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बंगाल में खोई जमीन तलाशता वाम मोर्चा

यह आम चुनाव वास्तव में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है, यहां माकपा सीटें जीतने से कहीं ज्यादा अपना वोट प्रतिशत बढ़ाने की सियासी लड़ाई लड़ रही है। एक समय था जब भारत की राजनीति में वाम दलों...

बंगाल में खोई जमीन तलाशता वाम मोर्चा
Monika Minalजयंत घोषाल, वरिष्ठ पत्रकारTue, 07 May 2024 10:54 PM
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एक समय था, जब भारत की राजनीति में वाम दलों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हुआ करती थी। दिल्ली में आज भी अरुणा आसफ अली रोड है। अरुणा आसफ अली दिल्ली नगर निगम की पहली ‘चेयरपर्सन’ चुनी गई थीं। वह अपने दौर की काफी बड़ी वामपंथी नेता थीं। पश्चिम में महाराष्ट्र के श्रीपाद अमृत डांगे से लेकर तेलंगाना, आंध्र जैसे दक्षिणी प्रदेशों में, बल्कि पूरे देश में वाम नेताओं की जनता पर अच्छी पकड़ थी, केरल में तो खैर आज भी है।
ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ जब कांग्रेस देश की आजादी की लड़ाई लड़ रही थी, तब उसके भीतर ही वामपंथी और दक्षिणपंथी, दोनों तरह की सोच रखने वाले गुट सक्रिय थे। दक्षिणपंथी गुट के श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कांग्रेस से बाहर निकलकर जनसंघ की शुरुआत की, जबकि ईएमएस नंबूदिरीपाद आदि बहुत सारे नेताओं ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का दामन थाम लिया। मगर आगे चलकर वामपंथ में अंदरूनी विभाजन हुआ और आहिस्ता-आहिस्ता वाम नेताओं की पकड़ कमजोर पड़ती गई। सिर्फ पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और केरल में उनका कुछ आधार कायम रहा। केरल में आज भी उनकी सरकार है, पर पश्चिम बंगाल व त्रिपुरा में वाम मोर्चे की हालत खराब है। स्थिति यह है कि त्रिपुरा में भाजपा लगातार दूसरी बार सत्ता में आ गई है, वहीं पश्चिम बंगाल में लगभग साढे़ तीन दशक तक राज करने वाली माकपा और उसकी सहयोगी वाम पार्टियां बिल्कुल हाशिये पर चली गई हैं।
साल 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, उन्होंने ‘इंडियन सेक्युलर फ्रंट’ नाम की एक मुस्लिम पार्टी को भी इस गठबंधन का हिस्सा बनाया। नतीजा यह हुआ कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट का तो एक उम्मीदवार इस चुनाव में कामयाब रहा, पर वाम दलों और कांग्रेस का एक भी प्रत्याशी चुनाव जीत न सका। ऐसे में, आज का सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस आम चुनाव में वाम मोर्चे, खासकर माकपा की क्या रणनीति है? 
