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अबूझ नाराजगी का एक नायक

कथा-कहानियों के पात्र अमूमन आसपास की जिंदगी से ही आते हैं, पर कई बार उनकी समानता आपको चकित कर सकती है। कश्मीर काडर के आईएएस अधिकारी शाह फैजल के इस्तीफे की खबर पढ़कर मुझे एक औपन्यासिक चरित्र की याद आई थी। पाकिस्तानी मूल के अंग्रेजी लेखक मोहसिन हामिद के उपन्यास द रिलक्टंट फंडामेंटलिस्ट  का नायक पाकिस्तान से बेहतर जिंदगी का सपना लेकर लाहौर छोड़ अमेरिका आता है। शिक्षा बहुत महंगी है, पर उसे वजीफा दिया जाता है। स्वयं उसके अनुसार, कॉलेज में अध्यापक उसे तरजीह देते हैं, उससे अधिक नहीं तो कम प्रतिभाशाली भी नहीं, गोरे छात्रों के मुकाबले उसे आगे बढ़ाया जाता है। कैंपस सेलेक्शन के दौरान एक बहुराष्ट्रीय कंपनी के लोग उसे अपने यहां रोजगार के लिए चुनते हैं, जबकि खुद उसका मानना है कि वह सबसे काबिल नहीं था। नौकरी में उसका बॉस उसे हमेशा प्रोत्साहित करता रहता है। उसकी गर्लफ्रेंड गोरी है और उसके रंग या पृष्ठभूमि को लेकर संवेदनशील है। कुछ भी ऐसा नहीं है, जो उसे पश्चिम से शिकायत का मौका दे। मगर अमेरिका में 11 सितंबर को हुए आतंकी हमले ने सब कुछ एक झटके से बदल दिया।

उस दिन उपन्यास का यह नायक अपनी व्यस्त और सफल जिंदगी का एक और थकाऊ  दिन बिताने और गुसल के बाद होटल के कमरे में अपना पहला पेग बनाकर टीवी ऑन करता है कि बड़ी सी स्क्रीन पर एक हवाई जहाज एक गगनचुंबी इमारत से टकराता दिखता है, थोड़े से अंतराल में दूसरा जहाज दूसरी इमारत से टकराता है और फिर कोई शक नहीं रह जाता कि यह कोई दुर्घटना नहीं है। 9/11 के बाद दुनिया वही नहीं रह जाने वाली थी, जो उसके पहले थी। यह तो वह भी जानता है कि उसकी अपनी जिंदगी में बड़ा बदलाव आने वाला है। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि परिवर्तन सकारात्मक होगा या नकारात्मक। पर एक अजीब सी अनुभूति उसे हो रही है और वह समझ नहीं पा रहा है कि हवाई जहाजों के वल्र्ड ट्रेड सेंटर से टकराने पर वह अंदर से खुश क्यों हो रहा है? यही वह द्वंद्व है, जो उसे ‘रिलक्टंट’ अर्थात अनिच्छुक या यूं कहें कि अनिर्णय का शिकार कट्टरपंथी बना देता है। एक तरफ पश्चिम का आंतरिक लोकतंत्र है, जो उसे अवसरों का असीमित आकाश प्रदान करता है और दूसरी तरफ दुनिया के सबसे बड़े दादा अमेरिका की अफगानिस्तान, इराक या सीरिया जैसे इलाकों में ज्यादतियों की कहानियां हैं, जो उसकी दुनिया भर के मुसलमानों के बीच उम्मत विरोधी छवि बनाती हैं। 

