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नई सरकार की पुरानी चुनौतियां

हर नई सरकार के सामने घरेलू मोर्चे पर कुछ चुनौतियां होती हैं। उस सरकार के सामने भी, जो कुछ हद तक ही नई होती है। नरेंद्र मोदी सरकार इस अर्थ में तो नई है कि उसे 2019 के आम चुनाव में स्पष्ट बहुमत देकर जनता ने अगले पांच वर्ष के लिए चुना है, पर इस अर्थ में यह नई नहीं भी है कि इसका वर्तमान कार्यकाल पिछले पांच वर्षों का ही विस्तार है, इसकी प्राथमिकताएं, चुनौतियां और नेतृत्व पुराना ही है। ऐसे में, क्या यह मान लिया जाए कि इस ‘नई’ सरकार के लिए चुनौतियां पुरानी ही हैं और इनका सामना करने के लिए वही सब कुछ पर्याप्त होगा, जो अपने पिछले अवतार में यह सरकार करती रही है।

नई सरकार की घरेलू मोर्चे पर चुनौतियां तो पुरानी हो सकती हैं, पर उन्हें उनसे निपटने के तरीके नए तलाशने होंगे। घरेलू मोर्चे पर मोदी सरकार के सामने तीन मुख्य चुनौतियां हैं- कश्मीर, माओवाद और अपनी छवि। वैसे तो रोजगार, महंगाई, आधारभूत ढांचे का विस्तार या संतुलित शहरी विकास जैसे अन्य बहुत से क्षेत्र हैं, जिन पर सरकार से फौरी प्रभावी कार्रवाई की अपेक्षा होगी, पर यहां आशय सिर्फ उन चुनौतियों से है, जिन्हें केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय देखता-भालता है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि देश को अमित शाह के रूप में एक नया गृह मंत्री मिला है, जो अपने पूर्ववर्ती राजनाथ सिंह से कई अर्थों में भिन्न हैं। न सिर्फ राजनीतिक हैसियत में शाह एक हैवीवेट हैं, बल्कि उन्हें नतीजे हासिल करने को आतुर व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। ऐसे में, देखना दिलचस्प होगा कि नए गृह मंत्री का उपरोक्त तीनों चुनौतियों से निपटने का तरीका क्या होगा?

कश्मीर पिछले कई दशकों से एक अंधी सुरंग की तरह बना हुआ है। तमाम दावों के बाद किसी को नहीं पता कि इसमें लगातार चलते रहने के बावजूद कभी रोशनी की किरण झलकेगी भी या नहीं? कई दशकों से भारतीय सेना का बड़ा हिस्सा युद्ध की सी स्थिति में वहां जूझ रहा है। परिहार्य राष्ट्रीय संसाधनों का दुरुपयोग हो रहा है और इन सबके बावजूद जिस तरह सैनिक/ असैनिक जान का नुकसान हो रहा है, उन्हें कोई भी सभ्य समाज स्वीकार नहीं कर सकता। पिछली सरकार का मानना था कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते, इसलिए उसने पाकिस्तान से किसी तरह की बातचीत से इनकार कर दिया था। लेकिन अब इस नई सरकार को सोचना होगा कि इस नीति से कितना लाभ हुआ और क्या इस पर पुनर्विचार की जरूरत नहीं है? हम लाख इनकार करते रहें, पर बिना पाकिस्तान को साथ लिए कश्मीर समस्या का स्थाई हल नहीं निकल सकता। 1947 के बाद दोनों देश अटल बिहारी वाजपेयी और परवेज मुशर्रफ के समय में इस मसले के समाधान के सबसे निकट पहुंच गए थे। जरूरत है कि उन्हीं बिसरे सूत्रों को पकड़कर आगे बढ़ा जाए। क्या शाह बड़ा दिल दिखाकर पाकिस्तान से पुन: बातचीत का माहौल बना सकेंगे या फिर अपनी साख के मुताबिक और अधिक सख्ती की नीति पर चलेंगे?

