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शांति की खत्म होती उम्मीदों के बीच

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर अमेरिकी पाबंदी को अब और सख्त करने की घोषणा की है। प्रतिबंध अब ईरान के सर्वोच्च नेता पर भी लगा दिया गया है। इस घेरे में ईरानी विदेश मंत्री को भी लाया जा सकता है। अमेरिका ने यह घोषणा एक ठहराव के बाद की है। उल्लेखनीय है कि 20 जून को जब ईरान ने अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया था, तो जवाबी सैन्य कार्रवाई के लिए निकले अमेरिकी विमानों को राष्ट्रपति ट्रंप ने हमले से पहले वापस बुला लिया था। इससे पहले होर्मुज जलडमरूमध्य के बाहरी हिस्से में दो तैल टैंकरों अल्टेयर और कोकुका करेजियस पर हमला हुआ था। इन टैंकरों को तब निशाना बनाया गया था, जब जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे मध्यस्थता मिशन के तहत तेहरान के दौरे पर थे। इसके एक महीने पहले, 12 मई को दो सऊदी टैंकर, नॉर्वे के एक पोत और यूएई के एक टैंकर पर फुजैरा में हमला हुआ था। जाहिर है, बढ़ता तनाव क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक तो है ही, ऊर्जा सुरक्षा को भी जबर्दस्त चोट पहुंचा सकता है। कच्चे तेल की कीमत में तेजी से भारत के बजट और चालू खाता घाटे पर नकारात्मक असर पडे़गा।

खाड़ी का यह संकट ऐेसे वक्त में गहरा गया है, जब अफगानिस्तान में स्थिति बदतर है और मध्य-पूर्व में शांति-प्रक्रिया ठप है। अफगानिस्तान की स्थिरता भारत की सुरक्षा के लिए काफी मायने रखती है, क्योंकि 90 के दशक में पैदा हुई कश्मीर समस्या अफगान-संघर्ष का ही एक अप्रत्याशित नतीजा थी। इसी तरह, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के दामाद जेरेड कुश्नर ने फलस्तीन से जुड़ी जिस पहल की घोषणा की है, फलस्तीनी सत्ता-प्रतिष्ठान ने उसकी पुरजोर मुखालफत की है। दोनों ही मसले भारत के सामने कठिन चुनौती की तरह हैं। अफगानिस्तान तक पहुंचने के लिए भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह विकसित कर रहा है। ऐसे में, अफगान-पाक स्थिति और भारत के संदर्भ में ईरान की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। दूसरी ओर, भारत सरकार पर अमेरिकी प्रशासन और हमारे अरब मित्र देशों की ओर से भी दबाव होगा।

शह-मात का यह खेल पिछले साल तब शुरू हुआ, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने यह घोषणा की कि ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते से वह अमेरिका को बाहर निकाल रहे हैं। ‘ज्वॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन’ (जेसीपीओए) नामक यह समझौता ईरान पर परमाणु संबंधी प्रतिबंधों को हटाने के एवज में उसके परमाणु कार्यक्रम को बाधित करता है। ईरान ने परमाणु समझौते के तहत अपनी प्रतिबद्धताओं का पालन किया है, जिसकी पुष्टि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने भी बार-बार की। मगर पिछले वर्ष जब अमेरिका इस समझौते से बाहर हुआ, तो उसने ईरान पर तेल और बैंकिंग पर रोक सहित कई प्रतिबंध फिर से आयद कर दिए। इन प्रतिबंधों का असर इसलिए कुछ कम रहा, क्योंकि भारत सहित आठ देशों को इनमें आंशिक छूट दी गई थी। लेकिन बीते 22 अप्रैल को राष्ट्रपति ट्रंप ने इस छूट को खत्म करने की घोषणा की। ईरान से तेल निर्यात को ‘शून्य कर देने’ की अमेरिकी नीति ने ईरान सरकार के सामने एक बड़ा आर्थिक संकट पैदा कर दिया है। ईरान सरकार ने बेशक प्रतिबंधों के अंतिम दौर में भी यह दिखाया है कि वह इन आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर सकती है, लेकिन अमेरिका कहीं अधिक सख्त रुख अपनाए हुए है।

अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोल्टन ने ईरान से आ रहे चिंताजनक ‘संकेतों व चेतावनियों’ के जवाब में बीती 5 मई को यूएसएस अब्राहम लिंकन की अगुवाई में एक करियर टास्क फोर्स मध्य-पूर्व की ओर रवाना करने की बात कही। 8 मई को ईरानी राष्ट्रपति रोहानी ने ई-3 (ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी) को विश्वास में लेने के लिए यूरेनियम और भारी पानी के निर्यात को 60 दिनों के लिए रोक दिया। यह घोषणा प्रतीकात्मक रूप से उस दिन की गई, जब एक वर्ष पूर्व अमेरिका ने जेसीपीओए से खुद को अलग करने की घोषणा की थी। 60 दिनों की यह समय-सीमा 7 जुलाई को खत्म होने वाली थी, हालांकि 17 जून को ही ईरान ने घोषणा कर दी कि 27 जून तक वह 300 किलोग्राम की लिमिट पार कर जाएगा।
खाड़ी का बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव वेनेजुएला और लीबिया में बढ़ती मुश्किलों के साथ गहरा गया है। ईरान के कच्चे तेल के निर्यात को ‘शून्य’ करने से ईरान से आने वाला 15 लाख बैरल से अधिक कच्चा तेल बाजार में नहीं आ पा रहा, जबकि स्थानीय राजनीतिक उठा-पटक के कारण जनवरी से वेनेजुएला के कच्चे तेल का उत्पादन रोजाना लगभग पांच लाख बैरल घट गया है। रही-बची कसर  बीते 4 अप्रैल को त्रिपोली में जनरल हफ्तार की सेना के संघर्ष से पूरी होती दिख रही है। तेल-आपूर्ति में आई यह रुकावट अमेरिका में शेल-तेल उत्पादन या फिर सऊदी उत्पादन में बढ़ोतरी से कतई दूर नहीं हो सकती। 

अमेरिका और चीन के बीच जारी ‘ट्रेड वार’ से कच्चे तेल के दाम जरूर कम हुए थे, और 23 अप्रैल के बाद इसकी कीमत में 20 फीसदी की गिरावट आई थी। मगर हालिया तनाव ने इसके दाम फिर से बढ़ा दिए हैं। सऊदी अरब ने घोषणा की है कि वह ओपेक और रूस के नेतृत्व वाले गैर-ओपेक उत्पादक देशों द्वारा उत्पादन कटौती को लेकर बनी सहमति को आगे बरकरार रखने को इच्छुक है। इन देशों की अगली बैठक 2 जुलाई को होने वाली है। उत्पादन में कटौती जाहिर तौर पर तेल की कीमत बढ़ाएगी। कच्चे तेल की कीमत में 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि का मतलब है, भारत पर सालाना एक लाख करोड़ से अधिक रुपये का अतिरिक्त बोझ। 

तनातनी बढ़ने से कूटनीतिक समाधान की राहें कमजोर हो रही हैं। ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को रोककर राष्ट्रपति ट्रंप ने शांति की उम्मीदों को जिंदा जरूर रखा था, मगर वह क्षणिक साबित हुआ है। अमेरिकी प्रतिबंध विशेषकर ईरान के सर्वोच्च नेता और सेना के रिवॉल्युशनरी गार्ड (आईआरजीसी) जैसे नीति-निर्माताओं को निशाना बनाकर लगाए गए हैं। 13 जून को टैंकरों पर हमला बताता है कि ऐसे तत्व सक्रिय हैं, जो शांति की संभावनाओं को खत्म करना चाहते हैं। अमेरिका ने खाड़ी में टैंकरों की सुरक्षा के लिए एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की घोषणा की है, जो एक अच्छा विचार है, लेकिन ईरान को भी प्रतिबंधों से राहत मिलनी चाहिए। कोई भी पक्ष युद्ध नहीं चाहता। मगर मौजूदा संदर्भ में गलत फैसले के अंदेशे बढ़ गए हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

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