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कन्याकुमारी में साधना से नए संकल्प

लोकतंत्र की जननी में लोकतंत्र के सबसे बडे़ महापर्व का एक पड़ाव आज 1 जून को पूरा हो रहा है। तीन दिन तक कन्याकुमारी में आध्यात्मिक यात्रा के बाद मैं दिल्ली जाने के लिए हवाई जहाज में आकर बैठा  ही हूं...

कन्याकुमारी में साधना से नए संकल्प
rahul gandhi and arvind kejriwal got support from pakistan pm modi said matter of investigation
Pankaj Tomarनरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री, भारतSun, 02 Jun 2024 10:44 PM
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लोकतंत्र की जननी में लोकतंत्र के सबसे बडे़ महापर्व का एक पड़ाव आज 1 जून को पूरा हो रहा है। तीन दिन तक कन्याकुमारी में आध्यात्मिक यात्रा के बाद मैं दिल्ली जाने के लिए हवाई जहाज में आकर बैठा 
ही हूं...काशी और अनेक सीटों पर मतदान चल रहा है। कितने सारे अनुभव हैं, कितनी सारी अनुभूतियां हैं... मैं एक असीम ऊर्जा का प्रवाह स्वयं में महसूस कर रहा हूं। 
वाकई, 2024 के चुनाव में कितने ही सुखद संयोग बने हैं। अमृतकाल के इस प्रथम लोकसभा चुनाव में मैंने प्रचार अभियान 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणास्थली मेरठ से शुरू किया। मां भारती की परिक्रमा करते हुए इस चुनाव की मेरी आखिरी सभा पंजाब के होशियारपुर में हुई। संत रविदास जी की तपोभूमि, हमारे गुरुओं की भूमि पंजाब में आखिरी सभा होने का सौभाग्य भी बहुत विशेष है। इसके बाद मुझे कन्याकुमारी में भारतमाता के चरणों में बैठने का अवसर मिला। उन शुरुआती पलों में चुनाव का कोलाहल मेरे मन-मस्तिष्क में गूंज रहा था। रैलियों में, रोड शो में देखे हुए अनगिनत चेहरे मेरी आंखों के सामने आ रहे थे। माताओं-बहनों-बेटियों के असीम प्रेम का वह ज्वार, उनका आशीर्वाद ...उनकी आंखों में मेरे लिए विश्वास, दुलार...मैं सब कुछ आत्मसात कर रहा था। मेरी आंखें नम हो रही थीं...मैं शून्यता में जा रहा था, साधना में प्रवेश कर रहा था।
कुछ ही क्षणों में राजनीतिक वाद विवाद, वार-पलटवार...आरोपों के स्वर और शब्द, वह सब अपने आप शून्य में समाते चले गए। मेरे मन में विरक्ति का भाव और तीव्र हो गया...मेरा मन बाह्य जगत से पूरी तरह अलिप्त हो गया। इतने बड़े दायित्वों के बीच ऐसी साधना कठिन होती है, लेकिन कन्याकुमारी की भूमि और स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा ने इसे सहज बना दिया। कन्याकुमारी के उगते सूर्य ने मेरे विचारों को नई ऊंचाई दी, सागर की विशालता ने मेरे विचारों को विस्तार दिया और क्षितिज के विस्तार ने ब्रह्मांड की गहराई में समाई एकात्मकता का निरंतर एहसास कराया। ऐसा लग रहा था, जैसे दशकों पहले हिमालय की गोद में किए गए चिंतन और अनुभव पुनर्जीवित हो रहे हों। 
कन्याकुमारी संगमों के संगम की धरती है। हमारे देश की पवित्र नदियां अलग-अलग समुद्रों में जाकर मिलती हैं और यहां उन समुद्रों का संगम होता है। और यहां एक और महान संगम दिखता है- भारत का वैचारिक संगम! यहां विवेकानंद शिला स्मारक के साथ ही संत तिरुवल्लूवर की विशाल प्रतिमा, गांधी मंडपम और कामराजर मणि मंडपम हैं। 
भारत हजारों वर्षों से विचारों के अनुसंधान का केंद्र रहा है। हमने जो अर्जित किया, उसे कभी अपनी व्यक्तिगत पूंजी मानकर आर्थिक या भौतिक मापदंडों पर नहीं तौला। इसीलिए, इदं न मम  यह भारत के चरित्र का सहज एवं स्वाभाविक हिस्सा हो गया है। भारत के कल्याण से विश्व का कल्याण, भारत की प्रगति से विश्व की प्रगति, इसका एक बड़ा उदाहरण हमारी आजादी का आंदोलन भी है। 
