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16 फरवरी, 2020|2:40|IST

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शब्दों की मर्यादाएं लांघती राजनीति

दिल्ली विधानसभा चुनाव पूरा हो चुका है। इसके नतीजों में एक छोटी, लगभग दिल्ली शहर में सीमित आम आदमी पार्टी को भारी बहुमत मिला। यूं तो यह चुनाव राष्ट्र की एक काफी छोटी विधानसभा के लिए था, जिसके पास कुल 70 सीटें हैं और इस विधायिका की शक्ति भी देश के सभी राज्यों की तुलना में अपेक्षाकृत कमजोर है। फिर भी, चुनाव-प्रचार के आक्रामक स्वर आज भी बार-बार गूंज रहे हैं। आखिर क्या कारण था कि इस चुनाव के लिए एक स्थापित और विशाल राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को इस स्तर का प्रचार करना पड़ा? 

नफरत भरे भाषणों की शुरुआत 28 जनवरी से हुई, जब केंद्र सरकार के एक मंत्री ने अपनी जनसभा में गर्मजोशी से देश के अनामित गद्दारों के खिलाफ ‘कुछ’ करने का आह्वान किया। कोरस की तरह ये शब्द बार-बार दोहराए गए, जिसकी अगली पंक्तियां जनसभा की भीड़ ने जोड़ी कि वह देश के गद्दारों को गोली मारकर सजा देना चाहती है, न कि इसकी स्थापित विधिक व कानूनी संस्थाओं द्वारा। क्या यह उचित था कि एक आला मंत्री, जिनकी पार्टी को लोकसभा चुनाव में दिल्ली का भरपूर दुलार मिला था, इस तरह के राजनीतिक दुराग्रह का सहारा लें? लोकतंत्र की नींव में लोग होते हैं, उनका विवेक होता है। मतदान तो लोगों के विवेक पर ही आधारित होता है। अपना वोट डालने से पहले गरीब से गरीब आदमी भी मुद्दों की चर्चा करता है और दलगत परिस्थितियों को समझकर विचार-विमर्श करके भयमुक्त अपने मत का इस्तेमाल करता है।

भारत विश्व का सबसे अनूठा और बड़ा लोकतंत्र है। यहां मतदाताओं के पास बेशक धन-संपत्ति न हो या वे सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर हों, पर संविधान के दायरे में वे अपनी नागरिकता की जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं। बाबा साहेब आंबेडकर ने स्वयं कहा था कि सामाजिक और आर्थिक विषमताओं के बावजूद मतदान करने तथा लोकतंत्र से राजनीतिक समता की चेतना जगती है। मतदान तो वह अनूठा क्षण है, जिसके लिए भयमुक्त वातावरण का निर्माण होना चाहिए। अगर लोकतंत्र के इस विशेष पर्व से पहले कुछ उग्र लोग हथियार उठा लेने की बात कहें, तो सत्तारूढ़ दल के माननीय की यह जिम्मेदारी थी कि वह उन्हें समझाते कि उन्हीं की पार्टी केंद्र की सत्ता में है और कानून के जरिए वह विधिवत भारतीय संविधान की सुरक्षा करेंगे, ठीक वैसे ही, जैसा कि राष्ट्रपति भवन के प्रांगण में विगत मई में उन्होंने शपथ ली थी। मगर हुआ इसका उल्टा। 