इन कहानियों में कुछ सच्चाई है और कुछ अतिरंजना, पर इनसे जो नैरेटिव बनता है, उससे बहुत सारे मुसलमान प्रभावित हैं और हमारा यह नायक भी उनमें से एक है। शाह फैजल ने सेवा से इस्तीफा दिया, तो मुझे बेसाख्ता द रिलक्टंट फंडामेंटलिस्ट  का नायक याद आया। फैजल के पिता का कत्ल आतंकियों ने किया था और वह अपनी मेहनत के बल पर पहले डॉक्टर बना। निश्चय ही तंत्र ने इसमें उसकी मदद की होगी। इससे ज्यादा तंत्र ने उसकी तब मदद की, जब उसने आईएएस की परीक्षा देने की सोची होगी। वह घाटी छोड़कर दिल्ली के एक निजी विश्वविद्यालय में आ गया, जहां अल्पसंख्यक छात्रों को प्रतियोगी परीक्षा के लिए तैयार किया जाता है। फैजल की आर्थिक मदद के लिए उसे विश्वविद्यालय की डिस्पेंसरी में डॉक्टर का काम भी सौंप दिया गया। उन दिनों इस विश्वविद्यालय से सैय्यद हामिद नामक एक अद्भुत शख्स जुड़े थे, जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे। गंगा-जमुनी तहजीब के जबर्दस्त हामी हामिद साहब उस नेहरूवादी परंपरा के थे, जो समाज को उदार और प्रगतिशील मूल्यों से जोड़ना चाहती है। यह उन्हीं का विजन था कि इस विश्वविद्यालय में देश भर के मुस्लिम छात्र सिविल सेवाओं के लिए चलने वाले कोचिंग सेंटर में रहकर तैयारी करते थे और बड़ी संख्या में चुने जाकर आईएएस, आईपीएस समेत अलग-अलग सेवाओं में जाते थे। हामिद साहब इन छात्रों के बीच मुझे भी बोलने के लिए बुलाते थे।

ऐसे ही एक संवाद के दौरान फैजल से संवाद का मुझे मौका मिला। वर्ष 2008 की किसी तारीख को मैं उन छात्रों के साथ संवाद कर रहा था, जिन्होंने सिविल सेवाओं की लिखित परीक्षाओं की बाधा पार कर ली थी और अब इंटरव्यू की आखिरी दीवार फलांगने की तैयारी कर रहे थे। वहां मौजूद सभी लड़के-लड़कियां विश्वविद्यालयों से हाल ही में निकले और जानकारियों से भरपूर, प्रतिभा से जगमगाते पुंज थे, जिनसे बात करके मुझे हमेशा अच्छा लगता है। उन सबके बीच एक कश्मीरी नौजवान ने सबसे अधिक मेरा ध्यान आकर्षित किया। पुख्ता दलीलों और भाषा पर अधिकार के साथ यह युवा डॉक्टर कश्मीर की समस्याओं और शेष भारत से उसके रिश्तों पर बात कर रहा था। मैं उसके तर्जे बयां से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। एक बात मुझे अच्छी तरह से याद है कि उसने एक बार भी कश्मीर के भारत में विलय को लेकर शंका नहीं व्यक्त की थी। कुछ ही दिनों बाद हामिद साहब का फोन मुझे मिला, जिसमें यह सूचना थी कि शाह फैजल नामक वह कश्मीरी डॉक्टर आईएएस की परीक्षा में अव्वल आया है।

परिणाम घोषित होने के बाद फैजल पूरे देश का नायक बन गया। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वह महीनों छाया रहा और उसे अपना रोल मॉडल मानकर बड़ी संख्या में कश्मीरी युवा सिविल सेवाओं की तरफ आकर्षित हुए। यह विश्वास मजबूत हुआ कि उनके साथ भेदभाव नहीं होगा। उसे जम्मू-कश्मीर काडर मिला था और अफसरी का लगभग एक दशक बिना किसी सार्वजनिक विवाद के गुजरा। अचानक ऐसा क्या हुआ कि उसका आईएएस से मोहभंग हो गया? पहले तो उसने मुख्यधारा की राजनीति में भाग लेने की बात की और अब पूरी तरह से पृथकतावादी पाले में खड़ा है। बीबीसी पर उसका इंटरव्यू द रिलक्टंट फंडामेंटलिस्ट  के नायक की याद दिलाता है, जिसके अंदर बहुत कुछ ऐसा गड्ड-मड्ड है कि वह खुद को भी नहीं समझा पाता कि आखिर वह नाराज क्यों है? और अगर है, तो किससे? दोनों के सामने एक तरफ तो वह धर्मनिरपेक्ष तंत्र है, जो बहुत सारे विचलनों के बावजूद उन्हें समर्थन देकर नए क्षितिज छूने का मौका देता है, पर वे मुस्लिम उम्मत की उस शिकायती दुनिया से भी बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, जो मानती है कि पूरी दुनिया उनके खिलाफ षड्यंत्ररत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column on 10 september