माओवाद या उसके पहले अवतार नक्सलवाद को भी वर्षों हमारी सरकारों ने सिर्फ शांति-व्यवस्था की समस्या माना। उनकी नजरों में इससे छुटकारे का एक ही तरीका था सख्ती या स्थिति बिगड़ जाने पर और अधिक सख्ती। राज्य के खिलाफ हथियार उठाने वालों के विरुद्ध प्रभु वर्गों की सोच तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान से पता चलती है, जिसमें उन्होंने माओवाद को देश के सामने सबसे बडे़ खतरे के रूप में रेखांकित किया था। नए गृह मंत्री शाह के पक्ष में दो बातें जाती हैं- पहली तो यह कि सशस्त्र संघर्ष की माओवाद की अवधारणा अब आखिरी सांसें गिन रही है। एक समय दो सौ से अधिक जिलों में असर रखने वाले इस आंदोलन की उपस्थिति अब एक दर्जन से भी कम जिलों में रह गई है। राज्य की नीति-निर्धारक एजेंसियों ने भी यह मान लिया है कि माओवाद शांति-व्यवस्था से अधिक भूमि सुधार, जंगल के संसाधनों पर उसमें रहने वालों के अधिकार या शिक्षा और चिकित्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव जैसे मुद्दों की उपज है। शाह की चुनौती माओवाद को एक बार फिर शांति-व्यवस्था की समस्या बनने से रोकना होगा और बचे-खुचे माओवादी काडरों को मुख्यधारा में लाना होगा।

नर्ई सरकार और नए गृह मंत्री की सबसे बड़ी चुनौती उस छवि से मुक्त होना है, जो दुर्भाग्य से सरकार की बन गई है। दुनिया भर के लोकतांत्रिक समाजों में मोदी की छवि भारत के अल्पसंख्यकों के दुश्मन जैसी है। एक वैश्विक नेता बनने की लालसा रखने वाले व्यक्ति को इससे मुक्ति का गंभीर प्रयास करना होगा। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने चुनावी नतीजे आने के बाद एक लेख में चिंता व्यक्त की है कि लोकतांत्रिक दुनिया के कई महत्वपूर्ण अखबार मोदी की जीत से निराश हैं। उनको आशंका है कि भारत धर्मनिरपेक्षता की डगर छोड़कर हिंदू राष्ट्र बनने के रास्ते पर तो नहीं चल पड़ेगा। मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में गो-रक्षा या लव जिहाद के नाम पर जो हुआ, उससे पूरी दुनिया में कोई अच्छा संदेश नहीं गया।

प्रधानमंत्री मोदी ने मन की बात में हिंसा में लिप्त लोगों को कोसा जरूर, पर उसका कोई जमीनी असर पड़ता नजर नहीं आया। इस बार भी सरकार बनने के बाद कुछ ही दिनों में अल्पसंख्यकों पर हमले की कुछ घटनाएं हुई हैं। इन वारदातों को रोकने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से गृह मंत्रालय और उसके मुखिया अमित शाह की होगी। हमारे यहां अक्सर ‘भाड़ में जाए’ या ‘क्या फर्क पड़ता है’ या ‘हुआ तो हुआ’ वाला रवैया ही ऐसे मामलों में अपनाया जाता रहा है, लेकिन अगर मोदी को विश्व नेता का दर्जा सचमुच दिलाना है, तो ऐसी अराजकता को  सख्ती से रोकना होगा। ऐसा वह अपने काडरों के मन में कानून का भय पैदा करके ही कर सकेंगे।
समस्याएं तो सरकारों की नियति होती हैं और उनका मूल्यांकन भी इनसे निपटने के अंदाज से ही होता है, पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की समस्याएं तो पुरानी ही हैं, देखना सिर्फ यह है कि क्या वे इनसे निपटने के लिए कुछ नए औजार गढ़ते हैं या पुराने औजारों से ही काम चलाते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)
 

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  • Web Title:Hindustan Opinion column June 4