फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियनवक्त के साथ बहुत बदल गया चुनाव

वक्त के साथ बहुत बदल गया चुनाव

पहले आम चुनाव से लेकर आज जब अठारहवीं लोकसभा के चुनाव अपने अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं, एक बात पूरी शिद्दत से कही जा सकती है कि शुरुआत से ही चुनाव-प्रक्रिया उत्सवधर्मी भारतीय समाज के लिए किसी...

वक्त के साथ बहुत बदल गया चुनाव
Pankaj Tomarविभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारीMon, 27 May 2024 09:41 PM
ऐप पर पढ़ें

पहले आम चुनाव से लेकर आज जब अठारहवीं लोकसभा के चुनाव अपने अंतिम चरण में पहुंच चुके हैं, एक बात पूरी शिद्दत से कही जा सकती है कि शुरुआत से ही चुनाव-प्रक्रिया उत्सवधर्मी भारतीय समाज के लिए किसी मेले-ठेले सी रही है। शून्य से नीचे वाली बर्फानी पहाड़ियों से लेकर पचास डिग्री सेल्सियस तापमान वाले रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले मतदाता ने अपने जीवन की तमाम गतिविधियों की तरह मतदान को भी नृत्य, संगीत, उल्लास, उत्साह, प्रेम या घृणा से जोड़ रखा है। 
समय के साथ इतना फर्क जरूर आया है कि व्यस्तताओं और मनोरंजन के दूसरे विकल्पों के चलते, अब जैसे-जैसे सार्वजनिक स्थलों पर गंभीर प्रदर्शन कलाओं की प्रासंगिकता कम होती जा रही है, उसी अनुपात में चुनावी प्रचार सभाओं में भी अपवाद स्वरूप ही श्रोताओं को बांधे रखने की जिम्मेदारी नुक्कड़ नाटकों या लोक गायकों को मिल रही है, उनके मनोरंजन के मुख्य स्रोत विपक्षियों पर किए जाने वाले कटाक्ष या अपने प्रिय वक्ता की वक्तृता ही रह गए हैं। जिस तरह मनोरंजन माध्यम शिष्ट नागर के मुकाबले ‘सड़क छाप’ जैसी संज्ञा के करीब आते जा रहे हैं, उसी तरह यह वक्तृता भी उत्तरोत्तर गिरावट की तरफ है। शायद इस बार भाषणों का स्तर कुछ ज्यादा ही गिरा और इसमें सत्ता और विपक्ष, दोनों ने अपना हिस्सा डाला।
इस बार के चुनाव बड़े ‘खामोश’ हैं, न बहुत चिल्ल-पों और न ही छोटे-बड़े जुलूसों की गहमागहमी। गांवों, कस्बों या शहरों के चायखानों पर सुबह से देर रात तक होने वाली गरमागरम बहसें भी इस बार नदारद हैं। पोस्टरों और दीवार-लेखन से पटी गलियां वीरान सी लग रही हैं। नतीजतन, पश्चिम बंगाल जैसे अपवाद छोड़ दें, तो उत्तेजना से उपजने वाले तनाव और हिंसा भी गायब हैं। शुरुआती चरणों में होने वाले कम मतदान के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है। किसी के पास इस बड़े फर्क का कोई तसल्ली-बख्श जवाब नहीं है। चुनाव विश्लेषकों या सेफोलॉजिस्ट की एक नई पेशेवर पौध पिछले कुछ वर्षों में फली-फूली है, लेकिन वे भी इस पर अटकलें लगाने के अलावा और कुछ भी नहीं कर पा रहे हैं।
इन चुनावों में सोशल मीडिया अपने उरूज पर है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता या एआई की छौंक भी उसमें दिखने लगी है। अभी डीपफेक का अनुपात नगण्य है, पर कोई नहीं कह सकता कि अगले चुनावों तक इसका अनुपात बढ़कर यह किस हद तक पहुंच सकता है। किसी भी  संपादकीय विवेक और सरकारी नियंत्रण से काफी हद तक मुक्त यह माध्यम अपनी शक्ति और सीमा, दोनों दिखा रहा है। चुनावी रण में उतरे महारथियों ने पोस्टर लगाते-फाड़ते, वॉल राइटिंग करते या लाउडस्पीकरों पर चीखते-चिल्लाते वैतनिक कार्यकर्ताओं की फौज की जगह वातानुकूलित कमरों में लैपटॉप के साथ हाईटेक योद्धाओं को तैनात कर दिया है, जो सोशल मीडिया पर मनोवैज्ञानिक युद्ध लड़ रहे हैं और करोड़ों स्मार्टफोन पर दिन-रात व्यस्त भारतीय मतदाता इस जंग के जाने-अनजाने सैनिक बने हुए हैं।
