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ब्रह्मपुत्र से गंगा तक बदलते मुद्दे

Manisha Priyam, Political Analyst

भारत के राज्यों की अपनी विशेषता है। मौजूदा लोकसभा चुनाव में इस विशेषता ने प्रतिस्पद्र्धा के अलग-अलग अखाड़े बना दिए हैं। विशिष्ट मुद्दों पर चर्चा कमोबेश हर जगह पुरजोर है। तमाम राजनीतिक दलों ने चुनाव में अपनी दावेदारी जरूर पेश की, लेकिन चुनाव की बौद्धिक और तार्किक प्रक्रिया जनता की धरोहर है। असम से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक, तमाम राज्यों में विविधता होने के बावजूद यह प्रक्रिया स्पष्ट है। शासन करने वाले संप्रभु का निर्माण लोग ही करते हैं।

शुरुआत असम से करते हैं, जहां चुनावी सूर्योदय जल्दी हुआ, मगर अब लोकसभा चुनाव के समापन से पहले ही अगले महीने होने वाले राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव की राजनीतिक गहमागहमी शुरू हो गई है। ये दोनों सीटें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और शांतिऊज कुजूर के हिस्से थीं, लेकिन इस बार भाजपा के विधायकों की संख्या 126 सदस्यीय विधानसभा में 61 है, और बोकाजान विधानसभा क्षेत्र के भाजपा विधायक नुमाल मोमिन का मानना है कि दोनों सीटों पर भाजपा ही अपने उम्मीदवार उतारेगी, हालांकि गठबंधन साथी असम गण परिषद् ने भाजपा को गठबंधन धर्म निभाने और लोकसभा चुनाव के समय दिए गए वचन के तहत उसे एक सीट देने की बात कही है। उधर, राज्य विधानसभा में कांग्रेस के पास केवल 25 सीटें हैं, लेकिन बदरुद्दीन अजमल की पार्टी एआईयूडीएफ इस ताक में है कि लोकसभा के नतीजे यदि भाजपा के पक्ष में नहीं गए, तो राजनीतिक उथल-पुथल का फायदा वह कांग्रेस के समर्थन से उठा सकती है।

अभी देश भर में कयास यही लगाई जा रही है कि केंद्र सरकार किसकी बनेगी, या वह भाजपा की अकेली होगी या किसी गठबंधन की, लेकिन असमी राजनीतिक दांव-पेच के तेवर कुछ अलग ही हैं। यहां राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी का काम बहुत तेजी से चल रहा है और नागरिकों द्वारा दायर शिकायतों पर सुनवाई चल रही है। चुनावी दंगल में बेशक भाजपा आगे दिखती हो, लेकिन अभी दो महीने पहले ही नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 के मुद्दे पर असम और मेघालय, दोनों राज्यों में भाजपा सरकार का कड़ा विरोध हुआ था। लोकसभा में पारित इस कानून के तहत धार्मिक उत्पीड़न के कारण अफगाानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भागे हुए गैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता का दावेदार बनाया जा सकता है। इस कारण यहां बांग्लादेशी घुसपैठिए और धर्म के आधार पर नागरिकों में भेद करना, आम चुनावों में दो अहम मुद्दे बन गए।

एक अन्य बड़ा मुद्दा चाय बगान के मजदूरों का है। ‘असम चाह मजदूर संघ’ से लगभग 10 लाख श्रमिक जुड़े हैं, जो 850 से ज्यादा चाय बगानों में काम करते हैं। इनमें से अधिकांश ऐसे आदिवासी मूल के हैं, जो झारखंड और छत्तीसगढ़ से ब्रिटिश सरकार द्वारा बंधुआ मजदूर की तरह लाए गए हैं। हालांकि झारखंड और छत्तीसगढ़ में ये जनजातियों की सूची में शामिल हैं, पर असम में इन्हें यह दर्जा हासिल नहीं है। इसीलिए चुनावों में इनकी मुख्य मांग यही रही कि उन्हें अनसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया जाए और उनकी न्यूनतम मजदूरी 350 रुपये की जाए। पहचान पत्र की कमी भी उनके लिए एक बड़ा मसला है।

