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रोजगार के सवाल पर राहत कितनी

लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से लगता है कि रोजगार फिर एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। सरकार के आलोचकों को लगता है कि बेरोजगारों का गुस्सा ही चुनाव नतीजों में सामने आया है। जाहिर है, सरकारी पक्ष...

रोजगार के सवाल पर राहत कितनी
alok joshi
Pankaj Tomarआलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकारSun, 23 Jun 2024 10:30 PM
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लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद से लगता है कि रोजगार फिर एक गंभीर चिंता का विषय बन चुका है। सरकार के आलोचकों को लगता है कि बेरोजगारों का गुस्सा ही चुनाव नतीजों में सामने आया है। जाहिर है, सरकारी पक्ष भी इस तरफ से कान बंद करके नहीं बैठ सकता। खास बात यह है कि तमाम परेशानियों के बावजूद भारत लगातार दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है। और, इस बात पर तमाम विद्वान एकमत हैं कि आने वाले कम से कम दस-पंद्रह साल तक भारत में तरक्की की रफ्तार इतनी या इससे तेज ही रहने वाली है। ऐसे में, नौजवानों की उम्मीद भी बढ़ती है, लेकिन यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि रोजगार का मतलब नौकरी नहीं है, और सिर्फ सरकारी नौकरी तो कतई नहीं।
जीडीपी में आठ प्रतिशत की जबर्दस्त बढ़त दर हासिल करने के बाद भी बेरोजगारी भारत की बड़ी समस्याओं में एक बनी हुई है। एनडीए सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही यह बात साफ है कि राजनीतिक तालमेल से निपटने के बाद इस सरकार की सबसे बड़ी चुनौती रोजगार का इंतजाम होगा। पिछले बुधवार को मंत्रिमंडल की बैठक में जो फैसले हुए उनका ब्योरा देते हुए रोजगार पर खास जोर दिखाई पड़ा। महाराष्ट्र के वधावन पोर्ट की मंजूरी के साथ ही बताया गया कि इससे 17 लाख रोजगार पैदा होंगे। 76,000 करोड़ रुपये के खर्च से बनने वाला यह बंदरगाह भारत की सबसे बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में से एक है। मगर इस खुशखबरी के साथ यह चिंता भी खड़ी हो जाती है कि तब करोड़ों रोजगार जुटाने के लिए कहां-कहां कितना-कितना खर्च करना पड़ेगा?
भारत सरकार की पे रिसर्च यूनिट सरकारी कर्मचारियों और अफसरों के वेतन-भत्तों पर खर्च का ब्योरा जारी करती है। उसकी वेबसाइट पर आखिरी रिपोर्ट वित्त वर्ष 2020-21 की लगी है। इसके हिसाब से 1 मार्च, 2021 को केंद्र सरकार में सभी वर्गों के कुल 41,11,146 कर्मचारियों के पदों की मंजूरी थी, लेकिन इनमें से 9,95,803 पद खाली थे। यानी, 24.22 प्रतिशत खाली पद भरे नहीं जा सके थे। उसके बाद का आंकड़ा अभी सामने नहीं है। मगर इस साल की शुरुआत में रेलवे भर्ती के मामले पर जैसा बवाल मचा, वह दिखाता है कि नौजवान कितने बेकरार हैं।   
अभी एक समाचार एजेंसी ने देश के जाने-माने अर्थशा्त्रिरयों से सवाल पूछे, तो उनमें से 91 फीसदी का जवाब था कि नई सरकार के लिए आर्थिक मोर्चे पर सबसे बड़ी चुनौती रोजगार के सवाल का हल तलाशना ही होगा। उनके हिसाब से भी समस्या विकट हो रही है, क्योंकि तेज आर्थिक विकास के बावजूद उस अनुपात में रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की ‘इंडिया इंप्लॉयमेंट रिपोर्ट’ ने पिछले बीस साल के दौरान भारत में रोजगार की तस्वीर खींचने की कोशिश की है। हालांकि, इन वर्षों में कोरोना काल के लगभग गर्त में गए साल भी शामिल