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चुनाव बाद हिंसा में झुलसता बंगाल

Hariram Pandey, Senior Journalist

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा इसके इतिहास का एक अभिन्न अंग रही है और वर्तमान में जो कुछ भी हो रहा है, उसमें इतिहास के प्रतिबिंब देखे जा सकते हैं। बेशक इस हिंसा के स्वरूप बदलते रहे हैं। मगर धीरे-धीरे यह ज्यादा हिंसक और व्यापक होता जा रहा है। 12 जून को कोलकाता की सड़कों पर जो हुआ, वह नया नहीं है। वैसा दृश्य हर राजनीतिक परिवर्तन के दौरान दिखता है। विरोधी दल के राजनीतिक नेता बखूबी इस तथ्य को जानते हैं कि न लाल बाजार (पुलिस मुख्यालय) के अभियान से कुछ हो सकता है और न ही सचिवालय के घेराव से सिवाय अखबारों की हेडलाइन होने के या हिंसा और उग्रतर होने के। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सत्ता में आने के पहले अपने आंदोलनों के लिए अग्नि कन्या के रूप में जानी जाती थीं। बंगाल की शैव-शाक्त परंपरा में भावुकता के दौरान हिंसा एक तरह से संस्कारजन्य है। माक्र्सवादी शासन के दौरान भावुकता में बौद्धिकता की मिलावट की गई और इसे माक्र्सवादी चिंतन का स्वरूप दिया गया, जो धीरे-धीरे घेराव तथा पथावरोध के रूप में सशक्त होता गया। 

बंगाल की राजनीतिक हिंसा को सामाजिक-आर्थिक संकट के रूप में देखा जाना चाहिए। यह संकट आरंभिक काल से ही ग्रामीण आबादी को परेशान करता रहा है। बंगाल में भू-सुधार नीतियां और पंचायत प्रणाली की प्रमुखता कुछ ऐसे कारण हैं, जिन्होंने बंगाल की राजनीतिक हिंसा को एक विशिष्टता दी है। इसका इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कौन सा दल सत्ता में है। इस हिंसा का स्वरूप वामपंथी शासन में थोड़ा बदल गया और और इसमें ग्रामीण हथियारों की जगह बंदूकों ने ले ली। आंकड़े बताते हैं कि सन 1977 से 2009 के बीच राज्य में 55,000 राजनीतिक हत्याएं हुई हैं। 2007 में जब नंदीग्राम घटना हुई, तो सबसे ज्यादा हत्याएं हुईं। नंदीग्राम की घटना ने ममता बनर्जी को मौका दे दिया और यही घटना उनके उत्थान का कारण बनी तथा राज्य में सीपीआईएम के पतन का। कथित रूप से साल 2013 में सीपीआईएम ने तृणमूल कांग्रेस के 142 कार्यकर्ताओं की हत्या करवाई। हालांकि, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकडे़ बताते हैं कि उस दौरान पश्चिम बंगाल में सिर्फ 26 राजनीतिक हत्याएं हुईं।

बंगाल में जब-जब राजनीतिक विरोध की व्यापकता बढ़ी है, सत्ता में परिवर्तन आया है और यह जो अभी हो रहा है, वह साल 2021 की ओर संकेत कर रहा है। हिंसा की पृष्ठभूमि में परिवर्तन की धमक की हल्की आवाज सुनाई पड़ रही है। हिंसा का ताजा दौर तब आरंभ हुआ, जब ममता बनर्जी की सरकार ने भारतीय जनता पार्टी के विजय जुलूसों पर पाबंदियां लगानी शुरू की। साथ ही  जय श्रीराम के नारे को लेकर भी तनाव बढ़ता गया। ‘शैव-शाक्त’ परंपरा वाले राज्य में ‘जय श्रीराम’ का प्रवेश एक तरह से विचारों के परिवर्तन के प्रयास का पहला कदम कहा जा सकता है। गैर-सरकारी सूत्रों के अनुसार, 23 मई से अब तक राज्य में राजनीतिक हिंसा की विभिन्न घटनाओं में 15 लोगों की मौत हो चुकी है। बांग्लादेश के सीमावर्ती जिलों में जहां भाजपा अपनी ताकत बढ़ा चुकी है, वहां ज्यादा गड़बड़ी हुई है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने राज्य की स्थिति के बारे में इस सप्ताह के आरंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर चर्चा कर चुके हैं।

कैसी विडंबना है कि जब ममता बनर्जी विपक्ष में हुआ करती थीं और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर वामपंथी दलों के हमले होते थे, तब वह संविधान के अनुच्छेद-355 लगाने की खुल्लम-खुल्ला मांग करती थीं। यहां तक कि जब वह भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में शामिल थीं, तब भी उन्होंने बंगाल में राष्ट्रपति शासन की मांग की थी, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने इसे अस्वीकार कर दिया। अब राष्ट्रपति शासन की मांग का वह विरोध कर रही हैं।

राज्य के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी 23 जुलाई को अवकाश ग्रहण कर रहे हैं और केंद्र सरकार किसी सख्त राज्यपाल की तलाश में है, ताकि वह केंद्र के निर्देश को कठोरता से लागू कर सके। यदि ममता बनर्जी केंद्र के निर्देशों की अवमानना करती रहीं, तो हो सकता है कि यहां अनुच्छेद-355 लागू हो जाए और आशंका है कि यह 356 में भी बदल जाए। फिलहाल सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे पर हमले का आरोप लगा रहे हैं। आरोपों- प्रत्यारोपों का यह सिलसिला अचानक नहीं शुरू हुआ, बल्कि पंचायत चुनाव के दौरान इसकी शुरुआत हुई। पश्चिम बंगाल में पंचायत चुनाव के दौरान हिंसा को रोकने में राज्य सरकार की नाकामयाबी पर जब उंगली उठने लगी, तो तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने एक ट्वीट किया कि ‘पंचायत चुनाव के सभी विशेषज्ञों का एक अपना इतिहास है।

साल 1990 में सीपीआईएम के शासन के दौरान चुनावी हिंसा में 400 लोग मारे गए थे। 2003 में 40 लोगों को मार दिया गया था। हर मौत एक दुखद घटना है। लेकिन यह अब सामान्य बात हो गई है।’ पश्चिम बंगाल में एक खास बात यह है कि सभी राज्यों में चुनाव के पहले और चुनाव के दिन हिंसा होती है, लेकिन बंगाल में यह चुनाव के बाद होती है। आंकड़े बताते हैं कि सभी राज्यों में जो हिंसक घटनाएं हुईं, उनमें अधिकांश चुनाव के पहले हुई हैैं और फिर चुनाव के दौरान हुईं। लेकिन पश्चिम बंगाल में जितनी राजनीतिक हिंसा की घटनाएं हुईं, उनमें 61 प्रतिशत चुनाव के बाद हुईं। 2014 में चुनावी हिंसा की जितनी घटनाएं दर्ज हुईं, उनमें 44.68 प्रतिशत घटनाएं चुनाव के बाद हुईं और 40 प्रतिशत घटनाएं चुनाव के पहले घटीं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column June 14