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किसानों के किन्नू और शेयर बाजार

जिस समय हरियाणा-पंजाब के शंभू बॉर्डर पर किसानों और सुरक्षा बलों में संघर्ष चल रहा है, ठीक उसी समय पंजाब के दूसरे सिरे पर अबोहर में किन्नू की बागवानी करने वाले किसान अपनी फसल बरबाद करने के लिए...

किसानों के किन्नू और शेयर बाजार
Pankaj Tomarहरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकारSun, 25 Feb 2024 10:20 PM
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जिस समय हरियाणा-पंजाब के शंभू बॉर्डर पर किसानों और सुरक्षा बलों में संघर्ष चल रहा है, ठीक उसी समय पंजाब के दूसरे सिरे पर अबोहर में किन्नू की बागवानी करने वाले किसान अपनी फसल बरबाद करने के लिए मजबूर थे। तकरीबन यही हाल पड़ोसी राज्य राजस्थान के गंगानगर जिले के किन्नू किसानों का भी था। इस बार किन्नू की फसल बहुत अच्छी हुई, मगर आज के बाजारशास्त्र में अच्छी फसल खुशहाली लाने की जगह अक्सर किसानों के लिए दरिद्रता ही लाती है। यही प्याज के मामले में होता है, यही टमाटर के मामले में होता है, कई बार यही आलू के साथ भी होता है। किसान कितनी भी मेहनत कर ले, उसकी किस्मत का फैसला आखिर में निर्दयी बाजार के हवाले छोड़ दिया जाता है।
यहां इस बात को याद रखना भी जरूरी है कि शंभू बॉर्डर पर दिल्ली कूच के लिए डटे किसानों की अगर सारी मांगें मान भी ली जाती हैं, तब भी किन्नू किसानों का बहुत भला होने वाला नहीं है। वे जिन फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मांग रहे हैं, उनमें किन्नू शामिल नहीं हैं। मौसमी फसलों की खेती करने वाले किसानों के मुकाबले बागवानी करने वाले किसानों की दिक्कत बिल्कुल अलग होती है। उनके खेत में पूरे साल में एक ही फसल होती है और अगर वह भी बरबाद हो गई, तो उनके पास कुछ नहीं बचता। 
कैलिफोर्निया में विकसित संतरा परिवार के इस संकर फल की खेती आजादी से पहले पंजाब के कुछ हिस्सों में अंग्रेज सरकार ने प्रयोग के तौर पर शुरू की थी। आजादी के बाद देश के बहुत से हिस्सों में किसानों ने इसकी बागवानी बडे़ पैमाने पर शुरू कर दी और यह बहुत से किसानों की जीविका का प्रमुख साधन भी बन गया। यही हाल पाकिस्तान में भी है। मगर पाकिस्तान से इसका निर्यात भी होता है। कुछ साल पहले ‘सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायर्नमेंट’की कर्ता-धर्ता सुनीता नारायण श्रीगंगानगर गई थीं। वहां किन्नू की बागवानी देखकर उन्होंने कहा था कि यहां के किसान ही पर्यावरण बचाने में सबसे बड़ा योगदान दे रहे हैं। इस समय का सच यही है कि जो किसान पर्यावरण को बचा रहे हैं, उन्हें बचाने के लिए हमारी व्यवस्था के पास कुछ नहीं है। 
अर्थशास्त्री कहते हैं कि कृषि-व्यवस्था की भूमिका तभी तक है, जब तक कोई फसल खेत में है। फसल अगर बाजार में आ गई, तो उस पर कृषि-व्यवस्था के नहीं, बाजार की व्यवस्था के नियम लागू होते हैं और बाजार मांग व आपूर्ति पर चलता है। मांग बढ़ गई, तो भाव चढ़ जाते हैं और अगर आपूर्ति बढ़ गई, तो भाव बुरी तरह टूट भी जाते हैं। बात सही है, लेकिन क्या हर बाजार में ऐसा ही होता है? 
