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जम्मू में आतंकी चुनौती कितनी गंभीर

ताजा आतंकी हमले घाटी नहीं, बल्कि जम्मू के उन इलाकों में हुए हैं, जहां कुछ वर्ष पहले तक माना जाता था कि आतंकवाद का करीब-करीब सफाया कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर में गुजरे तीन दिनों में तीन आतंकी...

जम्मू में आतंकी चुनौती कितनी गंभीर
sushant sareen
Monika Minalसुशांत सरीन, सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशनThu, 13 Jun 2024 12:40 AM
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जम्मू-कश्मीर में गुजरे तीन दिनों में तीन आतंकी घटनाओं के गहरे निहितार्थ हैं। यह स्थिति तब दिख रही है, जब हालिया आम चुनाव में यहां के लोगों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। जम्मू-कश्मीर के पांचों संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में करीब 58 फीसदी मत पड़े हैं, जो लोकतंत्र में स्थानीय लोगों के बढ़ते विश्वास का संकेत माना गया था। जाहिर है, सवाल यही है कि ऐसे हमले करके आतंकी अपनी बौखलाहट का प्रदर्शन कर रहे हैं या फिर उनकी यह कोई नई रणनीति है?
दरअसल, ताजा हमले कश्मीर घाटी में नहीं हुए हैं, बल्कि जम्मू के उन इलाकों में हुए हैं, जहां कुछ वर्ष पहले तक माना जाता था कि आतंकवाद का करीब-करीब सफाया कर दिया गया है। यहां बीते डेढ़-दो दशकों में कोई बड़ी आतंकी वारदात नहीं हुई थी, पर पिछले तीन-चार साल में ‘एरिया ऑफ ऑपरेशन’ नजर आने लगा था, यानी आतंकियों की मौजूदगी दिखने लगी थी। असल में, आतंकवाद के खिलाफ सैन्य कार्रवाई गुब्बारे सरीखा नतीजा देती है, यानी एक जगह जब आप उसका दमन करते हैं, तो दूसरी तरफ से उसका उभार होने लगता है। कश्मीर घाटी के अंदर भी आतंकियों ने पहले श्रीनगर, फिर उत्तरी कश्मीर और बाद में दक्षिणी हिस्से में अपना ठिकाना बना लिया था। मगर धीरे-धीरे सुरक्षा बलों ने पूरे इलाके पर अपना  दबदबा बना लिया, तो फिर जम्मू में हिंसक घटनाएं बढ़ने लगीं, खासतौर से राजौरी और पुंछ जैसे इलाकों में। लिहाजा, सुरक्षा बलों ने जम्मू में भी अपना सुरक्षा घेरा फिर से मजबूत करना शुरू कर दिया था, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया है, इसलिए आतंकी अपनी मंशा में कुछ हद तक सफल हो गए।
ताजा हमलों में दहशतगर्द कहीं अधिक दक्ष दिख रहे हैं। घाटी में जब सुरक्षा बल असरंदाज हो गए थे, तो वहां होने वाली छिटपुट हिंसा अमूमन अकुशल आतंकी किया करते थे, लेकिन हाल के वर्षों में दक्ष आतंकियों द्वारा कार्रवाई किए जाने के मामले बढ़े हैं। उनके पास हथियार भी पहले से कहीं बेहतर हैं। यहां तक कि वे पहाड़ों व जंगलों का बखूबी इस्तेमाल जानते हैं। जाहिर है, यह प्रशिक्षण उनको पड़ोसी मुल्क में मिला होगा। लगता यही है कि पाकिस्तान के अंदर घुसने का कोई अनधिकृत रास्ता है, जिसका इस्तेमाल ये सुरक्षा बलों से बचने के लिए करते हैं। एक प्रवृत्ति और दिख रही है। किसी बड़े समूह में नहीं, बल्कि एक-दो की संख्या में आतंकी अपने मनसूबे को अंजाम दे रहे हैं। मुमकिन है, इसमें एक स्थानीय आतंकी हो और दूसरा पड़ोसी देश से प्रशिक्षित दहशतगर्द। ऐसे में, अब इस इलाके में एक बड़ी सैन्य कार्रवाई की दरकार है, हालांकि यह कोई आसान काम भी नहीं।
