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इस कोशिश को आगे ले जाना होगा

पड़ोसी देश की जमीन पर पल रहे दाऊद इब्राहीम, मसूद अजहर, जकी-उर रहमान लखवी और हाफिज सईद को भारत सरकार ने अब गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) कानून के तहत आतंकी घोषित कर दिया है। ये सभी अपराधी भारत में कई आतंकी हमलों के सूत्रधार रहे हैं। कानून में इस प्रावधान से निश्चय ही कुछ बदलाव सामने आएंगे। पहला तो यही कि आतंकवाद-विरोधी अभियानों में जो एजेंसियां शामिल हैं, उन्हें एक दिशा मिलेगी। उनका लक्ष्य अब और अधिक स्पष्ट होगा। दूसरा बदलाव यह होगा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में यह कवायद हमारे लिए एक कूटनीतिक हथियार साबित हो सकेगी। अपने तईं ऐसे किसी आतंकी के विरुद्ध कार्रवाई को हम वैश्विक मंचों पर न्यायोचित ठहरा सकेंगे। तीसरा, ऐसे आतंकियों के खिलाफ अब सीधी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई हो सकेगी, जबकि इससे पहले आतंकी संगठनों को निशाना बनाया जाता था। मसलन, जैश-ए-मोहम्मद या लश्कर-ए-तैयबा आतंकी संगठनों की सूची में शामिल हैं, लेकिन हाफिज सईद या मसूद अजहर आतंकी नहीं था। इस कारण वे अपने-अपने संगठनों पर कार्रवाई होते ही नाम बदलकर सक्रिय रहतेे थे। अब वे भले ही अपने संगठन के नाम बदल लें या किसी अन्य संस्था से जुड़ जाएं, उनके खिलाफ आतंकवाद-विरोधी अभियान चलता रहेगा।

मगर पाकिस्तान समर्थित अपराधियों को आतंकी घोषित करने की इस पहल का कोई प्रभावशाली असर पड़ता नहीं दिख रहा। दरअसल, ये सभी आतंकी संयुक्त राष्ट्र या अमेरिका की आतंकी सूची में बहुत पहले से शामिल हैं। कई अन्य देशों ने भी इनमें से कुछ को अपने यहां आतंकी घोषित कर रखा है। बावजूद इसके इनकी सेहत पर अब तक कोई खास असर नहीं पड़ा है। इसका अर्थ यह है कि जब तक किसी देश के पास इतनी ताकत नहीं हो कि वह इन्हें सीधे-सीधे नुकसान पहुंचा सके, तब तक ऐसी किसी घोषणा का कोई असर नहीं पड़ता। 

भारत के लिहाज से देखें, तो ये तमाम आतंकी पाकिस्तान से खुलेआम अपनी गतिविधियां चला रहे हैं। भारत में इनका नेटवर्क वहीं से संचालित होता है। कुछ स्थानीय लड़ाके जरूर इन आतंकियों के संपर्क में हैं, लेकिन उनके खिलाफ वक्त-वक्त पर कानूनी कार्रवाई होती रहती है। चूंकि हमारी भौगोलिक सीमा में इन आतंकियों की सशरीर मौजदूगी नहीं है, इसलिए हमारी कानूनी व जांच एजेंसियां अब इन दहशतगर्दों के स्थानीय नेटवर्क पर ही कार्रवाई करेंगी। यह कार्रवाई पुराने कानूनों के तहत भी की जा सकती थी, इसके लिए अलग से किसी नए कानून की जरूरत नहीं थी।
जाहिर है, सब कुछ जांच-प्रक्रिया और सुबूत जुटाने की कवायद पर निर्भर करता है। जब तक कानून लागू करने वाली एजेंसियां इन आतंकियों के स्थानीय गुर्गों पर ठोस कार्रवाई नहीं करेंगी, तब तक हम इन आतंकी संगठनों की कमर नहीं तोड़ सकते। मुश्किल यह है कि 19वीं और 20वीं सदी की संस्थाओं व साधनों से हम 21वीं सदी की चुनौतियों से लड़ना चाहते हैं। जरूरत हमारी सुरक्षा व जांच एजेंसियों को अत्याधुनिक बनाने की है, जिस पर गंभीरता से काम होता नहीं दिख रहा है।