उदाहरण के लिए, हम शेयर बाजार को लेते हैं। शेयर बाजार में सारा खेल मांग और आपूर्ति का ही होता है। वहां कोई उत्पाद खरीदने-बेचने के लिए नहीं आते, शुद्ध रूप से सटोरियों की गतिविधियां ही होती हैं। शेयर बाजार के नियम भी यही कहते हैं कि वहां अगर किसी शेयर के खरीदार बढ़ जाएं, तो उसकी कीमत आसमान छूने लगती है और बिकवाल बढ़ जाएं, तो कीमत गोते लगाने लगती है। लेकिन शेयर बाजार के रोजमर्रा के कारोबार में ऐसा ही होता है? बिकवाल बढ़ने के कारण किसी शेयर के भाव एकदम से ही न टूट जाएं, इसके लिए शेयर बाजारों में एक व्यवस्था होती है, जिसे ‘सर्किट ब्रेकर’ कहा जाता है। उदाहरण के लिए, अगर किसी शेयर का भाव तेजी से गिरने लगता है, तो जरूरत के हिसाब से दस-बीस या तीस फीसदी पर सर्किट ब्रेकर लगा दिया जाता है। इसके बाद आप उससे कम कीमत पर उस शेयर का सौदा नहीं कर सकते। 
सर्किट ब्रेकर की इस व्यवस्था का मकसद आम निवेशक को बाजार की निर्दयता और सट्टेबाजी से बचाना होता है। इसका फायदा उद्योगों व उद्योगपतियों को भी मिलता है, क्योंकि इससे उनका बाजार पूंजीकरण एकाएक नहीं डूबता। यह भी माना जाता है कि बाजार का टूटना अंत में पूरी अर्थव्यवस्था के हौसले पस्त करता है, इसलिए सर्किट ब्रेकर एक तरह से अर्थव्यवस्था को भी झटकों से बचाता है। 
अब लौटते हैं किन्नू किसानों पर। जिस फसल को वे पिछले साल तक बीस रुपये प्रति किलो की दर से बेच रहे थे, इस बार तीन रुपये किलो में भी उसके खरीदार नहीं मिल रहे। मंडियों में अक्सर चलने वाले इस खेल पर लगाम लगाने का कोई भी संस्थागत तरीका हमने अभी तक विकसित नहीं किया है। हमने निवेशकों, उद्योगों और यहां तक कि सटोरियों को बाजार की निर्दयता से बचाने के सुरक्षा कवच तैयार कर लिए हैं, लेकिन किसानों को बचाने के सुरक्षा कवच अभी तक हमारे पास नहीं हैं।
शेयर बाजार में जिसे हम सर्किट ब्रेकर कहते हैं, वह पहली बार अमेरिका के शेयर बाजारों में तब लागू हुआ था, जब 1987 में अचानक आई मंदी से वहां के शेयर बाजार एकदम से धाराशायी हो गए थे। तब इसे बाजार में हस्तक्षेप नहीं माना गया था, इसे बाजार की व्यवस्था के परिपक्व होने की तरह देखा गया था। यही व्यवस्था बाद में भारत के शेयर बाजारों में भी आ गई। भारत में इस व्यवस्था का आना पूरे एक दशक तक चले उन सुधारों का हिस्सा था, जिसके केंद्र में यह चिंता थी कि आम निवेशक के हित सुरक्षित रहने चाहिए।   
बाजार के सुधारों का ऐसा ही सिलसिला कृषि मंडियों को लेकर भी चलाए जाने की जरूरत है, जिनके केंद्र में यह चिंता हो कि किसानों के आर्थिक हित सुरक्षित रहने चाहिए। कृषि का मामला हमारे लिए कई तरह से शेयर बाजार से बहुत ज्यादा अहमियत रखता है। सही या गलत, देश की 58 फीसदी आबादी अभी भी कृषि पर निर्भर है। जब आप किसानों के हितों की चिंता नहीं करते और उन्हें निर्मम बाजार के भरोसे छोड़ देते हैं, तो आप दरअसल देश की 58 फीसदी आबादी की अनदेखी कर रहे होते हैं। 
कृषि और किसानी की बहुत सी समस्याएं पूरी दुनिया में हैं। तकरीबन हर जगह किसानी बाजार के नियमों से जूझती हुई अपना अस्तित्व बनाए रखते हुए आगे बढ़ रही है। वहां जो हो रहा है, उससे सीखने के लिए बहुत कुछ है। मगर हमारी स्थितियां काफी अलग हैं, इसलिए हमें अपनी समस्याओं से निपटने के अपने औजार विकसित करने होंगे। एक अल्प पोषण वाले समाज में अगर किसान किन्नू जैसी फसल बरबाद करने को मजबूर हैं, तो इसका अर्थ है कि बहुत से विरोधाभासों को खत्म करने का समय आ गया है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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