Hindustan Opinion Column November 18th - क्यों बजी यह खतरे की घंटी DA Image
15 दिसंबर, 2019|4:14|IST

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क्यों बजी यह खतरे की घंटी

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देश की दो बड़ी मोबाइल कंपनियों के तिमाही नतीजे एकदम लहूलुहान नजारा पेश कर रहे हैं। वोडाफोन आइडिया को जुलाई से सितंबर के बीच 50 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ है, यानी आधा ट्रिलियन। यह भारत के इतिहास में किसी भी कंपनी का सबसे बड़ा तिमाही घाटा है। इसके साथ एयरटेल का करीब 23 हजार करोड़ रुपये का घाटा भी जोड़ दें, तो यह रकम बन जाती है लगभग 74 हजार करोड़।

छह महीने पहले ही वोडाफोन आइडिया ने राइट्स इशू के रास्ते 25 हजार करोड़ रुपये जुटाए थे। दोनों बडे़ पार्टनरों वोडाफोन और आदित्य बिड़ला समूह ने उसमें मोटा पैसा लगाया था। 12.5 रुपये के भाव पर शेयर मिले थे और बाजार भाव था करीब 20 रुपये। बहुत से लोगों ने इस साढे़ सात रुपये के चक्कर में बाजार से शेयर खरीदकर उसमें पैसे लगाए, ताकि राइट्स का लाभ ले सकें। मगर ये साढ़े सात रुपये ही उनके लिए साढे़ साती बन गए। गुरुवार को शेयर का भाव तीन रुपये पर बंद हुआ। यानी 20 रुपये वालों को सत्तरह रुपये और 12 रुपये वालों को नौ रुपये का सीधा नुकसान।

हालांकि भारती एयरटेल के शेयर पर इसका कोई असर नहीं दिखा। वह रिजल्ट के बाद 360 के आस-पास था और शुक्रवार को सुबह ही सात प्रतिशत से ज्यादा उछल भी गया। शुक्रवार को ही वोडाफोन के शेयर में भी लगभग ऐसी ही तेजी दिखी। हालांकि जितना वह गिरा है, उसके मुकाबले तो यह ऊंट के मुंह में जीरा जैसा ही है। लेकिन इन दोनों के सामने इस घाटे से भी बड़ी चिंता है। पहले तो पूरी टेलीकॉम इंडस्ट्री रिलायंस जियो की गलाकाट दरों से आतंकित और आक्रांत है। ऊपर से कोढ़ में खाज का काम कर दिया है सरकार ने। उसका कहना है कि अब सुप्रीम कोर्ट से मामला तय होने के बाद कंपनियों को कमाई में से उसके हिस्से की रकम तुरंत दे देनी चाहिए। यानी वोडाफोन को 28 हजार करोड़ और एयरटेल को करीब 21 हजार करोड़ भरने होंगे।

ऐसे ही बिल बाकी टेलीकॉम कंपनियों के पास भी पहुंचे हैं। सरकार ने दावा किया था कि टेलीकॉम कंपनियां अपनी आमदनी घटाकर दिखा रही हैं या जिस गणित से वे अपनी कमाई जोड़ रही हैं, वह गलत है। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला किया कि सरकार सही कह रही है और इन कंपनियों को उसके बताए गणित से ही अपनी कमाई से उसे वह हिस्सा देना होगा, जो लाइसेंस की शर्तों में शामिल है। खलबली मचनी ही थी। एक तरफ टेेलीकॉम उद्योग को आश्वासन मिला हुआ है कि सरकार उसे राहत पहुंचाने के इंतजामों पर विचाार कर रही है और दूसरी तरफ यह नोटिस। चिंता तो होगी ही।