कोलकाता में अलीमुद्दीन स्ट्रीट पर माकपा का मुख्यालय है। यहीं पर पार्टी के वरिष्ठ नेता विमान बोस रहते हैं। मोहम्मद सलीम सीपीएम के राज्य सचिव बनाए गए हैं। पार्टी में यह बेहद अहम पद है। ऐसे में, सवाल उठता है कि आखिर इतने वर्षों के बाद मुस्लिम समाज के एक नेता को माकपा ने क्यों राज्य सचिव बनाया? इसके पहले मुजफ्फर अहमद, जिनको प्यार से कॉमरेड ‘काका बाबू’ पुकारते थे, को इतना सम्मान मिला था। काका बाबू पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। काका बाबू के बाद हमेशा बंगाली हिंदू ही सीपीएम के नेता बनते रहे हैं। 
यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं है कि पश्चिम बंगाल में लगभग 30 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं और भाजपा वहां आक्रामक हिंदुत्व का कार्ड खेल रही है। इस कार्ड ने उसे यहां जबर्दस्त कामयाबी भी दिलाई है। याद कीजिए, एक समय था, जब भाजपा कोलकाता नगर निगम चुनाव में महज दो सीट जीत सकी थी, तब लालकृष्ण आडवाणी ने खुशी जाहिर करते हुए बाकायदा बयान दिया था कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सूबे में हमारा खाता खुल गया है। कोलकाता में भाजपा कार्यकर्ताओं ने खूब गुलाल उड़ाए थे, मानो कोई बड़ी जीत मिली है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी की सफलता का आलम यह है कि पिछले आम चुनाव में राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से 18 पर जीत हासिल करके भाजपा ने न केवल सबको चौंका दिया, बल्कि अब वह विधानसभा में मुख्य प्रतिपक्ष है।
साफ है, बंगाल में सीपीएम की जगह भाजपा ने हथिया ली है। मोदी का राष्ट्रीय नेतृत्व का अपना आभामंडल तो है ही, राज्य में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी और राज्य भाजपा के अध्यक्ष सुकांत मजूमदार, दोनों काफी मेहनत भी कर रहे हैं। माकपा को यह लगने लगा है कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट और कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने से भाजपा को ही फायदा होता है, क्योंकि उसका हिंदू वोट भाजपा को और मुस्लिम आधार इंडियन सेक्युलर फ्रंट को ट्रांसफर होने लगा है, लिहाजा इस आम चुनाव में उसने कोई गठबंधन नहीं किया। अलबत्ता, उत्तरी बंगाल में उसने कांग्रेस के साथ सीटों का तालमेल जरूर किया है।  
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे की दुविधा यह है कि वह अपना सबसे बड़ा शत्रु किसको माने? स्वाभाविक राजनीतिक दुश्मन तो तृणमूल कांग्रेस ही है, क्योंकि ममता ने ही उसको सत्ता से बेदखल किया। माकपा इस बात को भूल नहीं सकती। फिर संदेशखाली की घटना से लेकर ममता सरकार में सामने आए भ्रष्टाचार के मुद्दों, मंत्रियों की गिरफ्तारी को भाजपा जितने जोर-शोर से उठा रही है, उन पर भी माकपा खामोशी नहीं बरत सकती, क्योंकि इससे उसकी विपक्ष की भूमिका प्रभावित होती है और यदि वह आक्रामक विरोध करती है, तो भाजपा विरोधी नैरेटिव को नुकसान पहुंचता है। 2019 और 2021 में माकपा की आंतरिक रणनीति थी कि ‘पहले राम बाद में वाम।’ यानी राज्य में अभी भाजपा को मजबूत होने दो, बाद में हम उसे हटाएंगे, फिलहाल ममता से निपटना जरूरी है।
मगर इस रणनीति को लेकर इस बार माकपा में मतभेद उभर आया। इस रणनीति के विरोधियों का कहना है कि यदि एक बार भाजपा कोलकाता की सत्ता पर काबिज हो गई, तो अगले तीस वर्षों तक माकपा के लिए सत्ता में लौटना सपना हो जाएगा। इसलिए माकपा दिग्भ्रमित है कि उसका मुख्य दुश्मन कौन है? उसकी एक बड़ी परेशानी यह भी है कि कार्यकर्ता-स्तर पर ममता विरोधी अधिक हैं, जबकि ऊपरी स्तर पर भाजपा के मुखालिफ नेता अधिक हैं। वे सांप्रदायिक मुद्दों को कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। लिहाजा इस बार यह देखने वाली बात होगी कि माकपा किसके वोट काटती है? पिछले चुनाव में उसका वोट प्रतिशत घटा था और भाजपा को इसका फायदा मिला था। 
अगर इस बार सीपीएम कुछ वापसी करती है और हिंदू वोटों को अपनी तरफ खींचती है, तो इससे भाजपा का प्रदर्शन प्रभावित हो सकता है। इसी तरह, सीएए के बाद मुस्लिम वोट कितना माकपा को मिलता है, यह भी देखने की बात होगी, क्योंकि इस कानून से घबराए मुसलमानों के तृणमूल के पक्ष में लामबंद होने की सूचनाएं मिल रही हैं। जाहिर है, यह चुनाव तो ममता बनाम भाजपा ही है, वाम मोर्चा सिर्फ वोट प्रतिशत बढ़ाने और अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए लड़ रहा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)