हमारे यहां न जाने कितने कानून हैं, जिनकी मौजूदगी अब बेमानी नजर आने लगी है। कानून  होने के बाद भी अपराध नहीं रुक रहे। आम अपराधों पर ही गौर करें, तो हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा जैसे तमाम अपराधों को रोकने के लिए देश में कानून हैं, पर ये सभी अपराध बदस्तूर कायम हैं, बल्कि लगातार बढ़ रहे हैं। एक बार यह मान भी लें कि ये अपराध खत्म नहीं किए जा सकते, लेकिन हमारा कानूनी ढांचा जिस तरह काम करता है और जिस तरह कानूनी छिद्रों का सहारा लेकर अपराधी अदालतों से छूट जाते हैं, क्या वह इस बात की तस्दीक नहीं करता कि हमें कानून नहीं, बल्कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों की सेहत दुरुस्त करने की जरूरत है?

अमेरिका द्वारा दूसरे देश के अपराधियों को आतंकी घोषित किए जाने के बाद पड़ने वाले फर्क की वजह भी यही है। वह दरअसल, ऐसे तमाम आतंकी संगठनों और आतंकवादियों के खिलाफ अपने यहां कई दफा कार्रवाई कर चुका है। इतना ही नहीं, उसने अपना अंतरराष्ट्रीय प्रभाव इतना व्यापक बना लिया है कि दूसरे देशों पर दबाव डालकर भी वह अपराधियों या उनके संगठनों पर कार्रवाई सुनिश्चित कराता है। जरूरत पड़ने पर सीमा पार करने से भी वह पीछे नहीं हटता। एबटाबाद में अल-कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को मार गिराने की उसकी सैन्य कार्रवाई की बेशक पाकिस्तान ने निंदा की हो, लेकिन अमेरिका अपने इरादे पर डटा रहा। पाकिस्तान ही नहीं, कई अन्य देशों में भी अमेरिका ने जरूरत पड़ने पर आतंक-विरोधी कार्रवाई की है। 

साफ है, किसी को आतंकी घोषित कर देने मात्र से हालात नहीं बदल सकते। स्थिति सुधारने के लिए जरूरी है कि अपनी क्षमता बढ़ाई जाए। विश्व की बड़ी ताकतों को अपनी अहमियत समझाई जाए। भले ही इस एक पहल के बाद आतंकियों पर की जाने वाली कार्रवाइयों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जायज ठहराया जा सकेगा, लेकिन सीमा पार करके आतंकियों को निशाना बनाना इतना आसान भी नहीं है। ऐसी किसी कार्रवाई की अनुमति अंतरराष्ट्रीय कानून नहीं देता। वह इसके लिए संबंधित देश की सरकार से गुजारिश करने की वकालत करता है। और, यह खेल तो हम पाकिस्तान सरकार से बरसों से खेल रहे हैं। ऐसी गुजारिश के बाद पड़ोसी सरकार किसी आतंकी को गिरफ्तार करती भी है, तो अदालत में उसके खिलाफ ठोस सुबूत पेश नहीं किया जाता, नतीजतन आतंकी कानून की जद में नहीं आ पाता और खुलेआम अपनी गतिविधियां संचालित करता रहता है। ऐसे में, पाकिस्तान पर सीधा बड़ा असर तभी पडे़गा, जब हम उस पर कई तरह के दबाव बनाएंगे। सैन्य, कूटनीतिक या अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के दबाव हमारे लिए फायदेमंद हो सकते हैं। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) का दबाव भी कुछ इसी श्रेणी का है, जिसे और ज्यादा मारक बनाने का प्रयास हमें करना चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column on 06 September