आज भारत का गवर्नेंस मॉडल दुनिया के कई देशों के लिए एक उदाहरण बना है। सिर्फ 10 वर्षों में 25 करोड़ लोगों का गरीबी से बाहर निकलना अभूतपूर्व है। ‘प्रो-पीपल गुड गवर्नेंस’ जैसे अभिनव प्रयोग की आज विश्व में चर्चा हो रही है। भारत का डिजिटल इंडिया अभियान आज पूरे विश्व के लिए उदाहरण है कि हम कैसे टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल गरीबों को सशक्त करने, पारदर्शिता लाने, उनके अधिकार दिलाने में कर सकते हैं। भारत में सस्ता डाटा आज सूचना और सेवाओं तक गरीब की पहुंच सुनिश्चित करके सामाजिक समानता का माध्यम बन रहा है। 
आज भारत की प्रगति और भारत का उत्थान केवल भारत के लिए बड़ा अवसर नहीं है। ये सभी सहयात्री देशों के लिए भी एक ऐतिहासिक अवसर है। जी-20 की सफलता के बाद से विश्व भारत की इस भूमिका को और अधिक मुखर होकर स्वीकार कर रहा है। आज भारत को ग्लोबल साउथ की एक सशक्त आवाज के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। अब एक भी पल गंवाए बिना हमें बड़े दायित्वों और बड़े लक्ष्यों की दिशा में कदम उठाने होंगे। हमें नए स्वप्न देखने हैं और उन सपनों को जीना शुरू करना है। आज की वैश्विक परिस्थितियों में युवा राष्ट्र के रूप में भारत का सामर्थ्य हमारे लिए एक ऐसा सुखद संयोग और सुअवसर है, जहां से हमें पीछे मुड़कर नहीं देखना है।
21वीं सदी की दुनिया आज भारत की ओर बहुत आशाओं से देख रही है और वैश्विक परिदृश्य में आगे बढ़ने के लिए हमें कई बदलाव भी करने होंगे। भारत सुधार को केवल आर्थिक बदलावों तक सीमित नहीं रख सकते हैं। हमें जीवन के हर क्षेत्र में सुधार की दिशा में आगे बढ़ना होगा। हमें हर पल इस बात पर गर्व होना चाहिए कि ईश्वर ने हमें भारत भूमि में जन्म दिया है। ईश्वर ने हमें भारत की सेवा और इसकी शिखर यात्रा में हमारी भूमिका निभाने के लिए चुना है। हमें प्राचीन मूल्यों को आधुनिक स्वरूप में अपनाते हुए अपनी विरासत को आधुनिक ढंग से पुनर्परिभाषित करना होगा। हमें एक राष्ट्र के रूप में पुरानी पड़ चुकी सोच और मान्यताओं का परिमार्जन भी करना होगा। हमें हमारे समाज को पेशेवर निराशावादियों के दबाव से बाहर निकालना है। हमें याद रखना है, नकारात्मकता से मुक्ति, सफलता की सिद्धि तक पहुंचने के लिए पहली जड़ी-बूटी है। सकारात्मकता की गोद में ही सफलता पलती है।
भारत की अनंत और अमर शक्ति के प्रति मेरी आस्था, श्रद्धा और विश्वास भी दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। मैंने पिछले 10 वर्षों में भारत के इस सामर्थ्य को और ज्यादा बढ़ते देखा है, ज्यादा अनुभव किया है। जिस तरह हमने 20वीं सदी के चौथे-पांचवें दशक को अपनी आजादी के लिए प्रयोग किया, उसी तरह 21वीं सदी के इन 25 वर्षों में हमें विकसित भारत की नींव रखनी है। स्वतंत्रता संग्राम के समय देशवासियों के सामने बलिदान का समय था। आज बलिदान का नहीं, निरंतर योगदान का समय है।
स्वामी विवेकानंद ने 1897 में कहा था कि हमें अगले 50 वर्ष केवल और केवल राष्ट्र के लिए समर्पित करने होंगे। उनके इस आह्वान के ठीक 50 वर्ष बाद 1947 में भारत आजाद हो गया। आज हमारे पास वैसा ही स्वर्णिम अवसर है। हम अगले 25 वर्ष केवल और केवल राष्ट्र के लिए समर्पित करें। हमारे ये प्रयास आने वाली पीढ़ियों और आने वाली शताब्दियों के लिए नए भारत की सुदृढ़ नींव बनकर अमर रहेंगे। मैं देश की ऊर्जा को देखकर यह कह सकता हूं कि लक्ष्य अब दूर नहीं है। आइए, तेज कदमों से चलें... मिलकर चलें, भारत को विकसित बनाएं।
(यह लेख प्रधानमंत्री ने 1 जून की शाम कन्याकुमारी से दिल्ली लौटते हुए कलमबद्ध किया है)