DA Image
6 अप्रैल, 2020|10:37|IST

अगली स्टोरी

वैश्विक मुद्दों की साझा चिंताएं

नई दिल्ली में भारत और अमेरिका के शासनाध्यक्षों की आपसी मुलाकात जिस गर्मजोशी के साथ होने की उम्मीद की जा रही थी, मंगलवार को इन दोनों शीर्ष नेताओं की बैठक उसी सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई। हैदराबाद हाउस में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने न सिर्फ एक-दूसरे पर भरोसा जताया, बल्कि अपनी-अपनी चिंताएं और मुश्किलें भी आपस में साझा कीं। यह संकेत है कि दोनों देशों के द्विपक्षीय रिश्ते सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इस राह में बेशक कुछ रुकावटें हैं, लेकिन बैठक के बाद दिए गए साझा बयान में दोनों नेताओं ने उन गतिरोधों से जल्द ही पार पाने की उम्मीद जताई, जो सुखद है। 

मंगलवार की बैठक का सबसे सुखद नतीजा रहा, ‘कॉम्प्रिहेन्सिव ग्लोबल स्ट्रैटिजिक पार्टनरशिप’ पर बनी सहमति। यह नीति दोनों देशों के मौजूदा रिश्ते को नई ऊंचाई देती है। इस नई साझेदारी का मतलब है कि द्विपक्षीय मुद्दों के अलावा वैश्विक मसलों पर भी दोनों देशों में सामरिक साझीदारी होगी और यह साझेदारी रक्षा-सुरक्षा जैसे एक-दो क्षेत्रों तक नहीं, बल्कि द्विपक्षीय रिश्तों के तमाम पहलुओं को समग्रता में समेटेगी। स्पष्ट है, जिस उद्देश्य से राष्ट्रपति ट्रंप का यह दौरा आयोजित किया गया, उसमें सफलता मिली है। इस तरह की यात्राओं में कोशिश भी यही होती है कि शासनाध्यक्षों के बीच एक सहमति बन जाए, ताकि बाकी की चीजें आसान हो जाएं। राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा भी है कि उन्हें भारत पर पूरा भरोसा है, जिसका अर्थ है कि रिश्तों की तमाम गाठों को जल्द सुलझा लिया जाएगा।

डोनाल्ड ट्रंप की इस यात्रा में दोनों देशों के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापारिक समझौता नहीं हो सका। मगर इससे निराश होने की जरूरत नहीं है। चूंकि दोनों देशों के मुखिया एक-दूसरे को समझने लगे हैं, इसलिए उम्मीद है कि इस समझौते को लेकर निचले स्तर पर कायम गतिरोध दूर हो जाएगा। किसी भी समझौते के मसौदे पर आसानी से सहमति नहीं बनती। जिस तरह हम अपने हितों को लेकर आग्रही होते हैं, उसी तरह सामने वाला पक्ष भी अपने लाभ का गुणा-भाग करता है। जाहिर है, इस प्रक्रिया में वार्ताकार एक-दूसरे के प्रति काफी सख्त रुख अपनाते हैं। मगर जैसे ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के शीर्ष नेतृत्व में सहमति बन जाती है, तो समझौते की मेज पर बैठने वाले वार्ताकार अपना-अपन रुख नरम करने लगते हैं। इससे बीच का रास्ता निकालना आसान हो जाता है। 

व्यापारिक समझौते में भी इसी तरह के गतिरोध हैं। इसमें जो मुद्दे हैं, वे फिलहाल कठिन जान पड़ रहे हैं। अमेरिका की अपेक्षाओं को पूरा करना भारत के लिए आसान नहीं है, तो भारत की उम्मीदों पर आगे बढ़ना अमेरिका के लिए कठिन है। मगर रास्ते जल्द ही निकल जाएंगे। माना भी यही जा रहा है कि राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रंप की फिर से ताजपोशी के बाद भारत और अमेरिका इस समझौते पर हस्ताक्षर करेंगे। वैसे, यह सच हमें नहीं भूलना चाहिए कि चुनावी नतीजों की सटीक भविष्यवाणी मुमकिन नहीं। जनादेश उम्मीदों के खिलाफ भी आते हैं। फिर भी यह जरूर कहा जा सकता है कि दोनों देश इस समझौते पर आगे बढ़े हैं।

दिल्ली-बैठक की दूसरी खास बात रक्षा सौदे पर बनी सहमति है। लगभग तीन अरब डॉलर के रक्षा समझौते पर दोनों देशों ने हस्ताक्षर किए हैं। अमेरिका ने भारत को आधुनिकतम सैन्य हेलीकॉप्टर और अन्य साजो-सामान देने की बात कही है। ट्रंप के शब्दों में कहें, तो इन सौदों से दोनों देशों के आपसी रक्षा संबंध कहीं ज्यादा मजबूत होंगे। आम्र्ड और प्रीडेटर ड्रोन जैसे उपकरणों की आपूर्ति पर भी सहमति बनी है। दोनों देशों के बीच ‘डिफेंस टेक्नोलॉजी ऐंड ट्रेड इनीशिएटिव’ के तहत सैन्य उत्पादों की खरीद-फरोख्त होती रही है। दोनों नेता इसे और गति देने पर राजी हुए हैं। अच्छी बात यह भी है कि तकनीक के हस्तांतरण पर अमेरिका सहमत हुआ, खासतौर से आतंकवाद के खिलाफ जंग में। इसका लाभ हमारे हित में होगा, क्योंकि अमेरिका के पास निगरानी करने वाली कई अत्याधुनिक तकनीकें हैं।

इस्लामी आतंकवाद के खिलाफ जंग की प्रतिबद्धता मंगलवार को फिर दोहराई गई। सोमवार को अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस्लामी आतंकवाद की चर्चा की थी और इससे निपटने के लिए भारत के साथ मिलकर काम करने का भरोसा जताया था। हैदराबाद हाउस में साझा प्रेस-वार्ता में राष्ट्रपति ट्रंप ने बेशक कहा कि पाकिस्तान की धरती से चल रही आतंकी गतिविधियों को बंद करने के लिए अमेरिका कदम उठा रहा है, लेकिन उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत और अमेरिका मिलकर आतंकवाद के खिलाफ जंग लड़ने पर सहमत हुए हैं। यह परोक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए चेतावनी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आतंक के समर्थकों को जिम्मेदार ठहराने के लिए भारत और अमेरिका साझा प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए संकल्पित हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आपसी दोस्ती ने भी कई मुश्किलों का हल निकाला। शासनाध्यक्षों के निजी रिश्ते कितने अहम होते हैं, यह कोई छिपा तथ्य नहीं है। भारत और अमेरिका में ही जब आणविक समझौता हुआ था, तो वह तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आपसी रिश्तों का नतीजा था। जब उच्च स्तर पर एकराय बन जाती है, तो निचले स्तर पर उसे अमलीजामा पहनाने के लिए खास मेहनत की जाती है। दिल्ली के हैदराबाद हाउस में भी इसी तरह की झलक दिखी।

इस तरह की द्विपक्षीय बैठकों को देखने के अमूमन दो नजिरए होते हैं। एक सोच सभी तथ्यों को हवा-हवाई साबित करती है और बताती है कि बैठक अपने मकसद में सफल नहीं रही, जबकि दूसरी सोच में आपसी विश्वास और संबंधों पर भरोसा जताया जाता है। हैदराबाद हाउस की बैठक को दूसरे नजरिए से देखा जाना चाहिए। भविष्य की संभावनाओं के कई बीज इस दौरे में बोए गए हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan opinion column of 26th february