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28 जनवरी, 2020|10:02|IST

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वाकई मुश्किल में हैं कई दिल

वह भारत का मेरा पहला सफर था। आज अगर ख्यालों में जाऊं, तो यह दूर छूट गई ऐसी याद है, जिसके बारे में मैं यूं लिखते हुए शुरू कर सकती हूं कि एक समय की बात है...। अप्रैल 2013 में नई दिल्ली की एक भीगती शाम, भारतीय फिल्मों की एक ताउम्र दीवानी, मैंने पहली बार एक भारतीय सिनेमा हॉल में कदम रखा। वह सिनेमा हॉल सहज ही मेरी पसंद था, वह हॉल एक ऐसे मॉल में था, जहां मैं अपने 13 वर्षीय बेटे के लिए खेल के कपड़े खोजने में घंटों बिता चुकी थी। जैंगो अनचेंड  भारतीय फिल्म नहीं थी, लेकिन मेरे साथ फिल्म देखने गए दोस्त भारतीय थे। 

मेरी खुशनुमा यादों में दिल्ली की वह बारिश वाली शाम बस गई, जब मैंने बिल्कुल घर में होने का एहसास किया था। दिसंबर 2013 में मैं जब दूसरी बार दिल्ली गई, तो मैंने धूम 3 देखी। तब मुझे जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का साक्षात्कार लेना था, जो इन दिनों नजरबंद हैं। ठीक उसी सिनेमा हॉल में मैंने वह फिल्म देखी। फिल्म की शूटिंग अमेरिका में हुई थी, लेकिन वह पूरी तरह भारतीय फिल्म थी। उसी मॉल के कॉफी शॉप में दो दिन पहले बैठे-बैठे मेरे दिमाग में यह बात आई थी कि दिल्ली और लाहौर में कितनी साम्यता है। ऐसा एहसास मैंने दुनिया में कहीं नहीं किया। 

सितंबर 2014 में फवाद खान की फिल्म खूबसूरत भारत में प्रदर्शित हुई। भारतीय फिल्म दुनिया में, जहां शाहरुख खान, आमिर खान और सलमान खान राज कर रहे हैं, पाकिस्तान के फवाद खान को पसंद किया गया। उनकी जादुई आंखों और तराशे हुए चेहरे ने हर उम्र के दर्शकों को प्रभावित किया। जब भारत सरकार अपनी राष्ट्रवादी धुन में लगी थी, तब भारतीयों ने फवाद को बेहद खास बना दिया। बहुत जल्दी ही परदे पर फवाद की हमसफर रह चुकी माहिरा खान भी परियों की तरह आईं, ऊर्जावान और उम्मीदों से भरी। शाहरुख खान ने माहिरा खान को अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म रईस  के लिए अनुबंधित कर लिया। यह एक शानदार ख्वाब था, जो साकार होने जा रहा था। भारत के सबसे बड़े ग्लोबल स्टारों में से एक ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी टीवी स्टार को अपनी फिल्म में लिया था। पाकिस्तान में खुशियां मनाई गईं। यह एक इशारा था, सीमाओं, विचारधाराओं और खून-खराबे की यादों से परे प्यार ही हमें साथ लाता है। जब राजनीति बांटती है, तब भी कला हमें साथ लाती है। लेकिन दो साल बाद माहिरा को रईस   का प्रचार नहीं करने दिया गया, न तो भारत में और न बाहर। 

अप्रैल 2015 में मेरा 15 वर्षीय बेटा मूसा चेन्नई गया। वहां दक्षिण एशिया अंतरराष्ट्रीय स्कूल संगठन का बास्केटबॉल टूर्नामेंट था। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका के मिडिल और हाई स्कूल के छात्र-छात्रा दशकों से खेल के लिए ऐसे ही जुटते रहे हैं। कला की तरह ही खेल भी हमें जोड़ते हैं। खेल बच्चों को श्रेष्ठ मूल्यों की शिक्षा देते हैं। जीत के लिए होने वाले संघर्ष के बावजूद खेल बंटवारों-विभेदों को कमजोर कर देते हैं। चेन्नई में मूसा दूसरे मेहमान खिलाड़ियों की तरह ही अपने मेजबान स्कूली खिलाड़ियों के परिवार के साथ रहा। उसकी टीम भले स्वर्ण पदक नहीं जीत सकी, लेकिन वह बड़ी गर्मजोशी और मनोरंजक किस्सों के साथ घर लौटा। उसे दक्षिण भारतीय मेजबानों ने श्रीकृष्णा मिष्ठान भंडार के डिब्बों में भरे मिष्ठानों के साथ विदा किया था। चेन्नई में जब उसने मेरे नाम का जिक्र किया, तो उन्होंने एक सवाल किया, क्या तुम्हारी मां फवाद खान को जानती हैं?