लेकिन जब हम ब्रह्मपुत्र से गंगा के तट पर पहुंचते हैं, तो राजनीतिक नैरेटिव बिल्कुल बदल जाता है। पूर्वोत्तर के राज्यों में जहां बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला अहम है, वहीं उत्तर प्रदेश और उससे भी ज्यादा बिहार में चर्चा पाकिस्तान की है। यहां पुलवामा में क्या हुआ या बालाकोट में भारत ने क्या किया, जैसी बातें अहम हैं। बांग्लादेश कहीं चर्चा में नहीं है, जबकि दोनों राज्यों से काफी संख्या में मजदूर और छोटे ठेकेदार आज भी असम में देखे जा सकते हैं। ब्रह्मपुत्र और गंगा के मैदानी इलाकों में एक अंतर यह भी दिखता है कि पूर्वोत्तर के इलाकों में छात्र संगठन राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं और कई बार उनके सहयोग से ही राजनीति चलती है। असम में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ने ऐतिहासिक रूप से यह भूमिका निभाई है और नागरिकता कानून के खिलाफ भी मुहिम छात्र संघ ने ही संभाली थी। लेकिन इससे काफी अलग है उत्तर प्रदेश का परिदृश्य। वहां लिंगदोह कमेटी के सुझावों के आधार पर अब कई विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव नहीं होते। फिर भी छात्रों में एक चेतना है, जो राजनीतिक भी है और अपने शैक्षणिक हितों पर भी केंद्रित है।

महत्वपूर्ण यह भी है कि उत्तर भारत में गठजोड़ और गठबंधन की राजनीति अहमियत रखती है। यहां भाजपा मजबूत जरूर है, लेकिन अपनी तरफ रुझान बढ़ाने के लिए उसे सहयोगियों की दरकार है। कांग्रेस को किनारे करने की राजनीति भाजपा के अकेले दम पर संभव नहीं। गठबंधन उसके लिए अत्यंत आवश्यक है। चुनावी चर्चे में जमीन के मुद्दे भी हर जगह हावी दिखे। जहां असम में चाय बगान के मजदूरों की बात की गई, वहीं उत्तर प्रदेश में किसानी और गरीबी की चर्चा हुई। उत्तर प्रदेश के चंदौसी, कमालगंज जैसे तमाम इलाकों में महिलाओं ने यह माना कि उज्ज्वला योजना के तहत उनके घर गैस सिलेंडर पहुंचा है और किसान सम्मान निधि की किस्त भी उन्हें मिली है, लेकिन कृषि में मायूसी होने की वजह से विशेषकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की मुख्य मांग मनरेगा है। यह स्पष्ट है कि राजनीतिक दल पूरे दम-खम के साथ प्रचार-प्रसार करते हुए चुनावों में उतर तो जाते हैं, पर भूख और गरीबों के जीवन की सच्चाई का उन्हें सामना भी करना पड़ता है।

कई विश्लेषकों की राय है कि चुनावों में राष्ट्रवाद और विकास महत्वपूर्ण नारे हैं, लेकिन वोट जातिगत समीकरणों पर मिलेगा। मगर पूर्वोत्तर में जहां आदिवासी-जनजातियों की पारंपरिक पहचान और बांग्लादेशी घुसपैठियों का मामला अहम है, वहीं गंगा के मैदानी इलाकों में आक्रमणकारी पाकिस्तान की चर्चा गरम है। यहां ठाकुरवाद-ब्राह्मणवाद के साथ-साथ अपना दल, निषाद पार्टी, विकासशील इंसान पार्टी जैसी कई छोटी पार्टियों ने प्रतिस्पद्र्धा का माहौल बना दिया है। यानी राजनीति के पीछे का पूरा परिदृश्य बदल चुका है। गरीबों की आवाज अब हाशिए पर नहीं रखी जा सकती, और न इस बहुलतावादी राजनीति को कोई एक जामा पहनाया जा सकता है। ऐसे में, राजनीतिक नतीजे भी इसी विविधता और राजनीति के बारे में विवेकशील बौद्धिक तर्कों के खंडन-मंडन के संकेत होंगे। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column May 15