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इस चुनाव में आधी आबादी का हासिल

लोकसभा में इस बार महिलाओं का कुछ कम प्रतिनिधित्व होगा, मगर अब संभ्रांत घर की महिलाएं ही नहीं, दबी-कुचली जातियों की औरतें भी लड़कर इसमें आने को आतुर हैं। सतरहवीं लोकसभा का वह आखिरी सत्र था और विशेष...

इस चुनाव में आधी आबादी का हासिल
Monika Minalमनीषा प्रियम, राजनीतिक विश्लेषकTue, 11 Jun 2024 10:06 PM
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सतरहवीं लोकसभा का वह आखिरी सत्र था और विशेष भी, क्योंकि उसमें ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को पारित किया गया। इसके द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि आने वाले वर्षों में (साल 2029 के आम चुनाव से संभवत:) लोकसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी। आरक्षण की यह सीमा 33 फीसदी तय की गई और इसे देश भर की विधानसभाओं पर भी लागू किया गया है। स्वाभाविक ही यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राजग सरकार की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत था। 
यूं तो महिला आरक्षण की चर्चा बतौर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सन् 1989 में ही उठाई थी। तब केंद्रीय मंत्री मार्गरेट अल्वा के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था, जिसने ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण प्रस्तावित किया। हालांकि, उनका वह विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया, मगर राज्यसभा में गिर गया। उस वक्त खासकर सामाजिक न्याय में विश्वास रखने वाले नेताओं ने ही इसका विरोध किया था। तब शरद यादव ने कुछ ऐसी टिप्पणी की थी, जिससे प्रतीत हुआ कि ‘परकटी’ महिलाएं वास्तव में जाति आधारित आरक्षण को महिला आरक्षण के परोक्ष प्रयोग से कमजोर बना देंगी। हालांकि बाद में, पीवी नरसिंह राव वाली कांग्रेस सरकार ने इसे पास किया। बावजूद इसके संसद में महिला आरक्षण की फाइल धूल-धूसरित ही रही। कहा यह भी जाता रहा कि बीजद या तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां बगैर आरक्षण के भी औरतों को खुले दिल से टिकट देती हैैं, जिसका अर्थ है कि बगैर आरक्षण के उन्हें संसद में लाया जा सकता है। 
इसी पृष्ठभूमि में 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए। इसमें महिलाओं के बारे में दो बातें प्रमुखता से पूछी जा रही हैं। पहली, किस पार्टी ने कितने टिकट आधी आबादी को दिए और दूसरी, कहां से व कितनी औरतें चुनाव जीतने में सफल हुईं? हालांकि, चुनावी चर्चा में यह मुद्दा भी गरम रहा कि क्या महिलाएं सिर्फ एक वोटबैंक हैं और राष्ट्रीय चुनाव में क्या वे एकमुश्त नरेंद्र मोदी को अपना वोट देंगी? ऐसा इसलिए, क्योंकि अयोध्या में रामलला की मूर्ति-स्थापना के बाद माना जा रहा था कि महिलाएं इसके लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद देंगी और अपना वोट भाजपा को देंगी।
मगर चुनाव-बाद की तस्वीर कुछ अलग दिख रही है। बेशक ‘मोदी 3.0’ एक मिली-जुली सरकार है, फिर भी रविवार को जब मंत्रिमंडल की शपथ दिलाई गई, तो 72 माननीयों में केवल चार महिलाओं को यह सौभाग्य मिला। वैसे, लोकसभा में भी इस बार पिछली बार की तुलना में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व होगा। एडीआर के मुताबिक, 18वीं लोकसभा के लिए 74 महिलाओं का निर्वाचन हुआ है, जो कुल सांसदों का 13.6 प्रतिशत है। 17वीं लोकसभा में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत था और 77 महिलाएं निचले सदन में आई थीं। हालांकि, 2014 के आम चुनाव में 542 में से 62 (11 प्रतिशत) महिला सांसद थीं, जबकि 2009 में 11 फीसदी (543 में से 59 सांसद) हिस्सेदारी आधी आबादी को हासिल हुई थी।
