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चांद की धरती, उम्मीदों का आसमान

देश के आम लोगों के लिए चंद्रयान-2 अभियान कितना महत्व रखता है? रॉकेट, सैटेलाइट, ऑर्बिटर, लैंडर या रोवर जैसे शब्द उसके जीवन में शामिल ही कब रहे हैं। मगर इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने से पहले यह समझना ज्यादा जरूरी है कि जिस देश की संपदा ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने निचोड़ ली थी, उसने आजादी मिलते ही अंतरिक्ष विज्ञान की ओर बढ़ने का फैसला क्यों किया? भारत जब आजाद हुआ था, तब वह भुखमरी और बेरोजगारी से तो लड़ ही रहा था, यहां की 70 फीसदी से ज्यादा आबादी अनपढ़ लोगों की थी। मगर उस वक्त कुछ जहीन दिमाग लोगों ने यह देख लिया कि यदि आने वाले वक्त में विज्ञान-शोध पर ध्यान नहीं दिया गया, तो देश की स्थिति नहीं सुधर सकेगी। विक्रम साराभाई ऐसे ही लोगों में एक थे। वह तब के राजनीतिक नेतृत्व को यह समझाने में सफल रहे कि ‘लोगों और समाज की असली समस्याओं को दूर करने के लिए हमें अत्याधुनिक तकनीक के इस्तेमाल में सर्वश्रेष्ठ बनना होगा’। हालांकि जब यह बात आम चर्चा में आई, तब इसका खूब विरोध हुआ, मगर पंडित नेहरू ने साराभाई के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), परमाणु ऊर्जा विभाग व बाद के वर्षों मेंभारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, यानी इसरो जैसे संस्थानों का उदय इसी का नतीजा है।

आज हम बेशक चंद्रमा और मंगल की बातें करते हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1960 के दशक में यदि भारत ने खिलौने जैसे वे रॉकेट नहीं बनाए होते या केरल के थुंबा में एक चर्च से उसे लॉन्च न किया होता, तो आज इसरो इस मुकाम तक नहीं पहुंचता। जब हमने पहला रॉकेट बनाया था, तब सैटेलाइट बैलगाड़ी से लाए गए थे। रॉकेट के अलग-अलग पुर्जे साइकिल से ढोए गए। विक्रम साराभाई ने थुंबा को इसलिए चुना था, क्योंकि वहां से भूमध्य रेखा गुजरती है। उन्होंने तब यह कहा था कि देश का अपना लॉन्च व्हीकल होना उनका सपना है। यह ख्वाब उनके जीते-जी तो पूरा नहीं हुआ, लेकिन आज का भारत इस बात की तस्दीक करता है कि सपना देखना देश के लिए कितना महत्वपूर्ण है। 

आज इसरो जिस पायदान पर खड़ा है, वह किसी एक दिन की उपलब्धि नहीं है। विज्ञान किसी जादुई छड़ी से हासिल नहीं हो सकता। यह ऐसा विशेष ज्ञान है, जो लंबे समय में धीरे-धीरे अर्जित किया जाता है। और, जब कोई बड़ी सफलता वैज्ञानिकों को हाथ लगती है, तो आम आदमी चौंक जाता है और फिर मानवता की हमारी समझ बदल जाती है। आज का दिन इसी कारण काफी महत्वपूर्ण बन गया है। यह बताता है कि लैंडर तकनीक अब हमारी मुट्ठी में है। आज के दौर में सॉफ्ट लैंडिंग सबसे बेहतर तकनीक मानी जाती है, और इस मामले में हम रूस, अमेरिका और चीन के बराबर खड़े हो गए हैं। हालांकि शुरू में साझा प्रयास के तहत यह तकनीक हमें रूस से मिलने वाली थी, लेकिन जब उसने अपने कदम पीछे खींच लिए, तो हमारे वैज्ञानिकों ने अपने तईं इसे विकसित किया, जबकि अमेरिका और यूरोप के देश इसे हमें देने को तैयार थे। यानी, चंद्रयान-2 अभियान ने तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमारे वैज्ञानिकों का कद बढ़ाने का काम किया है।
भारत का चंद्रमा के अनदेखे दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र के बारे में जानकारियां जुटाना काफी अहम है। ऐसा नहीं है कि दूसरे देशों के पास यहां तक पहुंचने की क्षमता नहीं थी, लेकिन शुरुआत हमने की। चंद्रयान-2 की रवानगी के साथ ही यह उम्मीद बंधने लगी थी कि अब कई गुत्थियां सुलझ सकेंगी। सवाल ये थे कि क्या चंद्रमा का दक्षिणी हिस्सा उत्तरी ध्रुव जैसा ही है? यहां का मौसम कैसा है?

यहां किस तरह के खनिज पदार्थ मौजूद हैं? और सबसे अहम कि क्या यहां पानी का कोई भंडार है? उल्लेखनीय है कि चंद्रमा पर पानी की अनुपलब्धता को लेकर सबसे ज्यादा चिंता जताई जाती रही। हालांकि चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के होने की पुष्टि कर दी थी, लेकिन भविष्य में यदि यहां पानी के भंडार का कोई सुबूत मिलता है, तो यह वैज्ञानिक खोज के लिहाज से अमूल्य उपलब्धि मानी जाएगी। यहां पानी का मिलना सिर्फ जीवन संभव बनाने के लिहाज से अहमियत नहीं रखता, बल्कि इससे हाइड्रोजन और ऑक्सीजन अलग-अलग करके ईंधन भी बनाया जा सकता है। साफ है, ब्रह्मांड और सौर  मंडल के बारे में कई नई जानकारियां ऐसे अभियानों से सामने आएंगी।

इसरो के लिए भविष्य के तीन अन्य अभियान काफी महत्वपूर्ण हैं। इनमें पहला है, शुक्र अभियान। दूसरा, अंतरिक्ष प्रयोगशाला बनाना, जो धरती के चक्कर लगाएगी। और तीसरा, सूरज की सतह का अध्ययन करने वाला ‘आदित्य एल- 1’ मिशन। हालांकि इन सबसे इतर जो सबसे अद्भुत अभियान होगा और जिसे फिलहाल अनुमति का इंतजार है, वह है हवा में मौजूद ऑक्सीजन को बतौर लॉन्च ईंधन इस्तेमाल करना। इस पर किसी दूसरे देश ने अभी काम नहीं किया है। मगर हम यह साहस कर रहे हैं। अगर यह मिशन सफल रहा, तो हम ईंधन के लिहाज से किफायती लॉन्च व्हीकल बना पाएंगे। चंद्रयान-2 अभियान ने इन सारी संभावनाओं के द्वार खोले हैं।

फिर से उसी सवाल पर लौटते हैं कि चंद्रयान-2 से आम आदमी का क्या फायदा है? एक तो यही है कि विज्ञान का इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है, जिसमें किसी एक खोज या आविष्कार ने हमारी समझ को पूरी तरह बदल दिया। आज जब विज्ञान को आगे बढ़ाने का काम काफी गुपचुप तरीके से किया जाता है, तब इस तरह के अभियान न सिर्फ राष्ट्रीय चर्चा में आते हैं, बल्कि आम लोगों की वैज्ञानिक समझ भी बढ़ाते हैं। इससे जाहिर तौर पर आम आदमी और वैज्ञानिक समुदाय के बीच आपसी विश्वास बढ़ता है। चंद्रयान-2 जैसे अभियान वैज्ञानिक समुदाय के लिए रिपोर्ट कार्ड भी हैं। ये देश में विज्ञान की सेहत बताने का काम करते हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 07 September