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दक्षिण में भी एक से एक पलटीमार 

ऐसा नहीं है कि पलटीमार नेता केवल उत्तर भारत में पाए जाते हैं, दक्षिण में भी ऐसे अनेक नेता हैं, जो उत्तर के नेताओं को सियासी कलाबाजी के कुछ गुर सिखा सकते हैं।जब प्राथमिक विकल्प नाकाम हो जाता है, तब...

दक्षिण में भी एक से एक पलटीमार 
Monika Minalएस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारMon, 17 Jun 2024 08:08 PM
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जब प्राथमिक विकल्प नाकाम हो जाता है, तब रणनीतिकार अक्सर आकस्मिक योजना का विकल्प चुनते हैं। इसी तरह लगातार चुनावी कामयाबी का लक्ष्य रखने वाले राजनेता अपनी मूल रणनीति को लागू करने में निहित जोखिमों से अच्छी तरह वाकिफ होते हुए सावधानी से ‘बैकअप’ योजनाएं तैयार करते हैं। मिसाल के लिए, जब नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में भाजपा के लिए 370 सीटें और एनडीए सहयोगियों की सहायता से 400 सीटें हासिल करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा, तब उन्होंने संख्या बल में कमी की स्थिति में दक्षिणी राज्यों को अतिरिक्त समर्थन के संभावित स्रोत के रूप में देखा था। दक्षिण में सीटें जीतना उनकी वैकल्पिक योजना या प्लान-बी का हिस्सा था। 
राजनीति में मूल योजना और द्वितीय योजना के नाकाम होने के बाद नेता तीसरी योजना का भी सहारा लेते देखे जाते हैं। हालांकि, यह तीसरी योजना ज्यादा मुकम्मल नहीं हो सकती। मिसाल के लिए, यदि चंद्रबाबू नायडू से फिर समर्थन लेने का मोदी का प्लान बी नाकाम हो जाता, तो उन्हें बचाव के लिए एक प्लान सी भी तैयार करना पड़ता। गौर करने की बात है कि अब तक मोदी अपने प्लान-बी को लागू कर खास फायदा लेने में कामयाब रहे हैं। साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने दक्षिण की कुल 130 लोकसभा सीटों में से 29 सीटें स्वतंत्र रूप से हासिल की थीं। इसके अलावा, भाजपा को एक अतिरिक्त सीट तब मिली, जब अभिनेता अंबरीश की पत्नी सुमलता, जिन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा, जीत के बाद भाजपा में शामिल हो गईं। 
लोकसभा चुनाव 2024 में भी भाजपा को दक्षिण से लगभग उतनी ही, 29, सीटें मिली हैं, जबकि वह एनडीए के साथ मिलकर 45 सीटें जीतने में कामयाब रही है। वैसे दक्षिण में एनडीए की मजबूती बनाए रखने के लिए नरेंद्र मोदी को लगातार अपने कंधे पर नजर रखनी पड़ेगी। वैसे तो बिहार के एक नेता के विरोधी उनके यू-टर्न के लिए उनको ‘पलटू राम’ कहते हैं, लेकिन चंद्रबाबू नायडू उन्हें भी मौकापरस्ती व सियासी कलाबाजी के कुछ गुर सिखा सकते हैं। अपने फैसले पलटने का काम नायडू ने अपने 46 साल के लंबे सियासी करियर में बखूबी किया है।
अब यह एक इतिहास है कि 28 वर्षीय नायडू ने अपने सियासी करियर का आगाज अविभाजित आंध्र प्रदेश में वाई राजशेखर रेड्डी के साथ युवा कांग्रेस नेता के रूप में किया था। दोनों नेता अच्छे दोस्त थे, पर उनकी सियासी किस्मत ने अलग-अलग राह पकड़ ली। 30 साल की उम्र में नायडू सबसे कम उम्र के मंत्री बने थे। वह एक वफादार कांग्रेसी बने रहे, हालांकि, उनकी शादी मशहूर अभिनेता एन टी रामा राव की बेटी से हुई। रामा राव ने कांग्रेस को हटाने के मकसद से तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना की थी। एक समय तो नायडू ने अपने ससुर के खिलाफ चुनाव लड़ने की हिम्मत दिखाई थी, पर जल्द ही उनकी हिचक दूर हुई और कांग्रेस में गिरावट को भांपते हुए नायडू ने पलटवार किया और तेलुगु देशम पार्टी में शामिल हो गए।
लोग याद करते हैं कि साल 1999 में भी नायडू भाजपा के साथ मिल गए थे और रिकॉर्ड 29 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहे थे। इस जीत ने उन्हें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से खास रियायतें लेने में सक्षम बना दिया था। वैसे साल 2004 और साल 2009 में वह कांग्रेस नेता राजशेखर रेड्डी के सामने टिक न सके। तब उन्होंने विपक्षी वोटों को बांटने के लिए सुपरस्टार चिरंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी या पीआरपी को दोषी ठहराया था। साल 2014 में जब आंध्र प्रदेश का विभाजन हुआ, तब उन्हें चिरंजीवी के भाई पवन कल्याण द्वारा शुरू की गई जन सेना के साथ गठबंधन में कोई हिचक नहीं हुई। तब नायडू को मोदी की भाजपा से भी गठबंधन करने में कोई परेशानी नहीं हुई। उनके यू-टर्न ने ही उन्हें साल 2014 में सत्ता में लौटने में मदद की थी, पर नायडू का मन ज्यादा समय तक कहां स्थिर रहता है?
