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हांफती वैश्विक अर्थव्यवस्था के मायने

अब मंदी भी ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ की तर्ज पर आती दिख रही है। कोरोना के बाद लंबे समय तक मंदी की आशंका रही। किसी न किसी तरह दुनिया उस डर से बाहर निकलती कि नए खतरे के बादल मंडराने लगे, यूक्रेन...

हांफती वैश्विक अर्थव्यवस्था के मायने
Pankaj Tomarआलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकारSun, 18 Feb 2024 11:04 PM
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अब मंदी भी ‘भेड़िया आया, भेड़िया आया’ की तर्ज पर आती दिख रही है। कोरोना के बाद लंबे समय तक मंदी की आशंका रही। किसी न किसी तरह दुनिया उस डर से बाहर निकलती कि नए खतरे के बादल मंडराने लगे, यूक्रेन व गाजा में युद्ध छिड़ गया और अब तो भेड़िया आ ही गया है। दुनिया की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से दो मंदी में जा चुकी हैं। साल 2023 की आखिरी तिमाही में ब्रिटेन की जीडीपी में 0.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है। उधर, जापान की अर्थव्यवस्था में भी 0.4 फीसदी की अप्रत्याशित गिरावट आई है। यह देश कभी लंबे समय तक दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्था रहा है। जापान की जीडीपी में इससे पहले की तिमाही में 3.3 प्रतिशत की बड़ी गिरावट आ चुकी थी। यानी, लगातार दो तिमाहियों में गिरावट। अर्थशास्त्र में यही मंदी की तकनीकी परिभाषा है। ब्रिटेन में पिछली तिमाही की गिरावट 0.1 प्रतिशत की थी। 
ये दोनों दुनिया के सात सबसे अमीर देशों में शामिल हैं, जी-7 के सदस्य हैं। इनकी अर्थव्यवस्था में गिरावट या ठहराव दुनिया के लिए चिंता का कारण इसलिए भी है, क्योंकि अगर अमीरों का यह हाल होगा, तो बाकी का क्या होगा? दोनों ही देशों का यह हाल इसलिए और भी चिंताजनक है, क्योंकि यह तमाम अर्थशा्त्रिरयों की आशंकाओं से भी बुरा है। समाचार एजेंसी रॉयटर्स  ऐसे आंकड़ों से पहले अर्थशा्त्रिरयों से उनके अनुमान पूछती है। इस बार के सर्वे में शामिल सभी अर्थशास्त्री एकमत थे कि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में 0.1 प्रतिशत की गिरावट दिख सकती है। उधर, जापान में ब्लूमबर्ग  के ऐसे ही सर्वे में शामिल 34 में से सिर्फ एक अर्थशास्त्री ने मंदी की आशंका जताई थी, बाकी सबकी राय का निचोड़ था कि जीडीपी में 1.1 प्रतिशत की वृद्धि की संभावना है। जाहिर है, दोनों ही जगह मंदी ने विद्वानों को हतप्रभ कर दिया है, और सरकारों के साथ-साथ केंद्रीय बैंकों के लिए भी राह काफी मुश्किल कर दी है। यह एक बड़ा सवाल है कि क्या इन दोनों देशों की मंदी बाकी दुनिया के लिए भी खतरे की घंटी है? 