हैं। फिर भी, इसमें एक बड़ी चिंता सामने आती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में देश की आबादी का लगभग 64 फीसदी हिस्सा 15 से 59 साल की उम्र के बीच है। इसी उम्र के लोगों को कामकाजी आबादी माना जाता है। हालांकि, इस पर विवाद हो सकता है, क्योंकि 18 से कम उम्र के लोगों को रोजगार में होना नहीं चाहिए और आजकल 60 पार करने के बाद भी कई लोग तरह-तरह के काम करते रहते हैं। फिर भी, यदि इसी परिभाषा को मान लें, तो सोचने वाली बात यह है कि 2011 में आबादी का 61 फीसदी हिस्सा ही ऐसे लोगों का था, जबकि रिपोर्ट के मुताबिक, 2036 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 65 फीसदी हो जाएगी। हर साल 80 लाख से ज्यादा नौजवान इस बिरादरी का हिस्सा बन रहे हैं। 
इसमें थोड़ा और बारीकी से झांकें, तो पता चलता है कि 2000 में जहां आबादी के इस हिस्से में सिर्फ 18 फीसदी लोग पढ़े-लिखे थे, वहीं 2022 तक यह गिनती बढ़कर 35 फीसदी हो चुकी थी। जबकि, दूसरी तरफ इसी दौरान कमाई कर रहे नौजवानों की गिनती 52 फीसदी से गिरकर 37 फीसदी पर पहुंच गई थी। इस रिपोर्ट में साफ दिख रहा है कि बेरोजगारी का संकट मुख्यरूप से नौजवानों की समस्या है। 2022 में कुल बेरोजगारों में 82.9 प्रतिशत नौजवान थे, जबकि पढ़े-लिखे नौजवान इस बेरोजगारों की फौज का 65.7 फीसदी हिस्सा हो चुके थे। चिंता को और बढ़ाने वाला आंकड़ा यह है कि 12वीं क्लास या उससे ज्यादा पढ़ने के बाद भी जो लोग बेरोजगार हैं, उनमें से 76.7 फीसदी महिलाएं या लड़कियां थीं।   
साफ है, ये सारे लोग सरकारी या निजी नौकरी के भरोसे तो हैं नहीं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं, जो स्वरोजगार करते हैं और वे भी, जो अपने परिवार के कारोबार में हाथ बंटाते हैं। दीगर यह भी है कि भारत की आबादी का 65 प्रतिशत हिस्सा गांवों में रहता है और 47 फीसदी खेती या उससे जुड़े कामकाज के भरोसे है। यह जानकारी 2022 के आर्थिक सर्वेक्षण में थी। मगर अब बेरोजगारी की जद्दोजहद में सबसे बड़ी व कमजोर कड़ी है खेती के अलावा असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले या काम की तलाश में लगे लोग। इन्हीं का हाल बताने के लिए सरकार का सांख्यिकी विभाग नियमित रूप से सर्वेक्षण करता रहता है। शहरी क्षेत्रों के लिए तिमाही रिपोर्ट आती है, जबकि गांवों के लिए सालाना।
इसी महीने सरकार ने 2021-22 और 2022-23 के सालाना सर्वे की रिपोर्ट जारी की है। 2022-23 की रिपोर्ट में बेरोजगारी की दर 3.2 प्रतिशत दिख रही है, यानी अमेरिका से भी कम, लेकिन इसी में 15 से 29 साल की उम्र के लोगों में यह 10 फीसदी के चिंताजनक स्तर पर दिख रही है। 2017-18 के आंकड़े से मिलाएं, तो पता चलता है कि यह 17.8 प्रतिशत की ऊंचाई से गिरकर 10 फीसदी पर आई है। दूसरी तरफ, शहरी रोजगार पर तिमाही रिपोर्ट के अनुसार इस साल जनवरी से मार्च के दौरान 15 से 29 साल के लोगों में बेरोजगारी की दर 17 फीसदी पर पहुंच गई है। यह पिछले साल से थोड़ी कम है, मगर खतरे के निशान से काफी ऊपर है।
यहां यह बात भी समझनी चाहिए कि मुफ्त राशन, मुफ्त गैस और मुफ्त घर से अब काम नहीं चल पाएगा। लोगों को अब रोजगार चाहिए। और, रोजगार भी ऐसा, जिससे उन्हें अपनी इज्जत और हैसियत बढ़ने का एहसास हो। सरकार यह लक्ष्य कैसे हासिल करेगी, यह आज का सबसे बड़ा सवाल है। मगर इतना साफ है कि इस समस्या का सामना करना ही पड़ेगा। इससे मुंह मोड़कर गुजारा नहीं हो सकता।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)