सवाल यह भी है कि आखिर ये घटनाएं इस समय क्यों हो रही हैं? निस्संदेह, साल 2019 में जम्मू-कश्मीर को लेकर संविधान में किए गए सुधार के बाद यहां की स्थिति काफी बेहतर हुई है, लेकिन कुछ समस्याएं अभी भी कायम हैं। निस्संदेह, यहां आतंकवाद से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों पर लगाम लगाई गई है, प्रशासन में मौजूद अलगाववादी विचारधारा के लोगों के खिलाफ कडे़ कदम उठाए गए हैं और जमात-ए-इस्लामी जैसे संगठनों को प्रतिबंधित किया गया है, पर विभाजनकारी सोच अब भी कुछ हद तक समाज में बनी हुई है। यह मानसिकता इसलिए खत्म नहीं हो सकी है, क्योंकि जरूरी राजनीतिक विकल्प देने में हम नाकाम रहे हैं। इस गलती को जल्द सुधारना उचित होगा।
यहां आम चुनाव में लोगों ने जमकर भागीदारी निभाई है और मुख्यधारा की पार्टियों पर भरोसा किया है। घाटी की दो सीटें नेशनल कॉन्फ्रेंस, तो जम्मू की दोनों सीटें भाजपा की झोली में गई हैं। मगर बारामूला में अब्दुल राशिद शेख बतौर निर्दलीय उमर अब्दुल्ला जैसे नेता को हराने में सफल हो गए। आतंकियों को धन मुहैया कराने के आरोप में जेल में बंद राशिद की इस जीत से मुमकिन है कि दहशतगर्दों को प्रोत्साहन मिला हो। आतंकी घटनाएं बढ़ाकर वे अपने इरादे जाहिर कर रहे होंगे, क्योंकि उनकी नजर में यह जीत समाज के एक तबके में उनकी स्वीकार्यता का प्रतीक हो सकती है। वैसे, इस पूरे प्रकरण को पाकिस्तान से भी जोड़कर देखा जा सकता है, क्योंकि उसकी बदहाल माली हालत जगजाहिर है, इसलिए वह नई दिल्ली को यह संदेश देना चाह रहा होगा कि कश्मीर में अब भी उसका परोक्ष दखल कायम है।
बहरहाल, आतंकियों ने ऐसे समय में मोर्चा खोला है, जब भारत में चुनाव खत्म हुए हैं और सहयोगी दलों पर निर्भर सरकार सत्ता में है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि ऐसा करके न सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी पारी को चुनौती दी गई है, बल्कि इस संभावना को भी खत्म करने की कोशिश की गई है कि आम चुनाव निपटने के बाद भारत और पाकिस्तान बातचीत की मेज पर बैठ सकते हैं। 
वैसे, अगले तीन-चार महीनों में जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, जिसके बाद इसे राज्य का दर्जा दिया जा सकता है। ऐसे में, कई तरह की चुनौतियां हमारे सामने हैं। सबसे पहले तो वहां शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित कराना। आशंका यह भी है कि राजनीतिक विकल्पहीनता की स्थिति में यदि पुराने राजनेता सत्ता में लौटते हैं, तो उनका रवैया कैसा होगा? क्या वे फिर एक हाथ अलगाववादियों के कंधे पर रखेंगे और दूसरे हाथ से उनको हल्की थपकी देंगे? कौन इसकी गारंटी लेगा कि जम्मू-कश्मीर के हालात पूर्ववत नहीं हो जाएंगे? चूंकि अब तक यहां केंद्र का नियंत्रण रहा है, जबकि पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद राज्य सरकार के पास तमाम अधिकार आ जाएंगे, लिहाजा अलगाववादी सोच से कैसे पार पाया जा सकेगा? लोकसभा चुनाव की तरह अगर अलगाववादी राज्य चुनाव में खड़े होते हैं व ठीक-ठाक संख्या में विधानसभा में पहुंच जाते हैं और सरकार के गठन में महत्वपूर्ण किरदार निभाने लगते हैं, तब इस प्रदेश की राजनीतिक बयार क्या रुख लेगी?
आशंकाएं कई हैं, लेकिन उम्मीद यही की जा सकती है कि यहां के सियासी और सामाजिक हालात काबू में रहेंगे। हां, राजनीतिक विकल्प अगर जल्दी तैयार नहीं किया गया, तो तरक्की की ओर कदम बढ़ाता जम्मू-कश्मीर फिर से पिछड़ सकता है। लोकसभा चुनाव में राशिद शेख की जीत चेतावनी जैसी है। उन्होंने उमर अब्दुल्ला को दो लाख से भी अधिक मतों से तब हराया है, जब यहां के कई इलाकों में नेशनल कॉन्फ्रेंस का खासा प्रभाव माना जाता है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)