साल 2018 में भाजपा के साथ उनके रिश्ते में फिर कड़वाहट घुल गई और उन्होंने आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा देने में केंद्र की नाकामी के विरोध में तेदेपा के दो मंत्रियों को मोदी कैबिनेट से बाहर निकल जाने के लिए कह दिया। और तो और, एक साल बाद ही 2019 में उन्होंने संसदीय चुनाव लड़ने के लिए दशकों से कट्टर दुश्मन रही कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया, पर हार गए। इसके बाद वह फिर एनडीए में लौटने के लिए संघर्ष करने लगे। मुख्यमंत्री जगनमोहन का शिकंजा कसता जा रहा था और कथित भ्रष्टाचार के एक मामले में उन्हें कुछ समय के लिए जेल भी जाना पड़ा था। कभी रोते हुए नायडू ने प्रतिज्ञा की थी कि वह केवल मुख्यमंत्री के रूप में ही राज्य विधानसभा में लौटेंगे। 
साल 2024 के चुनाव में उनकी गुहार पर जनता ने गौर किया। भाजपा ने जन सेना और तेदेपा के साथ गठबंधन में विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा चुनावों में भी भाग लिया और मिलकर 21 लोकसभा सीटें हासिल की हैं। भाजपा को पहली बार राज्य मंत्रिमंडल में जगह मिली है। जगनमोहन की पार्टी औपचारिक रूप से एनडीए का हिस्सा नहीं है, फिर भी संसद में भाजपा का समर्थन कर रही है।
बहरहाल, चंद्रबाबू नायडू की तरह पवन कल्याण के भी स्वार्थ और अवसरवादिता से संचालित होने की बड़ी आशंका है। वह भी पलटते रहे हैं। उन्होंने अपने सियासी करियर की शुरुआत बड़े भाई चिरंजीवी के साथ की थी। मगर जब उनके बीच मतभेद सामने आए, तब जल्द ही उन्होंने रिश्ते तोड़ लिए। पवन कल्याण ने साल 2014 में जन सेना लॉन्च करके भाजपा का समर्थन किया, पर 2019 में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ लड़ गए। भारतीय जनता पार्टी पर दक्षिणी राज्यों के अधिकारों को कुचलने का आरोप भी लगा दिया। सियासी विडंबना देखिए, साल 2024 में उन्हें उसी भगवा दल के साथ गठबंधन करने में कोई परेशानी नहीं हुई।
बेशक, आंध्र प्रदेश में सियासी खींचतान से वाकिफ भाजपा ने शायद अपना रास्ता तैयार कर लिया है, वह अपने गठबंधन में सहयोगियों को साथ लेकर खुद को मजबूत करने में जुटी है। गौर कीजिए, अमूमन राज्यों के सरकारी कक्षों में सिर्फ मुख्यमंत्री की तस्वीर दीवारों पर सजती है, पर आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री की तस्वीर के साथ उनके उप-मुख्यमंत्री पवन कल्याण की भी तस्वीर सज रही है। क्या यह अपनी मोर्चाबंदी को टूटने से रोकने का चंद्रबाबू नायडू का नया तरीका है?
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)