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साइबर संसार में संवेदनहीन समाज

सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे लांछनों से तंग आकर एक मां ने आत्महत्या कर ली। अफसोस, अपने देश में जानलेवा होती ट्रोलिंग पर लगाम के कानूनी उपाय पर्याप्त नहीं हैं।साइबर दुनिया में किसी को हद से अधिक कलंकित..

साइबर संसार में संवेदनहीन समाज
Monika Minalपवन दुग्गल, साइबर कानून विशेषज्ञTue, 21 May 2024 10:04 PM
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साइबर दुनिया में किसी को हद से अधिक कलंकित करके खुदकुशी के लिए मजबूर कर देना ट्रोलिंग का एक भयावह रूप है। दुर्भाग्य से तमिलनाडु की घटना इसी श्रेणी की है, जो हर संवेदनशील इंसान को झकझोर रही है। कोई मां जान-बूझकर अपने बच्चे का बुरा नहीं करती, लेकिन लोगों के ताने ने उस मां को इतना तोड़ दिया कि उसने खुद अपनी जान ले ली। इस ट्रोलिंग की शुरुआत अप्रैल के आखिरी हफ्ते में आए उस वीडियो से हुई, जिसमें पहली मंजिल पर लटके एक छोटे बच्चे को बचाने की सफल कोशिश होती दिख रही थी। बताया गया था कि चौथी मंजिल पर खड़ी मां के हाथों से वह बच्चा छिटककर नीचे गिर गया था। इस वीडियो के सामने आने के बाद से ही मां को सोशल मीडिया में लापरवाह बताया जाने लगा। अब खबर यह है कि लांछनों से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली।
अब तक हम यही सोचते थे कि ट्रोलिंग पश्चिमी देशों में ही होती है और अगर अपने यहां होती भी है, तो नामचीन शख्सियतों की। मगर अब तो यह आम जनजीवन का हिस्सा बनती जा रही है। इसका कारण यही है कि भारत में ‘द ग्रेट इंडियन वोमिटिंग रिवॉल्यूशन’ (भारतीयों का वमन-क्रांति) चल रही है। अब लोग अपने विचार, डाटा, सोच और नजरिये की बिना यह सोचे इंटरनेट पर उल्टियां कर रहे हैं कि इसके कानूनी स्वरूप क्या होंगे? ट्रोलिंग भी एक तरह की उल्टी ही है, जिसमें सामने वाले व्यक्ति को बिना सोचे-समझे अपशब्द कहे जाते हैं। ऐसा करते हुए यह भी नहीं सोचा जाता कि व्यक्ति-विशेष के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? 
अब ट्रोलिंग इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि लोगों को पता है कि वे अनीतिपूर्ण हमले करने के बावजूद कानूनी गिरफ्त से बच सकते हैं। ट्रोलिंग रोकने के लिए अब तक अपने यहां कोई तयशुदा कानून नहीं बन सका है। देश में सन् 2000 का सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी ऐक्ट) जरूर है, लेकिन वह न तो ‘ट्रोलिंग’ शब्द को परिभाषित करता है और न इस संदर्भ में कोई कानूनी समाधान देता है। दुखद यह है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। हां, ‘स्टॉकिंग’ यानी लड़कियां अथवा महिलाओं का गलत इरादे से पीछा करने जैसे अपराधों का जिक्र आईपीसी में जरूर है और कुछ परिस्थितियों में स्टॉकिंग को ट्रोलिंग भी कह सकते हैं, लेकिन ट्रोलिंग की ज्यादातर घटनाएं स्टॉकिंग नहीं कही जा सकतीं। ट्रोलिंग में ट्रोलर्स दरअसल लक्षित व्यक्ति को गाली देते हैं, उसे नीचा दिखाते हैं, उस पर लांछन लगाते हैं और अपने दैनिक जीवन में रम जाते हैं, जबकि स्टॉकिंग का चरित्र इससे अलग होता है।
सूचना प्रौद्योगिकी कानून की सहायता से यदि ट्रोलिंग रोकने की कोशिश करें, तो धारा 67 कुछ हद तक हमारी मदद कर सकती है, क्योंकि जब किसी व्यक्ति को ट्रोल किया जाता है, तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से कुछ ऐसे शब्द या कंटेंट प्रसारित किए जाते हैं, जिनको पढ़ने, सुनने या देखने के बाद लक्षित व्यक्ति पर नकारात्मक असर पड़ता है। मगर यह धारा मूलत: इलेक्ट्रॉनिक रूप से अश्लील सामग्रियों के प्रकाशन और प्रासरण से जुड़ी है, इसलिए ज्यादातर मामलों में पुलिस ट्रोलिंग में इसके इस्तेमाल से बचती है।