वोडाफोन की चिंता सिर्फ यह घाटा या यह नोटिस नहीं है। उसके सीईओ ने तो कह दिया था कि अगर सरकार से मदद नहीं मिली, तो कंपनी को बंद करना ही एक रास्ता रह जाएगा। हालांकि सरकार ने त्योरियां चढ़ाईं, तो अगले ही दिन यह खबर भी आ गई कि उन्होंने प्रधानमंत्री और संचार मंत्री को चिट्ठी लिखकर न सिर्फ इसे गलत बताया, बल्कि ऐसी गलतफहमी पर माफी भी मांगी। लेकिन सवाल यह है कि अब वोडाफोन आइडिया के पास रास्ते क्या हैं? इसी सवाल में इस बात का जवाब भी छिपा है कि एयरटेल के शेयर होल्डर परेशान क्यों नहीं हुए, जबकि उनकी कंपनी को भी करीब 34 हजार करोड़ रुपये का झटका लगने की खबर है। हालांकि उनके मैनेजमेंट ने भी चेतावनी दी है कि ऐसा ही चला, तो कंपनी डूब सकती है।

दरअसल, वोडाफोन आइडिया नाजुक हालत में है। कंपनी की देनदारी 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की है और उसके खातों में नकद रकम करीब 15 हजार करोड़ ही है। दोनों कंपनियां (वोडाफोन और आइडिया) बाजार के मुकाबले से परेशान होकर ही एक हुई थीं। दोनों बड़े भागीदार छह महीने पहले ही मोटी रकम कंपनी में डाल चुके हैं। इसके बाद अगर सरकार वसूली पर अड़ गई, तो और पैसा लगाकर ये रकम भरने के मूड में नहीं हैं। साफ है, ऐेसे में कंपनी के पास बंद होने के अलावा कोई रास्ता बचेगा नहीं। अब उनकी इकलौती उम्मीद सरकार से आने वाले राहत पैकेज पर टिकी है।

अब समझिए किस्सा एयरटेल का। उसने अपनी बैलेंस शीट में दिखा दिया है कि जरूरत पड़ी, तो कंपनी सरकार को 34 हजार करोड़ रुपये की यह रकम दे देगी। उसके पास भी नकद करीब 18 हजार करोड़ हैं और वह 1़18 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में भी है। मैनेजमेंट      कह भी रहा है कि इस तरह कारोबार चल नहीं सकता। उसकी उम्मीद की वजह है कि अगर सरकार से राहत मिल गई, तो यह रकम बच जाएगी,और नहीं मिली, तो वोडाफोन आइडिया के बंद होने पर उसे बहुत सारे नए ग्राहक मिल सकते हैं।

लेकिन हम आप यानी टेलीकॉम ग्राहकों का क्या? इस झगडे़ में कहीं हमारी-आपकी घंटी तो नहीं बज जाएगी? अगर वोडाफोन नहीं रहा, तो फिर बाजार में सिर्फ दो ही बड़े खिलाड़ी बचेंगे और वे या तो एक-दूसरे को हलाल करने में जुटेंगे या फिर आपस में मिल जाएंगे और वापस रेट बढ़ने की कहानी शुरू होगी। किस्से में रिलायंस जियो का जिक्र अभी तक नहीं आया था। इसलिए, क्योंकि उसने अभी हाल तक बहुत सी चीजों के पैसे लेने तो शुरू किए ही नहीं थे। अब कर दिए हैं, तो जल्दी ही पता चलेगा कि आगे वह प्राइस वार को लंबा खींचने के मूड में है या नहीं? यह सवाल इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि सरकार की दोनों टेलीकॉम कंपनियां बीएसएनएल और एमटीएनएल अब अपनी आखिरी सांसें गिन रही हैं।

बस एक बात समझ में नहीं आती कि इतना नुकसान का धंधा है, तो सेठ लोग कारोबार क्यों कर रहे हैं? और सरकार मदद क्यों देती है? उसके अपने बीएसएनएल और एमटीएनएल तो इन्हीं सेठों से मुकाबला हारकर बर्बाद हुए हैं। तो फिर सरकार उन्हीं को क्यों नहीं चला लेती? और अगर सरकार को ऐसे कामों में नहीं पड़ना चाहिए, तो उसे हर कुछ साल बाद इन कंपनियों के कटोरे में कुछ डालने की मजबूरी क्यों? कोई फोन लेता है बात करने के लिए, तो बात के पैसे दे। इंसान फोन लेता है तरक्की करने के लिए, तो अपनी तरक्की के पैसे दे। अगर वह फोन लेता है दिन भर डेटा डाउनलोड कर मनोरंजन  करने के लिए, तो वह मनोरंजन के पैसे दे। यह सब सरकार को ही क्यों करे?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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