बनाए गए। महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को समाप्त करने, उन्हें सुरक्षा देने और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सकारात्मक पहल की जरूरत थी, क्योंकि सदियों से उनके साथ भेदभाव किया गया। हमारे संविधान में उनके लिए भी विशेष उपबंध बनाए गए। दहेज उत्पीड़न को रोकने और उन्हें घरेलू हिंसा से बचाने के लिए विशेष कानून बनाया गया। स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों में उनके लिए आरक्षण किया गया। सरकारी नौकरियों में उनकी नुमाइंदगी बढ़ाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई। यह सब इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि समानता के सिद्धांत को अधिक सार्थक व न्यायपूर्ण बनाने के लिए उसे पारंपरिक सोच के खांचे से बाहर निकाला गया।

हमारे संविधान में पूर्वोत्तर की कुछ जनजातियों को भी विशेष अधिकार हासिल हैं। यदि यह मान लिया जाए कि देश के सभी क्षेत्र और सभी लोग एक जैसे हैं, और सभी के ऊपर एक जैसा कानून लागू होगा, तो ऐसा करना संभव नहीं है, क्योंकि उन्हें सुरक्षा देने और उनकी पहचान बनाए रखने के लिए ऐसा करना जरूरी है। यही वजह है कि संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची में उनके लिए विशेष व्यवस्था की गई और उनके इलाके को स्वशासी बनाया गया। यहां तक कि देश के दूसरे नागरिकों को उस क्षेत्र में जाने के लिए परमिट लेने की आवश्यकता पड़ती है। उनके अपने नियम-कानून हैं। उन्हें अपनी परंपरा के मुताबिक नियम बनाने की आजादी है। संसद द्वारा बनाए गए कानून उन पर लागू नहीं होते। दीवानी और फौजदारी विवादों में देश के दूसरे हिस्से में लागू होने वाला कानून उन पर लागू नहीं होता। नागरिकता संशोधन विधेयक में भी उनकी स्वायत्तता को सम्मान दिया गया है। यह उनके क्षेत्र में लागू नहीं होगा। यह जरूरी था, ताकि विशेष परंपराओं के आग्रही समाज की विशेष पहचान को कायम रखा जा सके। समानता का पारंपरिक सिद्धांत उन्हें न्याय नहीं दे सकता था। इसके लिए उसे व्यापक होने की जरूरत थी और उसे व्यापकता देकर हमारे संविधान ने पूर्वोत्तर व दीगर सामाजिक-समूहों को अलग वर्ग मानते हुए न्याय सुनिश्चित किया।

संविधान के अनुच्छेद 14 की सुरक्षा सभी ऐसे नागरिकों और गैर-नागरिकों को हासिल है, जो भारत के राज्य क्षेत्र में रहते हैं। इसमें सुनिश्चित किया गया है कि किसी के साथ भेदभाव न हो। परंतु समता के सिद्धांत को पुष्ट करने के लिए यह अनुच्छेद तार्किक वर्गीकरण की अनुमति देता है। भेदभाव और तार्किक वर्गीकरण के अंतर को स्पष्ट करने के लिए न्यायालय ने सिद्धांत दिया है कि इसके लिए दो शर्तों का पूरा होना जरूरी है। पहला यह कि वर्गीकरण करने का अधार स्पष्ट होना चाहिए, ताकि इसे आसानी से समझा जा सके कि इस प्रक्रिया में किसे सुविधा पाने वालों की श्रेणी में रखा जाए और किसे उससे बाहर रखा गया है। इसके अलावा, दूसरी शर्त यह है कि वर्गीकरण के आधार पर और उसके द्वारा हासिल किए जाने वाले उद्देश्य के बीच तार्किक संबंध है। साफ है कि वर्गीकरण करने वाले व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि उक्त वर्गीकरण से उसके न्यायपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति होगी।

नागरिकता संशोधन विधेयक में तीन पड़ोसी देशों से छह पूजा-पद्धतियों के मतावलंबियों को नागरिकता देने का प्रस्ताव है। चूंकि दोनों आधार स्पष्ट हैं। उन्हें समझना आसान है, इसलिए अनुच्छेद 14 में अनुमन्य तार्किक वर्गीकरण की शर्त पूरी होती है। इसे जानने के लिए कि इससे अधिनियम के उद्देश्य को कैसे पूरा किया जा सकेगा, विधेयक के उद्देश्य और उसे पारित करने के कारण से मदद मिल सकती है। इसमेें बताया गया है कि बीते वर्षों में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और बांग्लादेश में लाखों हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, ईसाई व पारसी समाज के लोग पूजा-पद्धति के आधार पर प्रताड़ित किए गए और उन्हें मजबूरन अपना देश छोड़़ना पड़ा। इसलिए उन्हें न्याय देने के लिए इसे लाया गया है।

विधेयक विरोधी इसे मुसलमान विस्थापियों के साथ भेदभाव मानते हैं। विधेयक का विश्लेषण करने पर यह विरोध निराधार प्रतीत होता है, क्योंकि तीनों देशों में गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव के पर्याप्त प्रमाण हैं। अत: वहां के अल्पसंख्यकों को संरक्षण देने से इस अधिनियम के उद्देश्य की पूर्ति होती है, इसलिए यह अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करता। प्रस्तावित विधेयक के विरोधियों को इसे मुस्लिम, गैर-मुस्लिम बनाने की बजाय इसे गैर-प्रताड़ित और प्रताड़ित मानने की जरूरत है। जिस तरह जाति के आधार पर किए जाने वाले भेदभाव को दूर करने के लिए जाति को ध्यान में रखना जरूरी है, उसी तरह पूजा-पद्धति के आधार पर भेदभाव के शिकार लोगों को प्रताड़ित और गैर-प्रताड़ित समुदाय मानने की जरूरत है, जो इस विधेयक द्वारा किया गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 11th December