ट्रोलिंग से यदि मानहानि होती है, तो आईपीसी की धारा 499 और 500 का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ये धाराएं भी इसलिए कारगर नहीं हो पातीं, क्योंकि ट्रोलिंग एक तरह से टिप्पणी है और मानहानि न होने पर ये धाराएं निष्प्रभावी हो जाती हैं। हालांकि, फर्जी अकाउंट से यदि ट्रोलिंग की जा रही है, तो जालसाजी और पहचान छिपाने के खिलाफ आईटी ऐक्ट की धारा 66-सी के तहत कार्रवाई हो सकती है और अगर ट्रोलिंग से गुमराह करने की कोशिश की गई है, तो धारा 66-डी लगाई जा सकती है। 
इसी तरह, ट्रोलिंग में यदि झूठ लिखा जा रहा हो और लोगों को भ्रमित करने की मंशा दिखती हो, तो आईपीसी की धारा-468 और 469 के तहत कार्रवाई की जा सकती है, जिनमें सजा और जुर्माना, दोनों के प्रावधान हैं। और, अगर ट्रोलिंग के साथ स्टॉकिंग हो, तो कुछ हद तक आईपीसी-354 के तहत कार्रवाई हो सकती है। मगर ये भी ट्रोलिंग से निपटने के परोक्ष तरीके हैं, कोई प्रत्यक्ष उपाय नहीं। हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं कि बतौर नागरिक हमारेे पास कोई रास्ता नहीं है। आत्महत्या करने के बजाय हमें ट्रोलिंग की शिकायत साइबर क्राइम की वेबसाइट पर करनी चाहिए। इसके लिए 1930 हेल्पलाइन नंबर से भी मदद ली जा सकती है।
जब तक कोई समर्पित कानून न बने, तब तक ट्रोलर्स से सीधे मुकाबला करने से भी हमें बचना चाहिए। अगर आप इसके भुक्तभोगी बनते हैं, तो पहले अपने परिजनों को विश्वास में लें। इसकी शिकायत सोशल मंच प्रदान करने वाली कंपनी से भी की जा सकती है। आईटी रूल्स 2021 के तहत सेवा देने वाली कंपनी से ट्रोलर्स के सोशल अकाउंट की शिकायत की जा सकती है, जिसमें अधिकतम 15 दिनों में कार्रवाई सुनिश्चित की गई है। अगर अश्लील शब्दों के साथ ट्रोल किया गया है, तो 24 घंटे के अंदर शिकायत के निवारण का प्रावधान आईटी कानून में है। 
कुछ लोग तर्क देते हैं कि अपने देश में कानून बनाने का रास्ता काफी लंबा है, लेकिन ट्रोलिंग के मामले में हमें एक सुविधा हासिल है। दरअसल, सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा-87 केंद्र सरकार को इस कानून के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तमाम प्रावधान अपनाने का अधिकार देती है। इसका उपयोग किया जा सकता है। फिर, हमें दूसरे देश का मुंह नहीं ताकना चाहिए, क्योंकि भारत की जमीनी हकीकत अन्य राष्ट्रों से अलग है। चेन्नई मामले में ही मां को कोसा गया, जबकि पश्चिमी देशों में मां और बच्चे का संबंध अपने यहां से अलग होता है। चूंकि हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य व परिवेश विदेश से अलग हैं, इसलिए ट्रोलिंग को लेकर हमारा कानून भी अलग होना चाहिए।
ज्यादातर मामलों में ट्रोलर्स वीपीएन, यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे अपनी पहचान छिपा लेते हैं, इसलिए इनको पकड़ने के लिए हमें खास उपाय अपनाने होंगे। यहां पुलिस अधिकारियों को भी संवेदनशीलता दिखानी होगी। उनको भुक्तभोगियों का दर्द महसूस करना होगा। हालांकि, आम लोगों को भी साइबर सुरक्षा को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए। तभी वे साइबर अपराध का शिकार बनने से बच सकेंगे। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)