Hindustan Opinion Column May 2 - उपमहाद्वीप में आईएस का जाल DA Image

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उपमहाद्वीप में आईएस का जाल

S Srinivasan Senior Tamil Journalist

ईस्टर संडे को श्रीलंका में हुए धमाकों ने पूरी दुनिया को स्तब्ध कर दिया था। शुरू-शुरू में किसी ने भी इस वारदात की जिम्मेदारी नहीं ली थी। अब यह बात सामने आ रही है कि धमाके करने वाले सभी युवा स्थानीय थे और वे सब मध्यवर्गीय व उच्च मध्यवर्गीय परिवारों से आते थे। कहा जा रहा है कि उनमें से एक ने तो बाकायदा ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया से पढ़ाई की थी। लेकिन जिस बड़े भौगोलिक दायरे में विध्वंसकारी धमाके हुए, उनसे यही संकेत निकल रहा था कि इस कांड के पीछे किसी न किसी बड़े संगठन का हाथ है। इस वारदात के चंद रोज बाद इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने इन बम धमाकों की जिम्मेदारी कबूली है। इसके सरगना अबू बकर अल बगदादी ने लगभग पांच साल बाद अचानक एक संक्षिप्त वीडियो जारी करके सबको चौंका दिया है, क्योंकि खुफिया एजेंसियां एक अमेरिकी हवाई हमले में उसके मारे जाने के निष्कर्ष पर पहुंच चुकी थीं।

इस वारदात के बाद आई खबरें बताती हैं कि भारतीय खुफिया एजेंसियों ने अपने श्रीलंकाई समकक्षों को आतंकी हमलों के बारे में आगाह किया था, मगर उन्होंने इसे नजरंदाज कर दिया। बताया जा रहा है कि भारतीय सूचनाएं काफी महत्वपूर्ण और कार्रवाई करने लायक थीं। लेकिन दशकों तक गृह युद्ध से हलकान रहे और कई घातक आतंकी हमलों को झेल चुके श्रीलंका ने इसके बाद भी कोई कदम नहीं उठाया। जाहिर है, इससे उसके आत्मसंतोषी होने का ही संकेत मिलता है। मगर भारतीय खुफिया एजेंसी (एनआईए) ने अपनी सूचनाओं की बिना पर फौरन केरल में छापे मारे और दक्षिण भारत के कई इलाकों में छानबीन की। एजेंसी ने केरल में रियाज अबू बकर को गिरफ्तार किया है। उस पर आईएस प्रेरित कासरगोड मॉड्यूल के कुछ सदस्यों से जुडे़ होने और राज्य में आत्मघाती हमलों की योजना बनाने का भी आरोप है।   

अबू बकर के डिजिटल ब्योरों ने जांचकर्ताओं को उस तक पहुंचने में मदद की। वह पिछले एक साल से भी अधिक वक्त से श्रीलंकाई बमबारी के मास्टरमाइंड जाहरान हाशिम के वीडियो और भाषणों को लगातार देखता-सुनता रहा है। बताया जाता है कि इस सेल का इरादा तमिलनाडु के हिंदू नेताओं को निशाना बनाना था। अबू बकर उन भारतीयों के भी संपर्क में था, जो आईएस के प्रभाव में आकर सीरिया या अफगानिस्तान चले गए। एनआईए ने कासरगोड मॉड्यूल से जुड़े उन संदिग्धों के घरों पर भी छापे मारे हैं, जो साल 2016 में आईएस में शामिल होने के लिए अफगानिस्तान भाग गए थे। इस मॉड्यूल के भगोड़े नेता अब्दुल राशिद अब्दुल्ला के बारे में कहा जाता है कि उसने कासरगोड के 16 लोगों को अपने गुट में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। एनआईए अब यह जांच कर रही है कि श्रीलंका के विस्फोटों से क्या इनका भी कोई रिश्ता है। इनमें 16 में से एक संदिग्ध को भारत से भागने की कोशिश में दिल्ली हवाईअड्डे पर दबोचा गया है।

इस बात की भी पड़ताल की जा रही है कि क्या ‘नेशनल तौहीद जमात’ का भारतीय संदिग्धों के साथ भी किसी तरह का संपर्क था। इसी संगठन का नाम श्रीलंका बम विस्फोटों में लिया जा रहा है। एनआईए और राज्य की खुफिया एजेंसियां इस बात की भी जांच कर रही हैं कि क्या आईएस ने केरल, तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों में किसी तरह की घुसपैठ कर ली है? 

