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सूखे की आशंकाएं, बाढ़ की आपदा

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार

मूसलाधार बारिश और बाढ़ से तबाह केरल-कर्नाटक से अनेक मार्मिक कहानियां सुनने को मिल रही हैं। एक कहानी बूढ़ी ईसाई महिला की है, जिन्होंने पास के मंदिर में शरण लेना मुनासिब समझा, क्योंकि वह जगह उन्हें सबसे सुरक्षित लगी। एक अन्य कहानी केरल के मलप्पुरम जिले के तीन नौजवानों की है, जो बाढ़़ में फंसे लोगों की जान बचाने में जुटे थे, मगर एक भू-स्खलन में उन तीनों की जान चली गई। बलिदान की इस तरह की कहानियां अक्सर चंद सुर्खियों में दम तोड़ देती हैं। एक पशुपालक ने तो अपने 50 मवेशियों की जान बचाने और उन्हें भूखा न छोड़ने की खातिर उनके साथ ही रुकने का जोखिम मोल लिया, हालांकि अपनी जान बचाने के लिए वह उन्हें उनके हाल पर छोड़ भाग सकता था। कर्नाटक के बेलगावी राहत शिविर ने तो अपने यहां पनाह लिए लोगों की इतनी अच्छी देखभाल की कि पानी उतरने के बाद भी लोग वहां से अपने घर जाने को तैयार न थे।

ये वो चंद कहानियां हैं, जो तस्दीक करती हैं कि एक-दूसरे के प्रति गहरे संदेहों से भरे होने और आज के ध्रुवीकृत नफरती माहौल के बावजूद मानवीय मूल्य हमारे भीतर बचे हुए हैं। कोई विद्वेषी से विद्वेषी भी शायद इन कहानियों को नजरंदाज नहीं कर सकता। कर्नाटक में भी स्थानीय विधायक अपने-अपने क्षेत्रों में राहत और बचाव के कार्यों में मदद के लिए उतर आए, भले ही इसकी पहल उनकी प्रतिद्वंद्वी पार्टी के लोगों ने ही क्यों न की हो।

इसके अलावा वहां जिंदगी अपने ढर्रे पर ही आगे बढ़ती दिखी है। राजनेताओं ने नुकसान के आकलन के लिए हवाई दौरे किए और उन इलाकों को नजरंदाज किया, जहां उनकी विरोधी सरकारें हैं। फिर उन्होंने वही पारंपरिक बयान दिए और बचाव व राहत में मदद के वादे किए। मुख्यमंत्रियों ने कुदरती आपदा के आगे अपनी बेबसी का राग अलापा, कभी-कभी उन्होंने केेंद्र सरकार पर उंगली उठाई और अधिक राहत राशि की मांग की। इस समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए क्या उन्हें जमीन पर एक साथ नहीं बैठना चाहिए, ताकि इसका ठोस हल निकल सके? क्या कुदरती आपदाओं पर राष्ट्रीय बैठक की कोई व्यवस्था है, जिसमें सभी सियासी पार्टियां सक्रिय रूप से भाग लें?

केरल में पिछले साल अगस्त में आई बाढ़ ने पूरे प्रदेश को तबाह कर दिया था। 483 लोग उसकी भेंट चढ़ गए थे, जबकि 140 लापता हो गए। इस साल भी अगस्त महीने में ही आई इस आपदा में अब तक 104 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि अनगिनत लापता हैं। इस साल केरल के सिर्फ उत्तरी और मध्य हिस्से प्रभावित हुए हैं। पिछले साल अचानक मूसलाधार बारिश के कारण उमड़ते बांधों द्वारा पानी छोड़े जाने को बाढ़ का मुख्य कारण बताया गया था। तब यह भी कहा गया था कि 100 वर्षों में एक बार ऐसा होता है। इस बार तो दो दिनों के भीतर ही 80 भू-स्खलनों ने केरल को हिलाकर रख दिया। मल्लपुरम जिले में हुए भू-स्खलन में आधा गांव दफ्न हो गया। यह पश्चिमी घाट का ही एक हिस्सा है। करीब 45 परिवारों के इसमें मारे जाने का अंदेशा है। 50 फीट से भी ऊंचे मलबे में दबे लोगों की तलाश में प्रशासन में जुटा हुआ है।

