hindustan opinion column of 11 october - क्यों पिछड़ जाते हैं भारत के किसान DA Image
19 नबम्बर, 2019|8:30|IST

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क्यों पिछड़ जाते हैं भारत के किसान

व्यापार समझौते करने वाले वार्ताकार तीन तरह के होते हैं। वार्ताकारों का पहला वर्ग वह होता है, जो मजबूत अर्थव्यवस्थाओं का नुमाइंदा होता है, और जो अपने लोगों के वास्ते सबसे बेहतर समझौता हासिल करने के लिए तमाम साधनों और ताकत का इस्तेमाल करता है। दूसरा वार्ताकार वर्ग वह होता है, जो अपने औपनिवेशिक अतीत, नए व्यापार नियमों और राष्ट्र के समूहों व राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के बीच फंसा होता है। ये सभी उसे अलग-अलग दिशा में खींचते रहते हैं। ऐसे वार्ताकार देशों की संख्या दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत भी इन्हीं देशों में एक है।

कपास और वस्त्र जैसे उत्पादों पर, जिनका वैश्विक बाजारों में स्वतंत्र रूप से कारोबार नहीं हो रहा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियम उचित रूप से लागू नहीं हैं। फिर भी, इस पर आज तक ध्यान नहीं दिया गया है। एक किलो कपास उगाने में भारत में 0.95 डॉलर (लगभग 67 रुपये) खर्च आता है, जो दुनिया में सबसे सस्ता है। लिहाजा तर्क तो यही कहता है कि दुनिया के कपास बाजार में भारत का बोलबाला होना चाहिए था। मगर इस राह में अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों की बेड़ियां हैं। इन्हें तय करने में अब किसी युद्ध की तरह भयंकर जंग लड़ी जाती है।

जब मैं इन पंक्तियों को लिख रही हूं, तब 150 से अधिक देश विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के बैनर तले जिनेवा में अंतरराष्ट्रीय कपड़ा व्यापार पर चर्चा कर रहे हैं। यहां 7 अक्तूबर को विश्व कपास दिवस मनाया गया था, जो तथाकथित ‘कॉटन-4’ (बेनिन, बुर्किना फासो, चाड और माली का समूह) की एक पहल है और जिसे डब्ल्यूटीओ और संयुक्त राष्ट्र के कुछ संगठनों का समर्थन हासिल है। ऐसे में, बहुपक्षीय व्यापार के इतिहास की उस असंगत नीति का जिक्र यहां लाजिमी है, जो लंबे समय से कायम है। यह नीति मल्टी फाइबर एग्रीमेंट (एमएफए) है, जो एक ऐसा समझौता है, जिसके तहत अमीर देशों ने अपनी मिलों की रक्षा के लिए छह दशकों से भी अधिक समय से भारत जैसे विकासशील देशों से आयात का कोटा तय कर रखा है। यह समझौता टैरिफ और व्यापार पर आम करार (गैट) के मुक्त-व्यापार नियमों से अलग है। वैश्विक बाजारों में जरूरतों को देखते हुए भारत का यह मानना था कि यदि वह पेटेंट जैसे नए मसलों पर अमेरिका की बात मान लेता है, तो कपड़ा और अन्य निर्यात पर उसे कुछ राहत मिल सकती है। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। 

जिनेवा बैठक का जो खाका सामने आया है, उसमें यह साफ नजर आता है कि व्यापार के प्रबंधन में शक्तिशाली देशों को तवज्जो दी गई और उसी छल-बल का इस्तेमाल किया गया, जिसके द्वारा विदेशी उत्पादों व सेवाओं पर गरीब देशों की स्थाई निर्भरता सुनिश्चित की जाती है। उपनिवेशीकरण के नियमों पर बेशक अब चर्चा हो रही है, लेकिन लगता यही है कि विकासशील देशों के साथ बस स्वांग रचाया जा रहा है। भारत ने यहां अच्छा भरोसा दिखाया, लेकिन व्यापार वार्ता में शायद ही कभी यह भरोसा कारगर साबित होता है।

