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डिजिटल लेन-देन पर न लगे दाग

तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा... कबीर दास ने जब यह कहा, तो इसका अर्थ बहुत गूढ़ था। मगर सामान्य भाषा में इसका अर्थ आसान है- सावधान न रहेंगे, तो कोई आपकी गठरी या जेब साफ कर सकता है। आज चूंकि...

डिजिटल लेन-देन पर न लगे दाग
Pankaj Tomarआलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकारSun, 12 May 2024 09:58 PM
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तेरी गठरी में लागा चोर मुसाफिर जाग जरा... कबीर दास ने जब यह कहा, तो इसका अर्थ बहुत गूढ़ था। मगर सामान्य भाषा में इसका अर्थ आसान है- सावधान न रहेंगे, तो कोई आपकी गठरी या जेब साफ कर सकता है। आज चूंकि आप अमूमन अपना माल-मत्ता मोबाइल फोन में ही लेकर चलते हैं, इसलिए चोरों के लिए भी आसान हो गया है कि बिना हाथ लगाए, यानी कैशलेस अंदाज में ही वे इसे साफ कर डालें। ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी’ वाली कहावत अब सड़क पर ही नहीं, डिजिटल दुनिया में भी चरितार्थ हो रही है। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि डिजिटल लेन-देन खतरनाक है या इससे किनारा कर लेना चाहिए। मगर इतना साफ है कि लेन-देन जितना आसान होता जा रहा है, अपने पैसे और उससे जुड़ी जानकारी की हिफाजत उतनी ही जरूरी और मुश्किल होती जा रही है।
समझने में आसानी होगी यह जानकर कि डिजिटल लेन-देन की दुनिया में जालसाजी का आलम क्या है? ट्रांसयूनियन एक इंफॉर्मेशन और इनसाइट कंपनी है। वह दुनिया भर में डिजिटल और बैंकिंग या क्रेडिट कार्ड के जरिये होने वाले लेन-देन को सुरक्षित रखने के लिए जरूरी आंकडे़ जुटाती है। दुनिया भर में लेन-देन के कारोबार में जालसाजी पर उसकी ताजा रिपोर्ट बताती है कि साल 2023 में जितना डिजिटल लेन-देन हुआ, उनमें से करीब पांच प्रतिशत पर जालसाजी का शक है। लेन-देन के संदिग्ध मामलों की गिनती इस साल पिछले वर्ष के मुकाबले 14 फीसदी बढ़ी है। जालसाजी की रफ्तार कितनी तेज है, इसका नमूना यह है कि 2019 से 2023 के बीच जहां कुल डिजिटल लेन-देन का काम 90 फीसदी बढ़ा, वहीं जालसाजी वाले या इसकी आशंका वाले लेन-देन में 105 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
आपके क्रेडिट कार्ड का ब्योरा चुराकर या उसकी कॉपी बनाकर ठगी करने के किस्से अब भी बंद नहीं हुए हैं। इसी तरह, किसी न किसी बहाने से फोन पर आपका ब्योरा चुराने की कोशिशें भी लगातार जारी हैं। हाल तो यह है कि अगर अपने शहर से बाहर अचानक आपका फोन खो जाए और आप किसी दूसरे नंबर से अपने दोस्तों-परिचितों से मदद मांगने की कोशिश करें, तो ज्यादातर मामलों में उन्हें पहले शक होता है कि कोई जालसाज खेल तो नहीं कर रहा? आपके फेसबुक अकाउंट या वाट्सएप को हैक करके या उसका क्लोन बनाकर आपके नाम पर लोगों से पैसे मांगने वाली ठगी का कारोबार भी जोरों पर है।
भारत डिजिटल लेन-देन के मामले में दुनिया में अगली कतार में खड़े देशों में शामिल है। यूपीआई से लेन-देन की शुरुआत 2016 में हो गई थी, लेकिन खासकर नोटबंदी और कोरोना के बाद इसमें जबर्दस्त तेजी आई है। 2023 में भारत में यूपीआई के जरिये होने वाले लेन-देन की गिनती 117.6 अरब थी। यहां कुल मिलाकर 182 लाख करोड़ रुपये का लेन-देन हुआ। इसी साल जनवरी से दिसंबर के बीच यूपीआई के इस्तेमाल में 49 प्रतिशत का उछाल देखा गया और तेजी का यह सिलसिला थमा नहीं है। अनुमान है कि जल्द ही हर महीने 20 लाख करोड़ रुपये का लेन-देन इस रास्ते होने लगेगा। इसमें क्रेडिट कार्ड, मोबाइल बैंकिंग, नेट बैंकिंग या दूसरे चैनलों से होने वाला ऑनलाइन लेन-देन शामिल नहीं है। ऐसे में, डिजिटल चोरी या जालसाजी की आशंका भी बढ़ती जा रही है।
रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में डिजिटल फ्रॉड के 6,659 मामले सामने आए, जिनमें 276 करोड़ रुपये की ठगी हुई। जबकि, उससे पिछले साल 3,596 मामलों में 155 करोड़ रुपये की जालसाजी की खबर मिली थी। ध्यान रहे कि ये वही मामले हैं, जिनकी शिकायत रिजर्व बैंक तक पहुंची है। बहुत से लोग रकम गंवाने के बाद भी उसकी शिकायत करने की जहमत नहीं उठाते हैं। कई मामलों में तो लोगों को ठगी की जानकारी भी नहीं हो पाती।
मगर जब ऐसी जालसाजी किसी कंपनी के साथ होती है, तो उसे वह ठगी की रकम से कहीं ज्यादा महंगी पड़ती है। डिजिटल जालसाजी रोकने के कारोबार की दिग्गज कंपनी लेक्सिसनेक्सिस रिस्क सॉल्यूशंस ने ‘ट्रू कॉस्ट ऑफ फ्रॉड’ नाम की रिपोर्ट निकाली है, जिसमें एशिया प्रशांत क्षेत्र की तमाम कंपनियों का सर्वे करके यह हिसाब जोड़ा गया है कि जालसाजी जितनी रकम की होती है, उसके मुकाबले कंपनियों को इससे कितने की चोट पड़ती है? इसके मुताबिक, अगर कहीं एक रुपये की जालसाजी होती है, तो उसके ऊपर होने वाला कुल खर्च करीब चार गुना हो जाता है। इसमें डूबी हुई रकम के अलावा उसकी भरपायी के लिए होने वाली मेहनत, कानूनी कार्रवाई, कंपनी की साख का नुकसान और इसके साथ जुड़े छोटे-बड़े खर्च शामिल होते हैं।
आज ठगी के एक से एक नायाब तरीके सामने आ रहे हैं। ई-मेल या वाट्सएप पर लिंक भेजकर फिशिंग। कोई इनाम जीतने का लालच देकर ठगना। आपका बिजली कनेक्शन कट जाएगा, आपका कोई दोस्त या रिश्तेदार पुलिस थाने में है, आपका कोई पार्सल विदेश से आकर कस्टम में अटका है आदि धमकी देकर किसी तरह क्रेडिट कार्ड का ब्योरा हासिल करना। फोन पर बातों में उलझाकर ओटीपी हासिल करना- ये सब तो पहले से चल रहे थे, लेकिन अब ऑनलाइन गेम के नाम पर, शेयर बाजार में किसी बड़े एक्सपर्ट का चेहरा लगाकर उससे मुलाकात या उसकी सलाह के नाम पर, बड़े-बड़े व्यापारियों की तस्वीरों के साथ कोई खास कोर्स चलाने के नाम पर भी ठगी के नए जाल बिछाए जा रहे हैं। आगे और भी नए तरीके सामने आते जाएंगे। 
आखिर इनसे बचें कैसे? यह चिंता सरकार को भी है, इसीलिए हाल में वित्त मंत्रालय ने देश की फाइनेंशियल टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ इस मसले पर चर्चा की और ऐसी जालसाजी पर लगाम कसने की तैयारी शुरू कर दी है। बैंकों और लेन-देन के काम में लगी कंपनियों ने भी ऐसे इंतजाम किए हैं, ताकि आपकी इच्छा के बिना आपके खाते या कार्ड से पैसा निकालना संभव न हो। हालांकि, जब कहीं ‘डाटा ब्रीच’ की खबर आती है, तो सावधानी और बढ़ाने की जरूरत बढ़ जाती है। लिहाजा, सबसे जरूरी यही है कि अपने क्रेडिट कार्ड या बैंक खाते से जुड़ी हरेक जानकारी बेहद गोपनीय रखी जाए और जरा भी शक होने पर उसकी रिपोर्ट बैंक या पुलिस को की जाए। वहीं, सरकार को भी बाकी सब चीजों के साथ इतना इंतजाम जरूर करना चाहिए कि पूरे बाजार में हर दुकान जिस अंधाधुंध अंदाज में ग्राहकों के मोबाइल फोन नंबर व अन्य जानकारी जमा करने में लगी है, उस पर कम से कम लगाम लगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)