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कांग्रेस की हार और खलदुन की सीख

Historian Ram Chandra Guha

जनवरी 2013 में जब कांग्रेस केंद्र की सत्ता में थी और आम चुनाव एक साल से भी ज्यादा दूर थे, तब मैंने राहुल गांधी पर एक कॉलम लिखा था। उनके एक दशक के राजनीतिक करियर की समीक्षा के बाद मैंने लिखा था, राहुल गांधी के बारे में सबसे अच्छी बात कोई यह कह सकता है कि वह अच्छी मंशा वाले दुविधाग्रस्त व्यक्ति हैं। उन्होंने प्रशासनिक योग्यता के संकेत नहीं दिए हैं। बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां उठाने की इच्छा भी नहीं दर्शाई है। गंभीर सामाजिक समस्याओं की केवल पहचान करने से आगे उसके समाधान के लिए किसी ऊर्जा या प्रतिबद्धता का भी परिचय उन्होंने नहीं दिया है। मतलब तो तब है, जब वह देश की सबसे बड़ी, पुरानी, और अभी भी सबसे प्रभावशाली पार्टी के उपाध्यक्ष व उसके संभावनाशील नेता और उसकी ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में अपनी भूमिका निभाएं। 

मेरे उस कॉलम को कांग्रेस से नजदीकी रखने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने पढ़ा। उन्होंने मुझे एक रोचक और खुलासा करने वाली कहानी सुनाई। चूंकि राहुल गांधी ने किसानों के प्रति चिंता दर्शाई थी, तो सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनसे कहा कि आप आम चुनाव 2009 जीतने के बाद यूपीए-2 की सरकार में ग्रामीण विकास मंत्री बन जाएं। वह मंत्री बनकर अपने विचारों को व्यवहार में ला सकते थे और प्रशासनिक अनुभव भी हासिल कर सकते थे। लेकिन राहुल गांधी ने इस सलाह पर काम से इनकार कर दिया। कोई कारण नहीं बताया गया, लेकिन ऐसा लगा कि उनकी मां कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का विश्वास था कि उनका बेटा सीधे प्रधानमंत्री के रूप में ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होगा।

इस कयास को तब बल मिला, जब सितंबर 2013 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक साक्षात्कार में कहा कि राहुल गांधी वर्ष 2014 के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए आदर्श विकल्प होंगे। हालांकि वैसा नहीं हो सका, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी की पार्टी लोकसभा चुनाव 2014 में सत्ता से बाहर हो गई। कांग्रेस ने करीब 160 सीटें गंवाई। ठीक उसी महीने ब्रिटेन में भी चुनाव हुए थे, लेबर पार्टी को महज 20 सीटों का नुकसान हुआ था, इसके बावजूद उसके नेता मिलिबैंड ने तत्काल इस्तीफा सौंप दिया था। पर कथित रूप से ब्रिटेन के वेस्टमिनिस्टर मॉडल पर चलने वाली हमारी राजनीति अपने मूल मॉडल से दूर चली गई। यहां सत्ताधारी पार्टी के उपाध्यक्ष को जिम्मेदारी लेने से बचा लिया गया। इसके ठीक विपरीत उन्हें पराजय का पुरस्कार मिल गया। उनकी मां ने पार्टी अध्यक्ष पद के लिए उनका मार्ग प्रशस्त कर दिया। और अब राहुल गांधी ने आम चुनाव में पार्टी की लगातार दूसरी पराजय में पार्टी का नेतृत्व किया है।

अब कांग्रेस क्या कर सकती है? क्या वह एक नया अध्यक्ष खोजेगी? क्या वह प्रथम परिवार से परे सोच सकती है? वर्ष 2014 के चुनाव में भी नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को ‘नामदार’ बोलकर मजाक उड़ाया था और खुद को ‘कामदार’ बताया था। वर्ष 2019 के चुनावों में भी मोदी ने मतदाताओं से सीधे पूछा कि उन्हें परिश्रमी ‘कामदार’ चाहिए या राहुल के रूप में ‘नामदार’? इधर अंग्रेजी के कुछ पत्रकार जगन मोहन रेड्डी और नवीन पटनायक की जीत को सुबूत के रूप में पेश कर रहे हैं कि वंशवाद समस्या नहीं है।