यदि विजेता उम्मीदवारों का लिंग के आधार पर विश्लेषण करें, तो इस बार बड़ी पार्टियों में तृणमूल कांग्रेस सभी दलों पर भारी साबित होती दिख रही है। उसके 29 सांसदों में से 11 महिलाएं (38 प्रतिशत) हैं। इनमें कृष्णानगर से जीतने वाली महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं, जिनको कुछ ही महीने पहले लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। तृणमूल कांग्रेस चूंकि ‘इंडिया’ ब्लॉक की प्रमुख सहयोगी है, इसलिए मुमकिन है कि विपक्ष में महिलाओं की आवाज बुलंद होती रहेगी। वैसे, कांग्रेस से जीतने वाली महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत 13 है, जबकि सपा से 14 प्रतिशत। रही बात भाजपा की, तो उसके कुल सांसदों में विजेता महिलाओं की हिस्सेदारी 13 फीसदी है। 
यहां कुछ सांसदों का नाम उल्लेखनीय है, विशेषकर राजस्थान की भरतपुर सीट से निर्वाचित संजना जाटव की, जिनकी जीत बताती है कि अब संभ्रांत घर की महिलाएं ही नहीं, दबी-कुचली जातियों की औरतें भी लड़कर लोकसभा में आने को आतुर हैं। एक लंबे अरसे तक औरतों की यह कहकर आलोचना की जाती रही कि किन्हीं कारणों से यदि पति चुनाव नहीं लड़ पाता, तो उसके रिक्त स्थान को भरने के लिए पत्नी मैदान में उतारी जाती है। मगर अब युवतियां खुद अपनी लड़ाई लड़कर वर्ग-जाति का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। इसी तरह, कर्नाटक से प्रियंका जारकीहोली, बिहार से शांभवी चौधरी, उत्तर प्रदेश से इकरा हसन और प्रिया सरोज की चर्चा स्वाभाविक है, जो युवा महिला सांसदों में शुमार हैं। यहां सोफिया फिरदौस का उल्लेख भी आवश्यक है, जो वैसे तो ओडिशा की पहली मुस्लिम महिला विधायक बनी हैं, लेकिन आईआईएम की पढ़ाई करने के बाद उनका इस तरह राजनीति में उतरना बदलते समाज का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
सवाल है कि आने वाले दिनों में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ाया जाए? इसके लिए तो सबसे पहले सभी दलों को औरतों को अधिक टिकट देना होगा, साथ ही महिलाओं को खुद भी सदन में पक्ष व प्रतिपक्ष की मुखर आवाज बनकर उभरना होगा। जरूरत इस बात की है कि महिलाएं राजनीतिक सरोकार से ऊपर उठकर जनहित के मुद्दों पर एकजुटता दिखाएं। जहां कहीं भी महिला अधिकारों का हनन हो, वहां उनको दलीय राजनीति से ऊपर उठकर उस महिला की प्रतिष्ठा का समर्थन करना चाहिए। मणिपुर में पिछले दिनों औरतों के अधिकारों का जिस तरह हनन किया गया, उसका एकजुट होकर विरोध जरूरी था, पर ऐसा हो नहीं सका। लिहाजा, महिला सांसदों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कैसे आधी आबादी की प्रतिष्ठा बनी रहे और वह भारतीय लोकतंत्र में समान नागरिक बनकर अपनी लोकतांत्रिक भागीदारी निभा सके।
चूंकि 2029 से महिला आरक्षण के तहत चुनाव संभावित हैं, इसलिए जो संसदीय क्षेत्र औरतों के लिए चिह्नित होंगे, उसमें यदि पार्टियां केवल मजबूत नेताओं की पत्नी-बेटी अथवा बहू को टिकट देंगी, तो स्वायत्तता से महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकेगा। लिहाजा, राजनीतिक दलों पर यह दबाव भी बनाना चाहिए कि वे उन महिलाओं पर भरोसा करें, जो अपने बूते लड़ने में सक्षम हैं। वैसे, ईमानदारी से टिकट वितरण ही काफी नहीं है। संसदीय प्रणाली का प्रशिक्षण भी नवनिर्वाचित महिला सांसदों को देना होगा, तभी वे संसद में अपनी बात दम-खम के साथ रख सकेंगी।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)