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दक्षिण में भी पूरा दम लगाती भाजपा

आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को दक्षिण भारत की सियासी पिच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर ज्यादा भरोसा है। पार्टी पांचों दक्षिणी राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए अलग-अलग...

दक्षिण में भी पूरा दम लगाती भाजपा
Monika Minalएस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकारMon, 26 Feb 2024 11:02 PM
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आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को दक्षिण भारत की सियासी पिच पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर ज्यादा भरोसा है। पार्टी पांचों दक्षिणी राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लिए अलग-अलग रणनीति पर काम कर रही है। यहां दांव पर 130 सीटें हैं, जिनमें से भाजपा ने 2019 के चुनाव में 30 सीटों पर बाजी मारी थी। इनमें से कर्नाटक में उसे सर्वाधिक 51 प्रतिशत मत हासिल हुए थे, जबकि तमिलनाडु में सबसे कम 3.71 प्रतिशत। पुडुचेरी में उसने किसी को मैदान में नहीं उतारा था। पांचों दक्षिणी राज्यों में भाजपा का मत-प्रतिशत करीब 20 था, लेकिन पुडुचेरी को मिलाने के बाद यह घटकर 16.5 प्रतिशत हो जाता है। इस साल पार्टी ने देश भर में 50 प्रतिशत मत हासिल करने का लक्ष्य बनाया है, जिसके लिए वह उत्तर ही नहीं, दक्षिण भारत में भी खूब मेहनत कर रही है।
इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दक्षिणी राज्यों में लगातार दौरे कर रहे हैं और विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन कर रहे हैं। अपने मंत्रियों को भी लगातार इन राज्यों में भेज रहे हैं और उनसे लोगों को केंद्र सरकार की उपलब्धियां बताने को कह रहे हैं। पार्टी ने उचित ही सबसे ज्यादा ध्यान कर्नाटक पर लगाया है, जहां से पिछले आम चुनाव में उसे 26 सीटें मिली थीं। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की दुखद पारी के बाद पार्टी ने खुद को पुनर्गठित करने में कुछ वक्त लिया और अंत में हाशिये पर धकेल दिए गए बीएस येदियुरप्पा पर फिर से भरोसा करना उचित समझा। उनको न सिर्फ फिर से जिम्मेदारी दी गई है, बल्कि उनके बेटे बी वाई विजयेंद्र को राज्य भाजपा प्रमुख बनाया गया है। भाजपा को लगता है कि इससे लिंगायतों के वोट उसे वापस मिल सकते हैं, जो एक दबदबे वाली जाति है।
एक अन्य रणनीतिक कदम के तहत यह पार्टी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले जनता दल (एस) के साथ गठबंधन करने जा रही है और उसे पांच सीटों की पेशकश की है। पार्टी का मानना है कि इससे मैसूर क्षेत्र में वोक्कालिगा के कुछ वोट उसकी झोली में आ सकते हैं। यह स्थिति 2019 के चुनाव से अलग है, जब पार्टी ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था और जद (एस) व कांगे्रस साथ थे। 
पिछले विधानसभा चुनाव में हिजाब, हलाला और लव जेहाद जैसे मुद्दों को उठाने वाली भाजपा इस बार हिंदुत्व पर कुछ नरम नजर आ रही है। उसके बजाय संघ परिवार के लोग हनुमान ध्वज को लेकर अपनी सक्रियता दिखा रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया आर्थिक संसाधनों के जायज बंटवारे का मुद्दा उठाकर केंद्र सरकार पर पक्षपात करने का आरोप लगा रहे हैं। वैसे, भाजपा के मजबूत राष्ट्रवाद के विरुद्ध उप-राष्ट्रवाद (किसी जाति या स्थानीय आकांक्षा) को आगे बढ़ाने का प्रयास केरल और तमिलनाडु जैसे पड़ोसी राज्यों के मुख्यमंत्री भी कर रहे हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी तो इस तरह के एजेंडे को कहीं अधिक सूक्ष्म रूप से आगे बढ़ा रहे हैं।
