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चंदा और चुनाव सुधार की ईमानदार पहल

इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले  के बाद चुनाव सुधार और चंदे पर बहस फिर तेज हो गई है। लोकसभा में इस पर 30 जुलाई 2003 को गर्मागर्म बहस हुई थी,  पूछे गए सवाल और उन्हें हल करने की कोशिशें अब...

चंदा और चुनाव सुधार की ईमानदार पहल
Monika Minalअरुण जेटली, तत्कालीन केंद्रीय मंत्री Fri, 16 Feb 2024 09:01 PM
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महोदय, यह संशोधन विधेयक, जिसका आशय लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, आयकर अधिनियम और कंपनी अधिनियम के कुछ प्रावधानों में संशोधन करना है, लाने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि भारत की लोकतांत्रिक राजनीति तथा विभिन्न राजनीतिक दलों, दोनों में यह आम राय बनी कि स्वतंत्रता के 56 वर्षों बाद भी हम ऐसा पारदर्शी तंत्र विकसित नहीं कर पाए हैं, जिसके द्वारा देश में राजनीति, राजनीतिक गतिविधियों तथा राजनीतिक दलों का वित्तपोषण किया जा सके। स्वर्गीय इंद्रजीत गुप्ता की अध्यक्षता में समिति ने वर्ष 1999 में प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था, जिसमें राज्य द्वारा चुनावों का वित्तपोषण किए जाने के बारे में कई मूल्यवान सुझाव दिए गए थे।
इस बात पर बल दिया गया था कि वित्तपोषण जुटाई गई समग्र निधि के आधार पर किया जाएगा और समग्र निधि में केंद्र सरकार और राज्य सरकार द्वारा अंशदान किया जाएगा। ...सरकार ने इस प्रश्न पर विचार किया है कि...भारतीय राजनीति के वित्तपोषण के लिए एक पारदर्शी तंत्र कैसे बनाया तथा विकसित किया जाए।... 
महोदय, इस विधेयक की विषय-वस्तु ऐसी है कि कोई भी व्यक्ति, जिसमें व्यक्ति विशेष ही नहीं, साझेदारी, संयुक्त हिंदू परिवार भी शामिल हैं तथा सरकारी कंपनी को छोड़कर कोई भी कंपनी मान्यताप्राप्त राजनीतिक दल को अंशदान देने के पात्र हैं। ...अंशदान की गई धनराशि का एक उपयुक्त भाग या स्वीकार्य व्यय दानकर्ता को आयकर अधिनियम के अंतर्गत कर छूट के लिए उपलब्ध होगा। इसका आशय लोगों को चेक द्वारा राजनीतिक दलों को दान देने के लिए प्रेरित करना है। ...राजनीतिक दलों पर भी अपने खातों को सख्ती से कायम रखने के लिए अपने खातों की लेखा परीक्षा करवाने का दायित्व होगा। उनसे वित्तीय वर्ष के दौरान 20,000 रुपये से अधिक दान देने वाले सभी दानकर्ताओं की एक सूची बनाने की आशा की जाएगी। राजनीतिक दल के प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित समस्त खातों का विवरण प्रतिवर्ष चुनाव आयोग के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। अत: इस विधेयक का दोहरा उद्देश्य है। वर्तमान प्रणाली को बदलना है, जहां बहुत-से लोगों का मानना है कि राजनीतिक दलों को जुटाए गए काले धन में से अंशदान दिया जाता है।
...महोदय, मैं माननीय सदस्यों को यह सूचित करना चाहता हूं कि वे इस बारे में गंभीरतापूर्वक आत्मविश्लेषण करें कि हमारी राजनीतिक वित्तपोषण की वर्तमान प्रणाली वस्तुत: क्या है। राजनीतिक दल चुनाव लड़ रहे हैं, उनके कार्यालय हैं, उनके नेता विमानों और हेलीकॉप्टरों का उपयोग कर रहे हैं और इन सब कार्यों में धन खर्च होता है। राजनीतिक दल केवल लोगों की इच्छाशक्ति से ही नहीं चल रहे हैं। उन्हें बने रहने के लिए भौतिक साधनों की भी जरूरत है। यदि हम ईमानदारी से अपना आत्मविश्लेषण करें कि ये भौतिक साधन कहां से आ रहे हैं, तो स्पष्ट होगा कि ये साधन प्रभावी ढंग से उन स्रोतों से आ रहे हैं, जहां साधन वास्तव में उपलब्ध हैं।...
एक आम अवधारणा यह भी है कि राजनीति में परोक्ष रूप से काफी धनराशि का प्रवेश होता है। यह विधेयक उस रोग के एक हिस्से को ठीक करने का प्रयास है। जब हम व्यापक सुधार की बात करते हैं, तो इस संबंध में मैं ईमानदारीपूर्वक यह स्वीकार करता हूं कि कोई ऐसा कानून नहीं है, जो व्यापक निर्वाचन सुधार विधेयक बन सके। ...यह आगे बढ़ने की दिशा में एक छोटा सा कदम। ...रातों रात इसमें परिवर्तन नहीं होंगे। परिवर्तन तभी होंगे, जब धन चंदा देने वाले, चाहे वे व्यक्ति हों अथवा अन्य और चंदा लेने वाले भी यह अनुभव करेंगे कि संभवत: यह एक रीति है, जो वैधता ही नहीं जोड़ेगी, अपितु राजनीतिक वित्त की पूर्ण प्रक्रिया के प्रति विश्वसनीयता भी जोड़ेगी। ...क्या सरकार द्वारा लिए गए किसी अधिकारिक निर्णय और दानकर्ता के बीच कोई सांठगांठ है। वास्तव में, जब तक यह अदृश्य रहता है, सांठगांठ का कभी पता नहीं चलेगा। उस सांठगांठ की जानकारी जहां तक जनता का संबंध है, कम से कम कुछ और पारदर्शिता व जानकारी बढ़ाएगी कि क्या चंदा हरजाने के लिए दिया जा रहा है अथवा यह सामान्य चंदे का एक हिस्सा है...। जैसे मैंने इशारा किया है कि चुनाव लोकतंत्र का एक भाग है। राजनीतिक दल संसदीय लोकतंत्र का एक अन्तर्निहित भाग है। राजनीति का निधीयन गुपचुप तरीके से नहीं किया जा सकता है। यह प्रक्रिया ईमानदारी से और पारदर्शिता से होनी चाहिए।
    (लोकसभा में दिए गए उद्बोधन से) 

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