कृषि पर डब्ल्यूटीओ समझौता (एओए) बतौर उदाहरण सामने है। यह दरअसल सरकारों की तरफ से किसानों को मिलने वाली रियायत और समर्थन बांटने वाला एक सिस्टम है। इस समझौते के तहत, सदस्य राष्ट्र एग्रीमेंट मेजरमेंट ऑफ सपोर्ट (एएमएस) के तहत उत्पादों के आधार पर या सामान्य सब्सिडी देकर अपने किसानों की मदद कर सकता है। मगर यह सहायता एक तयशुदा सीमा तक ही की जा सकती है। अमेरिका अपने किसानों को सालाना 19 अरब डॉलर की मदद देता है। इससे वहां भारतीय कपास स्पद्र्धा में पिछड़ जाती है। 

एओए नियमों के मुताबिक, विकासशील देशों में कृषि उत्पादन लागत का अधिकतम 10 प्रतिशत ही मदद हो सकती है, जबकि विकसित अर्थव्यवस्था के लिए यह सीमा पांच फीसदी है। मगर कपास उगाने वाले भारतीय किसानों को पश्चिम (खासतौर से अमेरिका) के किसानों की तरह कोई सब्सिडी नहीं मिलती। इस कारण उनके लिए विदेश के बड़े बाजारों में अपनी पकड़ बनाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। भारत का इतिहास और अर्थशास्त्र उनकी स्थिति को और बदतर बना देते हैं। 

इस प्रसंग की चर्चा यहां इसलिए जरूरी है, क्योंकि यह पश्चिम की मंशा का भी भंडाफोड़ करता है। दरअसल, एमएफए को दस साल के भीतर हटाने की प्रक्रिया एक जनवरी, 1995 को शुरू हुई। उस वक्त यूरोपीय, अमेरिकी और अन्य अमीर आयातकों ने अपने 16 फीसदी कपड़ा व्यापार को एमएफए के दायरे से बाहर निकालकर उसे डब्ल्यूटीओ द्वारा तय प्रतिबंध या कोटा के सामान्य नियमों में शामिल कर दिया। अगले तीन चरणों में सभी प्रतिबंध या कोटा खत्म होने वाले थे, और 31 दिसंबर, 2004 को घड़ी की सुई के 12 बजाते ही कपड़ा व्यापार मुक्त हो जाता।

मुक्त-व्यापार के दायरे में पैराशूट और सीट बेल्ट से लेकर महिलाओं के पेटीकोट और फर्श कवर करने वाले उत्पाद रखे गए। गैट के उलट डब्ल्यूटीओ एकमात्र संस्था थी। देश उन उत्पादों को नहीं चुन सकते थे, जिन्हें वे बाहर रखना चाहते थे। नतीजतन, एक-दूसरे देशों से खासा बदला लिया गया। मसलन, यदि आप किसी देश का स्टील नहीं खरीदते, तो वह अपने यहां आपके आम की आवक रोक सकता है। दिल्ली का अपना गणित भी इसी नीति को आगे बढ़ाता है। भारत सहित गरीब देशों के किसानों में कपास की खेती को लेकर एक नया आकर्षण पश्चिम में आधुनिक खादी पहनने को लेकर होने वाले फैशन शो पैदा कर रहे हैं। 

मुक्त व्यापार की जंग में पेटेंट और सूचना प्रौद्योगिकी का जो हश्र है, वही भारत से निर्यात होने वाले कपास और कपड़े का माना जाता है। देश में खादी और कपास को लेकर कई प्रयास तो हुए, पर वे लागत और मूल्य के बीच के अंतर को प्रभावित करने वाले कारकों को पहचानने में विफल रहे हैं। इसलिए अक्सर यह सुनने को मिलता है कि ‘इसकी लागत सिर्फ पांच डॉलर (करीब साढ़े तीन सौ रुपये)’ है, जो यूरोप में या फिर दिल्ली के पॉश इलाकों में दस गुना अधिक कीमतों में बिकता है। आज दुनिया भर के देश अपने राष्ट्रीय उत्पादों को महत्व देते हैं और उन्हें राष्ट्रीय खजाना मानते हैं। खादी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा से जुड़ी रही है। आखिर कब तक हम इसे लेकर मौजूदा वैश्विक कारोबारी नियमों के तहत संघर्ष करते रहेंगे?
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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