कासरगोड मामले में दायर चार्जशीट में एनआईए ने यह दर्ज किया है कि अब्दुल्ला और उसकी बीवी आएशा ने फरवरी 2016 में श्रीलंका का दौरा किया था, जहां इन दोनों ने इस्लामिक स्टडी की कक्षाओं में भाग लिया था। लेकिन जब शिक्षक ने पाया कि अब्दुल्ला आईएस की विचारधारा वहां फैलाने की कोशिश कर रहा है, तो दोनों मियां-बीवी को कक्षा से निकाल दिया गया। श्रीलंका से लौटने के बाद अब्दुल्ला ने अपने 16 साथियों की यात्रा का बंदोबस्त किया। कासरगोड मॉड्यूल के खुलासे के बाद ही भारतीय खुफिया एजेंसियों को आईएस के अफगानिस्तान और सीरिया के शिविरों के लिए दक्षिण भारत से लड़ाकों की भर्ती की विस्तृत योजना पता चली। एनआईए उन रिपोर्टों की भी जांच कर रही है, जो यह संकेत देती हैं कि श्रीलंका धमाकों के मास्टर माइंड जाहरान ने भारत का व्यापक दौरा किया था।

आईएस का पसंदीदा रास्ता सोशल मीडिया है। यह सोशल मीडिया के वाट्सएप, टेलीग्राम जैसे मंचों के जरिए प्रोपेगेंडा वीडियो, लेख और मुसलमानों पर जुल्म की कहानियां परोसता है। इसका मकसद केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु के धनाढ्य परिवारों के पढ़े-लिखे लोगों को प्रभावित करना है। इसके पहले आईएस के नियोक्ताओं ने तेलंगाना की भर्ती करने की कोशिश की थी। इसने इंंडियन मुजाहिदीन से जुड़े नौजवानों को भी लुभाने का प्रयास किया था।

श्रीलंका में हमलों के पीछे का मकसद शुरू-शुरू में काफी रहस्यमय था। आखिर श्रीलंका ही क्यों? और तमिल ईसाई क्यों? श्रीलंकाई गृहयुद्ध के दौरान भी वहां के मुस्लिम और ईसाई समुदाय आम तौर पर संघर्ष से अलग रहे थे। ये दोनों ही समुदाय वहां अल्पसंख्यक हैं। पता चला है कि न्यूजीलैंड की मस्जिद में हुए हमले के बदले के तौर पर श्रीलंकाई विस्फोटों को अंजाम दिया गया। आखिर श्रीलंका से इतनी दूर हुए हमले ने कैसे एक श्रीलंकाई समूह को अपने ही हमवतनों को मार डालने के लिए प्रेरित किया? दिल दहला देने वाली यह घटना बताती है कि इस वैश्विक दुनिया के किसी खित्ते की कोई घटना कैसे दुनिया के सुदूर हिस्से के लोगों की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।

इन सारी बातों पर भारतीय राजनीतिक वर्ग को भी गौर करना चाहिए। भारत में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी बसती है। पहचान की राजनीति इन दिनों सबसे खराब तरीके से हो रही है। श्रीलंका की घटना ने दिखाया है कि धर्म और भाषा के मामले में यह कैसे अलग तरह के खेल करती है। भारत में जाति और वर्ग की विशिष्ट परत है। यहां खुफिया निगरानी और चौकसी बढ़ाने की जरूरत तो है ही, हमारे राजनीतिक वर्ग को भी विकास पर फोकस करने की आवश्यकता है। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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