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बाजार में रह-रहकर तेजी के झोंके

खूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं। साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। शेर तो मोहब्बत के मामले में लिखा गया है, मगर एकदम सटीक बैठता है शेयर बाजार पर। और उसमें भी उन लोगों पर, जो इस बाजार में...

बाजार में रह-रहकर तेजी के झोंके
Pankaj Tomarआलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकारSun, 26 May 2024 09:36 PM
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खूब परदा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं। साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। शेर तो मोहब्बत के मामले में लिखा गया है, मगर एकदम सटीक बैठता है शेयर बाजार पर। और उसमें भी उन लोगों पर, जो इस बाजार में कमाई के इरादे से पहुंचते हैं। नए छोटे निवेशक हों या दसियों साल से घाट-घाट का पानी पी रहे दिग्गज विदेशी संस्थान। हाल सबका एक-सा ही होता है। यही वजह है कि बाजार एक खबर सुनकर आसमान की तरफ भागने लगता है, तो दूसरी खबर या अफवाह भी उसे अचानक धड़ाम से गिरने पर मजबूर कर देती है। 
चुनाव अंतिम चरण में है और इसी महीने का हाल देख लें, बल्कि पिछले महीने जिस दिन से लोकसभा चुनाव के वोट पड़ने शुरू हुए, उसी दिन से बाजार में सांप-सीढ़ी का खेल तेज हो गया है। बाजार में उतार-चढ़ाव, अनिश्चितता नापने वाला इंडेक्स इंडिया विक्स 19 अप्रैल को ही अचानक तेजी से ऊपर गया था। हालांकि, उसके दो दिन बाद ही इसमें करीब 15 प्रतिशत की नरमी आ चुकी थी, मगर फिर उसने ऊपर का रुख किया, तो पिछले बुधवार तक यह दोगुने से ऊपर पहुंच चुका था। 
तरह-तरह की बातें हो रही थीं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक या एफपीआई लगातार बिकवाली में जुटे थे। औसतन हर रोज 1,800 करोड़ रुपये की बिकवाली। खबरें यूं चल रही थीं कि चुनाव में कम मतदान देखकर बाजार घबरा गया है। यह भी कि विदेशी निवेशक सरकार के भविष्य को लेकर घबरा गए हैं और जोखिम नहीं लेना चाहते। हालांकि, साथ ही यह बात भी थी कि चीन की अर्थव्यवस्था में सुधार के कारण बहुत से विदेशी निवेशक भारत से शेयर बेचकर अब चीन पर दांव लगाने निकल पड़े हैं। फिर भी चुनाव के साथ बाजार का रिश्ता जोड़ा जा रहा था।
ऐसे विश्लेषण के साथ-साथ फलौदी का मशहूर सट्टा बाजार भी काम आ रहा था। सट्टे का कारोबार असल में कितना होता है, कोई नहीं जानता, पर सट्टे के नाम पर देश भर में चर्चा खूब होती है। तो यहां बात यह चली कि चुनाव शुरू होने से पहले फलौदी बाजार में भाजपा को जितनी सीटें दी जा रही थीं, वे जबर्दस्त जीत का संकेत देती थीं, मगर तीसरे चरण में आते-आते यह आंकड़ा कम हो गया है और अब बस बहुमत के आसपास का ही भाव लग रहा है। 
जाहिर है, सट्टा बाजार का इस्तेमाल दांव लगाने से ज्यादा माहौल बनाने के लिए होता है और शेयर बाजार के बारे में तो कहा जाता है कि वहां सब कुछ माहौल या भावनाओं के भरोसे ही चलता है। खासकर रोज का उतार-चढ़ाव। ऐसे में, चुनावी अटकलों का बाजार पर असर पड़ना स्वाभाविक है और वह असर दिख भी रहा था। सबसे ज्यादा अटकलबाजी इसी बात पर हो रही थी कि वोटिंग कम हो रही है और बाजार इसे भाजपा के लिए परेशानी के तौर पर देख रहा है, पर चौथे चरण के बाद चुनाव आयोग ने साफ-साफ कह दिया कि मतदान कम नहीं, ज्यादा है। शेयर बाजार ने यह संकेत पढ़ लिया। उसी दिन बाजार में फिर तेजी का झोंका आया। 