किसी भी लोकतंत्र में जनता शस्त्र नहीं उठाती। गोली चलाने का काम सिर्फ वैध सैन्य बलों का है, जिन पर हिन्दुस्तान को हमेशा नाज रहा है। क्रोध और उग्रवाद हथियार उठाने के अवैध कारण हैं। मगर, भाजपा के ही एक और सांसद ने खास धार्मिक समुदायों का नाम लेकर कहा कि उनके समर्थन से यदि विरोधी दल शासन में आए, तो आशंका यही है कि वे महिलाओं के साथ दुष्कर्म करेंगे। शायद वह उन दिनों को भुला बैठे थे, जब निर्भया के साथ दुष्कर्म हुआ था। तब इस शहर की सांसें थम गई थीं और नम आंखों के साथ निर्भया के विकृत पार्थिव शरीर को विदा किया गया था। वह इसी शहर की लड़की थी, और अपने जीवन की पूर्व संध्या में ही उसने एक विकृत मानसिकता की कीमत चुकाई। वह मानसिकता, जिसका कोई जाति-धर्म न था। उसके हत्यारे अब एक वैध तरीके से तिहाड़ जेल और न्यायालय के बीच फांसी की सजा की अंतिम वैध प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं।

निर्भया के जाने के बाद इस शहर की महिलाओं ने मन बना लिया है। चाहे वह भलस्वा में रहने वाली हों या रिठाला में, बुराड़ी में रह रही हों या संगम विहार में, निर्भया उनकी अपनी है। क्लांत शब्दों या विध्वंस के आह्वान का भय दिखाने वाले व्यवहार का चुनाव-प्रचार में कोई स्थान नहीं। भाजपा के इन युवा नेताओं को अपनी ही पार्टी का इतिहास याद रखना चाहिए। उन्हें यह पता होना चाहिए कि अटल बिहारी वाजपेयी के शब्द आज भी राजनीतिक प्रतिस्पद्र्धा से ऊपर माने जाते हैं। वाजपेयी के शब्दों में लालित्य और सोच का संचार है। धुर विरोधी भी उनके शब्दों के आग्रह को अस्वीकार नहीं कर पाते थे। सुषमा स्वराज भी एक दमदार महिला नेत्री रहीं, जिनकी बातें लोकसभा में कांग्रेस का दबदबा होने के बावजूद सभी सुनते थे। एक युवा नेत्री के रूप में भी उनके बारे में जो अच्छी स्मृतियां लोगों की हैं, वे हैं- उनकी हरी-नीली आंखें और उनकी वाक्शक्ति। 

राजनीति में प्रतिस्पद्र्धा हो सकती है; राजनीतिक विरोध भी स्वाभाविक है; कई बार तो राजनीतिक दुराग्रह भी होता है, लेकिन शब्दों के हीन-प्रयोग से भारतीय जनता पार्टी का गैर-कांग्रेसी प्रयोग न कभी बना था और न कभी सोचा जा सकता है। इंदिरा गांधी से कट्टर विरोध के बावजूद जयप्रकाश नारायण, कर्पूरी ठाकुर और कैलाशपति मिश्र जैसे नेता न कभी क्रोधित या उत्तेजित हुए, और न शब्द-संयम की सीमा-रेखा पार की। संतुलित शब्दों के प्रयोग और वैचारिक व सैद्धांतिक रूप से ही कांग्रेस का विरोध होता रहा। नानाजी देशमुख भी गैर-कांग्रेस राजनीति के प्रचार में और आपातकाल के विरोध में बिहार आए थे। उन्होंने कर्पूरी ठाकुर, जयप्रकाश नारायण और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुराने विचारक सीताराम मारू के साथ मिलकर आपातकाल के विरोध में हिंदी का अखबार शुरू किया, जिसका नाम था- मातृभूमि।  जाहिर है, इस मातृभमि की सेवा में जो श्रद्धा सुमन अर्जित कर गैर-कांग्रेसवाद आज तक जीवित रह पाया है, वह है वैचारिक दृढ़ता और शब्दों में संयम व भव्यता। आखिर यह सीमा-रेखा क्यों तोड़ी गई? जबकि दृढ़ता तो ऐसी होनी चाहिए थी कि हारने की सूरत में भी शब्दों की मर्यादा न खोई जाती। लोकतंत्र की हमारी प्रथा, बोली और लोकाचार विश्व में सबसे विरल है। एक आम औरत होने के नाते ऐसे माननीयों से मृदु भाषा का आग्रह करती हूं।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column of 15 february