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संदेशखाली से आया साफ संदेश

विवादों में आया यह गांव भले टापू पर बसा हो, लेकिन किसी किले से कम नहीं नजर आ रहा। ममता सरकार भरपायी में लग गई है, पर चुनाव के लिए विपक्ष को मुद्दा मिल गया है। संदेशखाली। पश्चिम बंगाल के...

संदेशखाली से आया साफ संदेश
Monika Minalप्रभाकर मणि त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकारThu, 15 Feb 2024 10:52 PM
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संदेशखाली। पश्चिम बंगाल के उत्तर 24-परगना जिले में बांग्लादेश की सीमा से सटा एक अनाम-सा गांव। कोलकाता से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव तक पहुंचने के लिए मोटर चालित देशी नाव से कालिंदी नदी पार करनी होती है। हाल तक गुमनाम रहे इस गांव से महिलाओं की बगावत के जरिये जो संदेश उभरकर सामने आया है, उसने लोकसभा चुनाव से पहले सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ा दी हैं। विपक्ष ने इस मुद्दे को पूरी तरह से लपक लिया है। 
बीते सप्ताह संदेशखाली की महिलाओं ने बंगाल में सत्तारूढ़ पार्टी के तीन नेताओं के खिलाफ अत्याचार और यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे, उसके बाद हुई हिंसा और आगजनी के बाद धारा 144 और भारी तादाद में तैनात पुलिस बल के चलते इस इलाके में जमीनी स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है, पर राजनीति असामान्य होती जा रही है। इस घटना की गूंज राज्य की राजधानी कोलकाता ही नहीं, बल्कि देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच गई है।
महिलाओं ने शाहजहां शेख और उसके दो शागिर्दों पर स्थानीय लोगों की जमीन जबरन हड़पने और महिलाओं के साथ अत्याचार व बलात्कार के जो गंभीर आरोप लगाए हैं, उसने लोकसभा चुनाव से पहले राज्य के राजनीतिक माहौल को अचानक बेहद गरमा दिया है। दरअसल, वर्ष 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह पहला मौका है, जब उसके नेताओं के खिलाफ गंभीर आरोप लगाते हुए किसी गांव या इलाके के लोगों ने विद्रोह का ऐसा बिगुल बजाया है। हालांकि, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ ही पुलिस ने भी बलात्कार के आरोपों को निराधार बताते हुए इसे भूमि पट्टे के एवज में दो साल से पैसों का भुगतान नहीं होने से उपजी नाराजगी करार दिया है। राज्य सरकार की पूरी कोशिश है कि उपजा विवाद नियंत्रण में रहे, पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने संदेशखाली की घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार से 20 फरवरी तक रिपोर्ट मांगी है। इस मामले की सुनवाई उसी दिन अदालत में होगी। उस दिन अदालत दो अलग-अलग मामलों पर सुनवाई करेगी। इनमें से पहला मामला गांव वालों की जमीन पर जबरन कब्जे से संबंधित है, तो दूसरा मामला, महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संबंधित है।
महिलाओं की बगावत से शुरुआती दौर में असमंजस में पड़ी तृणमूल कांग्रेस ने हालात को संभालने की कवायद के तहत पार्टी के एक नेता उत्तम सर्दार को पुलिस के हाथों गिरफ्तार करा दिया है और उसे छह साल के लिए पार्टी से निलंबित भी कर दिया है। राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए बंगाल में सत्तारूढ़ पार्टी आंतरिक रूप से बहुत सक्रिय है, पर विपक्ष की ओर से लगातार बढ़ते दबाव के चलते अब पार्टी जवाबी हमले पर उतरते हुए ऐसे आरोपों को बंगाल विरोधी प्रचार बता रही है। तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि इलाके में महिलाओं के हवाले बलात्कार और उत्पीड़न के जिन आरोपों की बात कही जा रही है, वे निराधार हैं। उसका कहना है कि पुलिस की विशेष टीम और राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत करने वाली किसी भी महिला ने ऐसे आरोप नहीं लगाए हैं।