हालांकि, इसके बाद फिर थोड़ा उतार-चढ़ाव चलता रहा। यहां तक कि अब राजनेताओं के बीच भी बाजार का जिक्र बढ़ गया। पहले गृह मंत्री अमित शाह और फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ही सीधे सवाल पूछ लिए गए कि बाजार क्यों नर्वस दिख रहा है? अब जो जवाब आए, उनकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। गृह मंत्री ने तो एकदम ताल ठोकने वाले अंदाज में कह दिया कि 4 जून से पहले शेयर खरीद लें, क्योंकि उसके बाद बाजार नया रिकॉर्ड बनाएगा। प्रधानमंत्री ने भी कह दिया कि जिस दिन चुनाव नतीजे आएंगे, उसके बाद वाले हफ्ते में शेयर बाजार रिकॉर्ड तोड़ भागेगा। उन्होंने यह भी याद दिला दिया कि जब उनकी सरकार बनी, तब सेंसेक्स 25,000 पर था, जो अब 75,000 को छू रहा है। सरकारी कंपनियों के शेयर जिन्हें लोग हाथ लगाने से डरते थे, वे कैसे आसमान छू रहे हैं? मगर इतनी बड़ी बात सुनकर भी लग रहा था कि शायद बाजार को अभी कुछ और चाहिए। यह भी सवाल था कि आखिर विदेशी निवेशक किस चीज का इंतजार कर रहे हैं। बुधवार को बाजार के बंद होने तक यह सवाल बना हुआ था।  
और बुधवार की शाम ही भारतीय रिजर्व बैंक ने फैसला किया कि इस साल वह अपने खजाने से सरकार को दो लाख दस हजार करोड़ रुपये की रकम देने जा रहा है। मतलब यह नहीं है कि वह खजाना खाली कर रहा है, बल्कि वह अपनी कमाई में से सरकार को हिस्सा दे रहा है, जैसे कंपनियां अपने मुनाफे से अपने शेयरधारकों को हिस्सा देती हैं। भारत सरकार रिजर्व बैंक की इकलौती मालिक या शेयर होल्डर है। इसलिए रिजर्व बैंक अपना जमा खर्च जोड़ने के बाद जो रकम बचती है, वह सरकार को दे देता है। हालांकि, किसी अनहोनी से निपटने के लिए वह साढ़े पांच से साढ़े छह प्रतिशत रकम अपने पास रखता है। इस बार खासियत यह रही कि पूरे साढ़े छह प्रतिशत बचाने के बाद भी उसने सरकार को उम्मीद से दोगुना लाभांश दे दिया। अर्थशास्त्री अनुमान लगा रहे थे कि सरकार को एक लाख करोड़ रुपये तक मिल सकते हैं। यहां तक कि पिछले बजट में भी इस रास्ते जीडीपी का 0.3 प्रतिशत आने की उम्मीद जताई गई थी, जो एक लाख करोड़ रुपये से कुछ ही ज्यादा होता।
बस रिजर्व बैंक ने जो उम्मीद से ज्यादा दिया, मानो बाजार को मुंहमांगी मुराद मिल गई। सेंसेक्स ने बारह सौ प्वॉइंट की छलांग लगाई और निफ्टी के साथ नई ऊंचाई पर पहुंच गई। यही नहीं, भारत के शेयर बाजार का मार्केट कैप भी उछलकर पांच लाख करोड़ डॉलर के ऊपर पहुंच गया, यानी फाइव ट्रिलियन। यह वही आंकड़ा है, जहां भारत की अर्थव्यवस्था को पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। शेयर बाजार ने तो यह शिखर हासिल करके दिखा दिया है।
बाजार की नजर से देखें, तो अभी बहुत से लोग चिलमन से लगे बैठे हैं। उतार-चढ़ाव भी बने रहने की गुंजाइश है, पर अंत में हरिवंश राय बच्चन को याद कर लेना फायदेमंद रहेगा, क्योंकि मधुशाला की यह एक पंक्ति न सिर्फ जीवन के लिए, बल्कि शेयर बाजार में पैसा लगाने वालों के लिए भी एकदम सटीक है- राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)