अठारहवीं लोकसभा के चुनावों को देखते हुए मुझे बरबस 1977 के चुनाव याद आ रहे हैं। देश के साथ व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए भी ये बड़े महत्वपूर्ण थे। आपातकाल खत्म हो गया था और उसके बाद के इस पहले चुनाव में एक पुलिस अधिकारी की हैसियत से मेरी पहली ड्यूटी लगने जा रही थी और यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि पूरे देश की तरह मुझे भी खास तरह की सनसनी का एहसास हो रहा था। आपातकाल के तमाम प्रतिबंध हट गए थे और देश को कई अर्थों में दूसरी आजादी मिली थी। जैसे कोई ज्वार फटा हो और कई मौकों पर उच्छृंखलता की सीमा लांघती यह आजादी चुनावों में भी खूब दिखी। जनता आपातकाल की ज्यादतियों का सबक सिखाने सड़कों पर निकली और फलस्वरूप उत्तर प्रदेश की सारी 85 सीटें सत्ता दल हार गया। 
उस चुनाव की कई स्मृतियां हैं और कई सच्चाइयां ऐसी हैं, जो मेरे मस्तिष्क में टकी हैं। एक सच्चाई किसी बडे़ आघात की तरह उद्घाटित हुई। किसी भी राजनीतिक दल के लिए चुनावी शुचिता का कोई अर्थ नहीं था। येन-केन-प्रकारेण सभी चुनाव जीतना चाहते थे और इसके लिए मतदान केंद्रों पर तरह-तरह के हथकंडे आजमाए जा रहे थे। इनमें सबसे लोकप्रिय था बूथ पर अपने विरोधियों को वोट डालने से रोककर अपने समर्थकों से गलत-सही किसी भी तरीके से अधिक से अधिक वोट डलवा लेना। इंदिरा गांधी की कांग्रेस जो कर रही थी, जय प्रकाश नारायण के चेले उससे किसी भी मामले में पीछे नहीं थे। यह देखकर भी प्रथम दृष्टया आघात लगा कि चुनाव संपन्न कराने के लिए जिम्मेदार सरकारी कर्मचारियों में कुछ अपवाद ही थे, जो जोखिम उठाकर भी निष्पक्ष चुनाव कराने की जिद पर अड़ते थे। यह स्थिति उत्तरोत्तर खराब ही होती गई और हमारी भाषा को बूथ लुटेरे या ‘बूथ कैप्चरिंग’ जैसे शब्द मिले। भला हो टीएन शेषन का, जिन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद की गरिमा बढ़ाई और भारतीय चुनावी प्रक्रिया को बहुत हद तक विश्वसनीय बनाया, पर यह परिवर्तन सांस्थानिक न होकर व्यक्ति केंद्रित ही ज्यादा रहा। आज किसी को बताने की जरूरत नहीं रही कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग की साख हमारे मन में बहुत भरोसा नहीं जगा पाती है।
कई मनोरंजक संस्मरणों में एक ऐसे गांव का है, जहां के भोले निवासियों ने एक चुनाव में मतदान के बाद मुझे बताया कि उन्होंने उस उम्मीदवार को इकतरफा थोक में वोट दिए हैं, जो पिछले कई दिनों से उन्हें मुरगे और शराब की दावत दे रहा था। इत्तिफाक से दस साल बाद उसी गांव के मतदाताओं से एक बार फिर मुलाकात हो गई। इस बार वे हंस-हंसकर बता रहे थे कि उस उम्मीदवार ने शराब और मुरगे पर खर्च तो पहले की ही तरह किया था, पर उन्होंने वोट उसे नहीं दिया। अब वे ज्यादा समझदार हो गए थे।
मेरी अपनी समझ है कि भारतीय समाज कभी उन अर्थों में लोकतांत्रिक नहीं रहा, जिसकी पश्चिम से आयातित एक बालिग व्यक्ति एक मत वाला लोकतंत्र अपेक्षा करता है। वर्णों और वर्गों में बुरी तरह से विभक्त यह समाज इस लोकतंत्र से तालमेल बिठाने का प्रयास करता दिखता है और इसी का परिणाम है कि कम शिक्षित भारतीय मतदाता अपने प्रौढ़ फैसलों से कई बार दुनिया भर को चकित करता रहता है। मुझे लगता है, लोग इस बार भी निराश नहीं करेंगे।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)