इसके पड़ोसी कर्नाटक को तो दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। चंद हफ्ते पहले तक इसके 80 फीसदी जिले भीषण सूखे के शिकार थे। यहां तक कि स्कूलों को लंबी अवधि के लिए बंद करना पड़ा था। लोगों की प्यास बुझाने के लिए बड़े स्तर पर टैंकरों की सेवा ली जा रही थी। राज्य के पश्चिमोत्तर और उत्तरी भाग को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका था। लेकिन कर्नाटक सरकार सूखे की वजह से हुए नुकसान का आकलन कर पाती कि दूसरे इलाकों में भारी बारिश शुरू हो गई। अब केंद्रीय टीम सूखे और बाढ़, दोनों के नुकसान का आकलन करने में जुटी है। लगभग 70 लोग अब तक यहां बाढ़ की भेंट चढ़ चुके हैं।

दूसरी ओर, तमिलनाडु में जल संकट तो इतना गंभीर हो चला था कि निजी दफ्तर बंद करने पडे़ और कर्मचारियों को घर से ही काम करने की इजाजत देनी पड़ी थी, यहां तक कि रेस्टोरेंट्स ने दोपहर का भोजन परोसना बंद कर दिया था, क्योंकि बर्तनों को साफ करने में ज्यादा पानी खर्च होता है। स्थानीय प्रशासन ने स्कूलों-कॉलेजों में ऐसे शौचालयों का विकल्प तलाशना शुरू कर दिया, जिनमें पानी का न के बराबर इस्तेमाल हो सके। बावजूद इसके तमिलनाडु सरकार अपनी आंखें मूंदे बैठी रही और यही दावा किया कि राज्य में ऐसा कोई जल संकट नहीं है।

किसी भी कुदरती आपदा में सबसे ज्यादा नुकसान हाशिए के लोगों को उठाना पड़ता है, क्योंकि उन्हें अपनी दैनिक जरूरतों की पूर्ति के लिए अपनी जगह छोड़नी पड़ती है। ऐसे लोग पिछले साल के नुकसान का मुआवजा भी नहीं ले पाते। दक्षिणी राज्यों में भी सरकारी अधिकारी खाली घरों के दरवाजे पीट लौट गए थे। अब वे फिर नए संकट की गिरफ्त में हैं। जलवायु परिवर्तन और इंसानी ज्यादतियों को सूखे और बाढ़ की मुख्य वजह माना जाता है, और पश्चिमी घाट की संवेदनशील पारिस्थितिकी से जुड़ा विस्तृत अध्ययन हमारे पास पहले से मौजूद है। माधव गाडगिल कमिटी ने अपनी 2011 की रिपोर्ट में इस क्षेत्र में भू-स्खलन और तबाही के कारणों के बारे में विस्तार से कहा है। लेकिन राजनीतिक वर्ग ने उसकी सिफारिशों को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया। एक वन-अधिकारी के मुताबिक, कोई भी यदि राज्य में ग्रेनाइट और अन्य खनन गतिविधियों की सूची तैयार करे, तो उसे आसानी से मालूम हो जाएगा कि ज्यादातर भू-स्खलन इनके आस-पास ही हुए हैं।

वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के कारण पारिस्थितिकीय त्रासदी पैदा हो रही है। यह  सबको पता है कि पश्चिमी घाट की पारिस्थितिकी बेहद नाजुक है और भारत के मेट्रोलॉजिक सिस्टम में इसकी अहम भूमिका है। भारत का जून से सितंबर तक का मुख्य मानसून अपनी यात्रा केरल से ही शुरू करता है। जैसे-जैसे इन पर्वतों से गुजरता है, वह मजबूत होता जाता है। वैसे, दक्षिण ही नहीं, उत्तर भारत के भी कई राज्य इस समय भयंकर बाढ़ की त्रासदी झेल रहे हैं। इसलिए बेहद जरूरी है कि नीति-निर्माता इस समस्या के हल के लिए फौरन अपनी सक्रियता दिखाएं। जलवायु परिवर्तन की अनेदखी अब और नहीं की जा सकती।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column August 20