दरअसल, यह पूरा मामला बीते महीने राशन घोटाले के सिलसिले में तृणमूल कांग्रेस नेता शाहजहां शेख के घर ईडी के छापे से शुरू हुआ था। तब कथित पार्टी समर्थकों के हमले में ईडी के तीन अधिकारी घायल हो गए थे। शाहजहां उसी दिन से फरार है। उसके जिन दो शागिर्दों पर यौन उत्पीड़न और जमीन पर जबरन कब्जे के आरोप लगे हैं, उनमें से एक उत्तम सर्दार तो शिकंजे में आ गया है, लेकिन दूसरा आरोपी शिव प्रसाद हाजरा भूमिगत हो गया, इससे भी विरोधियों को आरोप लगाने का मौका मिला।
तमाम विपक्षी दलों ने इसके लिए सत्तारूढ़ तृणमूल को कठघरे में खड़ा करते हुए संदेशखाली अभियान शुरू कर दिया है। गौर करने की बात है कि अनेक नेता संदेशखाली जाने की कोशिश में हैं, लेकिन किसी को भी इलाके में नहीं जाने दिया गया है। पुलिस ने बुधवार को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सुकांत मजूमदार के नेतृत्व में संदेशखाली जाने की कोशिश करने वाले नेताओं को बहुत पहले ही रोक दिया था। वहां पार्टी के कार्यकर्ताओं और पुलिसकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की के दौरान बेहोश होने के बाद मजूमदार को कोलकाता के एक निजी अस्पताल में इलाज के लिए दाखिल कराना पड़ा।
बंगाल में भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर काफी आक्रामक हो गई है। कोलकाता से दिल्ली तक उसके तमाम नेता इस मुद्दे पर राज्य सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को घेरने में जुटे हैं। विधानसभा में इस मुद्दे पर हंगामे और वॉकआउट के बाद विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी समेत छह विधायकों को निलंबित किया जा चुका है। सीपीएम और कांग्रेस भी इस मामले में पीछे नहीं हैं। इलाके में हिंसा उकसाने के आरोप में माकपा के पूर्व विधायक निरापद सरकार को भी गिरफ्तार किया गया है। माकपा के प्रदेश सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा है कि संदेशखाली की घटना से साफ है कि गांव की महिलाएं अब तृणमूल कांग्रेस के समर्थन वाले गुंडों के अत्याचारों के खिलाफ खुलकर सामने आ गई हैं, यह तो अभी शुरुआत है। भाजपा समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता मौके पर जाने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन गांव तक पहुंचने के रास्ते में ऐसी जबरदस्त किलेबंदी की गई है कि वहां कोई परिंदा भी पर नहीं मार पा रहा। यह इलाका भले टापू पर बसा हो, फिलहाल यह किसी किले से कम नहीं नजर आ रहा है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सत्तारूढ़ पार्टी इस बगावत का पूर्वानुमान नहीं लगा सकी। इसीलिए शुरुआत के तीन-चार दिनों तक उसने चुप्पी साधे रखी।  अब उसने इस घटना से हुए नुकसान की भरपायी की कवायद शुरू कर दी है, लेकिन संदेशखाली ने लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी दलों को एक ठोस मुद्दा दे दिया है। सत्तारूढ़ तृणमूल को डर है कि विपक्षी दलों की मुहिम के कारण अगर संदेशखाली का संदेश राज्य के दूसरे इलाकों तक फैल गया, तो आने वाले दिनों में उसके लिए यह एक बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है। संदेशखाली से एक बड़ा संदेश तो तमाम पार्टियों के कार्यकर्ताओं के लिए भी है, राजनीति सेवा का माध्यम है, शोषण का नहीं। लोगों की भी सहने की एक सीमा होती है, जिसका ध्यान सियासी दलों को रखना चाहिए।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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