जब मैंने यह ट्वीट किया कि कांग्रेस वंशवाद को छोड़ दे, तब उत्तर प्रदेश के एक मित्र लेखक अनिल महेश्वरी ने मुझे महान अरब विद्वान इब्न खलदुन का लिखा एक लंबा उद्धरण भेजा। 14वीं सदी में हुए इब्न ने तर्क दिया है कि वंशवाद आमतौर पर तीसरी पीढ़ी के बाद अपना प्रभाव और विश्वसनीयता खो देता है। इब्न के अनुसार, वंश या वैभव का संस्थापक जानता है कि कार्य या वैभव की कीमत क्या है। वैभव का कारण बनने वाले गुणों को वह जारी रखता है। उसके बाद आने वाले उसके बेटे ने पिता के सीधे संपर्क में रहकर उन चीजों को सीखा है। हालांकि पिता की तुलना में वह कमतर है। दूसरी पीढ़ी गिनती को आगे बढ़ा सकती है, लेकिन गिनती बढ़ाने वाले ज्ञान को नहीं, जबकि तीसरी पीढ़ी नकल और विशेष रूप से परंपराओं पर विश्वास से संतुष्ट हो जाती है। इसके बाद चौथी पीढ़ी तो हर मामले में अपने पूर्ववर्तियों से कमतर रहती है। इस पीढ़ी के सदस्य उन गुणों को खो चुके होते हैं, जिनकी वजह से कभी वैभव या वंश का निर्माण हुआ था। यह पीढ़ी कल्पना करने लगती है कि लगन और प्रयास से वैभव का निर्माण नहीं किया गया था। वह वैभव किसी समूह के प्रयास या व्यक्तिगत गुणों का फल नहीं था। वंश में चौथी पीढ़ी का व्यक्ति यह देखता है कि लोग उसे किस तरह से सम्मान देते हैं, पर वह यह नहीं जानता कि सम्मान कैसे उत्पन्न हुआ और उसके पीछे क्या कारण थे। इब्न खलदुन ऐसे में नेतृत्व को किसी अन्य संतोषजनक गुणवत्ता वाले योग्य नेता को हस्तांतरित करने की सलाह देते हैं। इब्न लिखते हैं कि जो भी वंश चौथी-पांचवीं पीढ़ी तक चला गया, उसने अपने पतन के बीज स्वयं बोए। दूसरे और तीसरे हाथ से चौथे हाथ में आकर पीढ़ी वैभव या वंश का सम्मान खो देती है और ‘नामदार’ कहलाने की हकदार हो जाती है।

इब्न यह समझने में हमारी मदद करते हैं कि क्यों जगन और नवीन सफल हुए, जबकि राहुल विफल। जगन और नवीन दूसरी पीढ़ी में हैं, उन्होंने अपनी आंखों से देखा है कि उनके पिता ने क्या किया। इस नजरिये से देखें, तो इंदिरा गांधी जवाहरलाल नेहरू के सान्निध्य और स्वतंत्रता संग्राम के आदर्शों के साये में पली-बढ़ी थीं। वह इतनी ज्यादा विश्वसनीय व प्रभावी नेता थीं कि उनके पुत्र और पौत्र वैसा होने की कभी सोच भी नहीं सकते। कांग्रेस पार्टी में हर किसी को इब्न खलदुन को पढ़ने और पचाने की जरूरत है। राहुल गांधी योग्य होंगे, लेकिन इतिहास और समाजशास्त्र उनके विरुद्ध काम कर रहे हैं। जब मध्ययुगीन और सामंती अरब में चौथी और पांचवीं पीढ़ी के वंशवाद को स्वीकार नहीं किया गया, तो आधुनिक व लोकतांत्रिक भारत में अलग क्यों होना चाहिए? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column June 8