दक्षिण भारत में रजनीकांत, महेश बाबू और प्रभास की फिल्म दुनिया में भी पाकिस्तानी फवाद खान की चर्चा थी। जब मैंने चेन्नई के बारे में पूछा, तो मूसा ने जवाब दिया, ‘चेन्नई तो लाहौर जैसा है।’

उसे दुबई होते हुए चेन्नई जाना पड़ा था। ऐसा ही है। पाकिस्तान से भारत जाने के लिए एक और देश से होकर गुजरना पड़ता है। मूसा और उसके तीन साथी स्कूली खिलाड़ियों को पाकिस्तानी पासपोर्ट की वजह से सवालों के लंबे दौर से गुजरना पड़ा। पूछताछ वाले कमरे में खिड़कियां नहीं थीं। लड़कों के साथ उनका कनाडाई कोच भी था। इन 15 वर्षीय खिलाड़ियों से पूछताछ सिर्फ इसलिए हुई, क्योंकि वे पाकिस्तानी थे। मूसा ने हंसते हुए यह वाकया सुनाया और कहा, मॉम, मुझे सवाल बुरे नहीं लगे, पर वहां जो सिगरेट की गंध थी, वह असहनीय थी, वहां एक आदमी लगातार धूम्रपान कर रहा था। 

मई 2016 में मैं फिर दिल्ली में थी। तब बॉलीवुड की किस्मत में अजीब मोड़ आ चुका था। मैं हिन्दुस्तान टाइम्स स्टाइल अवार्ड गाला में भाग लेने आई थी। सितारों से भरा आयोजन था। मैं वहां केवल इसी आशा में मौजूद थी कि अपने एक सर्वकालिक सिनेमाई नायक अमिताभ बच्चन से मिलूंगी। हम काफी कम समय के लिए मिले, मैं स्तब्ध थी और अमिताभ बच्चन मुस्करा रहे थे शालीन, खुशमिजाज। उरी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान-भारत में बढ़े तनाव के बीच 2016 में ऐ दिल है मुश्किल  प्रदर्शित हुई थी। शोर मचने लगा था कि एक-दूसरे से बातचीत भी बंद कर दी जाए। खूबसूरत माहिरा और फवाद सहित हर पाकिस्तानी चीज का बहिष्कार कर दिया जाए। फवाद ऐ दिल है मुश्किल  के प्रचार का हिस्सा नहीं थे। तब दिल बड़ी मुश्किल में थे। शत्रुता घनी हो गई थी, सीमाएं कंटीली हो गई थीं। मुंबई का अगला नायक बनने जा रहे फवाद चुपचाप लाहौर लौट आए। 

अब दोनों देश एक-दूसरे के विरोध में लगे हैं। दोनों देशों के आसमान में नफरत फैल गई है, आतिफ असलम और राहत फतेह अली खान जैसे कलाकार बेचैन हैं, 
गीत गूंज रहे हैं, दिल दिया गल्लां  और सानु एक पल चैन न आए...। 

इसी साल जनवरी और फरवरी में पाकिस्तान ने सिंबा और गली बॉय पर अपनों की तरह प्यार लुटाया।... और जब मैं गली बॉय  देखने के लिए तैयार हो रही थी, तभी पुलवामा और बालाकोट हो गए। फिर जो किस्सा शुरू हुआ, वह आज तलक जारी है। मैं द स्काइ इज पिंक देखना चाहती हूं, लेकिन भारतीय फिल्में अब पाकिस्तान में प्रदर्शित नहीं हो रही हैं। जीवन में पहली बार मैं केवल पाकिस्तानी और हॉलीवुड की फिल्में देख रही हूं। मुझे उस पल का इंतजार है, जब अगली भारतीय फिल्म लाहौर में रिलीज होगी।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column of 23 september 2019