ऐसा नहीं है कि यह अचानक हुआ है। यूक्रेन पर रूस के हमले से ही चिंताएं बढ़ने लगी थीं और इजरायल पर हमास के हमले के बाद तो कई बड़े जानकारों ने एकदम साफ चेतावनी दे दी थी कि यह संघर्ष दुनिया को मंदी की तरफ धकेल सकता है। दुनिया की सबसे बड़ी म्यूचुअल फंड कंपनी ब्लैकरॉक के सीईओ लैरी फिंक ने तीन महीने पहले ही कहा था कि हमास का हमला, इजरायल की जवाबी कार्रवाई और यूक्रेन पर रूस के हमले जैसी घटनाओं ने मिलकर दुनिया को एक नए भविष्य की तरफ धकेल दिया है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि पूरी दुनिया में उम्मीदें कम हो रही हैं और आशंकाएं बढ़ रही हैं। जब डर बढ़ता है, तो लोग खर्च और खरीदारी कम कर देते हैं, इसीलिए आशंकाओं का बढ़ना लंबे दौर में मंदी का कारण बनता है। 
अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जे पी मॉर्गन के मुखिया जेमी डिमोन तो इससे भी करीब एक महीने पहले चेता चुके थे कि इस वक्त दुनिया अपने कई दशकों के इतिहास में शायद सबसे खतरनाक दौर से गुजर रही है। इसके करीब तीन हफ्ते बाद उन्होंने संडे टाइम्स अखबार से बातचीत में कहा कि यूक्रेन की लड़ाई और इजरायल-हमास का संघर्ष, दोनों बहुत डरावनी घटनाएं हैं, जिनके नतीजे के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, पर विश्व राजनीति की दृष्टि से यह घटनाक्रम पूरे विश्व के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण मसला है।
भविष्य में बहुत दूर न जाएं, तब भी क्या यह वास्तव में इतनी बड़ी समस्या है कि दुनिया को चिंता करनी चाहिए? क्या विश्वव्यापी मंदी का खतरा भी हो सकता है? इस साल की शुरुआत में अपनी ग्लोबल रिस्क रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने जो कहा था, वह इस सवाल का कुछ हद तक जवाब देता है। इसमें 102 देशों के निजी क्षेत्र के अधिकारियों के बीच हुए एग्जिक्यूटिव ओपिनियन सर्वे के परिणाम भी शामिल हैं। सर्वे में शामिल लोगों ने इस वक्त के जो पांच सबसे बड़े खतरे गिनाए, उनमें आर्थिक मंदी का डर प्रमुख है। मुद्रा कोष के अनुसार, आर्थिक मंदी को दो तरह से देखा जा सकता है, या तो दुनिया का आर्थिक विकास बढ़ने की जगह कम हो जाए, जैसे अभी जापान और ब्रिटेन में दिखा। या फिर, कई वर्षों तक अर्थव्यवस्था के बढ़ने की रफ्तार सुस्त हो जाए या थम जाए। हालांकि, मुद्रा कोष के जिम्मेदार अधिकारी अभी मंदी की भविष्यवाणी करने से कतरा रहे हैं, लेकिन संगठन का यह तो मानना है कि अर्थव्यवस्था में बढ़त की रफ्तार कम हो रही है, जिससे अनिश्चितता बढ़ रही है।
उधर जापान में आर्थिक स्थिति की भविष्यवाणी करने के लिए मशहूर आर्थिक विशेषज्ञ योशिकी शिंके ने चेताया है कि मौजूदा तिमाही, यानी जनवरी से मार्च के बीच भी जापान मंदी से बाहर नहीं निकलने वाला है। जापान के लिए यह मुश्किल काफी विकट हो सकती है। बैंक ऑफ जापान 2007 के बाद पहली बार ब्याज दरें बढ़ाने की सोच रहा था, जो करना अब शायद बेहद मुश्किल हो जाए। जापान में पिछले कई साल से ब्याज दर जीरो से नीचे चल रही है, यानी आप बैंक में पैसा रखेंगे, तो उस पर ब्याज मिलने के बजाय आपको ब्याज भरना पड़ेगा, और जो लोग कर्ज लेंगे, उन्हें मूल से कम रकम लौटानी होगी। ऐसा इसलिए, ताकि लोग बचत के बजाय खर्च करें और उद्योगपति नए कारोबार शुरू करने से न कतराएं। मगर 2016 में लागू हुई इस नीति के आठ साल बाद भी इसका साफ असर नहीं दिख पाया है। 
हालांकि, शिंके को लगता है कि इस सबके बावजूद बैंक ऑफ जापान ब्याज दरें बढ़ा सकता है और वह अर्थव्यवस्था के बेहतर भविष्य की तरफ इशारा भी करेगा। कुछ दूसरे विद्वानों का मानना है कि जापान जिस हाल में फंसा है, वहां से निकलने के लिए वह सिर्फ अपने केंद्रीय बैंक या मौद्रिक नीति के भरोसे नहीं रह सकता, अर्थव्यवस्था में कुछ बुनियादी सुधारों से ही आगे बढ़ने का कोई रास्ता निकलेगा। क्या यूक्रेन और गाजा में युद्ध समाप्त करने से भारत व दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं को मदद मिलेगी?
इस बीच हुआ यह कि जापान की अर्थव्यवस्था दुनिया में तीसरे नंबर से खिसककर चौथे पर पहुंच चुकी है। जर्मनी उससे आगे निकल गया है। भारत भी अब ज्यादा दूर नहीं है। भारत में आर्थिक तरक्की की रफ्तार जापान, जर्मनी या किसी भी पश्चिमी देश से ज्यादा है। ऐसे में, क्या दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का भारत का लक्ष्य भी वक्त से काफी पहले साकार दिखेगा, यह सवाल बड़ा होता दिख रहा है।     
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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