केरल में भाजपा 2019 में दोहरे अंकों में मत-प्रतिशत पाने में सफल रही थी, लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिल सकी थी। इस बार पार्टी अपना खाता खोलने के लिए कुछ सीटों पर ही ध्यान लगा रही है। पार्टी का मानना है कि पूरे प्रदेश में मत प्रतिशत बढ़ाने के बजाय कुछ खास निर्वाचन क्षेत्रों पर प्रयास करना उसके लिए ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। इस बार वह तिरुवनंतपुरम, त्रिशूर और पथानामथिट्टा जैसी सीटों पर काम कर रही है, जहां वह या तो दूसरे स्थान पर थी या कांग्रेस व माकपा के बाद तीसरे पायदान पर। मोदी के करिश्मे के अलावा, अभिनेता सुरेश गोपी को टिकट देकर पार्टी यहां ‘स्टार पावर’ पर भी भरोसा कर रही है, जो त्रिशूर विधानसभा चुनाव में भाजपा के मत प्रतिशत को 31 तक बढ़ाने में कामयाब रहे हैं।
भाजपा की तरह माकपा भी थॉमस इसाक और शैलजा टीचर जैसी प्रभावी शख्सियतों को मैदान में उतारकर अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश कर रही है। मगर ऐसा लगता है कि यह पहल काम नहीं कर रही, क्योंकि उनमें से कई ने चुनाव लड़ने में अनिच्छा दिखाई है। रही बात कांग्रेस की, तो वह राहुल गांधी की छवि पर भरोसा कर रही है, क्योंकि उनके फिर से वायनाड से चुनाव लड़ने की संभावना है। केरल में मतदाता लोकसभा और राज्य विधानसभा के चुनावों में अलग-अलग पैमाने पर प्रतिनिधि चुनते हैं। राज्य में जहां उनका भरोसा पी विजयन पर है, तो लोकसभा के लिए वह राहुल गांधी के साथ जा सकते हैं, फिर चाहे वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार न भी हों। 
तेलंगाना में भाजपा को 2019 में चार सीटें मिली थीं और इस बार वह इसे बढ़ाने को उत्सुक है। मगर विधानसभा चुनावों में बीआरएस के साथ अंदरखाने तालमेल का उसका फैसला कोई काम नहीं कर सका, इसलिए इस बार वह दुविधा में दिख रही है। 2019 में कांग्रेस वहां खस्ताहाल थी, पर इस बार वह एक मजबूत ताकत है। इसीलिए, तेलंगाना का चुनावी दंगल काफी दिलचस्प होने वाला है। रेवंत रेड्डी न सिर्फ बीआरएस नेता चंद्रशेखर राव के प्रभाव को खत्म करने की कोशिश में जुटे हैं, बल्कि अपने काडरों को भी काफी उत्साहित कर रहे हैं, जो अब भाजपा से मुकाबले के लिए बेहतर तरीके से तैयार हैं। 
आंध्र प्रदेश भी इन सबसे अलग नहीं है। यहां मुख्यमंत्री वाईएस जगन मोहन रेड्डी की बहन शर्मिला रेड्डी की अचानक आमद के बाद राजनीति में हलचल मच गई है। अपनी पार्टी का विलय करने और राज्य कांग्रेस प्रमुख बनने के बाद उन्होंने कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया है और अपने भाई को हटाने के अपने दुस्साहसिक प्रयासों से हर रोज सुर्खियां बटोर रही हैं। यहां 2019 में भाजपा का मत-प्रतिशत था 11.70, लेकिन उसे कोई सीट नहीं मिली थी। छह महीने पहले उसके लिए धर्मसंकट तब पैदा हो गया था, जब टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस, दोनों पार्टियां उसके साथ गठबंधन बनाने की कोशिश कर रही थीं।
तमिलनाडु में भाजपा प्रमुख अन्नामलाई ने पार्टी कार्यकर्ताओं में जबर्दस्त जोश भर दिया है, उम्मीद है कि यहां पार्टी का मत प्रतिशत 3.71 की तुलना में दोहरे अंक में पहुंच सकता है। मगर द्रमुक गठबंधन यहां मजबूत स्थिति में दिख रहा है, क्योंकिअन्नाद्रमुक व भाजपा का साथ टूट चुका है, इसलिए यहां विपक्ष बिखरा हुआ है। कुल मिलाकर, जहां-जहां भारतीय जनता पार्टी को कमी नजर आएगी, वहां-वहां प्रधानमंत्री मोदी को ही बतौर ‘ब्रह्मास्त्र’ पेश किया जाएगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं) 

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