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दो दोस्तों का यूं चले जाना

NDA Vice Presidential Candidate M Venkaiah Naidu

महज दस दिनों के भीतर दो बेहतरीन दोस्त एस जयपाल रेड्डी और सुषमा स्वराज का निधन मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है। ये दोनों मेरे सगे भाई-बहन की तरह थे। जयपाल बड़े भाई की तरह और सुषमा छोटी बहन के समान। दोनों आज के समय के कुछ बेहतरीन सांसदों, योग्य प्रशासकों और कुशल वक्ताओं में से थे। दोनों में कई समानताएं भी थीं। समानता इस लिहाज से कि वे दोनों योग्य थे, उन्होंने अपनी-अपनी अक्षमता से लड़ाई लड़ी और सफलतापूर्वक लंबा सार्वजनिक जीवन जिया।

पहले बात अक्षमता की। जयपाल पोलियो के शिकार थे, लेकिन उन्होंने इसे कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया। अपने शब्दों, कर्मों और उपलब्धियों से उन्होंने ‘दिव्यांगता’ के वास्तविक अर्थों को साकार किया और असाधारण कर्म किए। मैं उनसे पूछा करता था कि यह जताने के लिए कि आप शारीरिक कमी से मजबूर नहीं हैं, क्या आपने कोई सजग प्रयास किया? सवाल को खारिज करते हुए वह कहा करते कि हमारा जज्बा ही असलियत में मायने रखता है, शारीरिक अक्षमता हमारे साहस को तोड़ नहीं सकती। वाकई, अदम्य साहस की ऐसी ही गाथा उन्होंने अपने जीवन में लिखी।

जयपाल एक महान वक्ता और बौद्धिक इंसान थे। वह हर मुद्दे का विश्लेषण करने की क्षमता रखते थे। अपनी शानदार समझ और बुद्धिमानी के कारण वह प्रभावशाली प्रवक्ता थे। अंग्रेजी और तेलुगु, दोनों भाषाओं में उन्हें महारत हासिल थी। वास्तव में, आंध्र प्रदेश विधानसभा में हम दोनों एक-दूसरे के अगल-बगल में बैठा करते थे और एक-दूसरे के साथ नोट्स बांटा करते। सत्तारूढ़ दल के सदस्य हमें तिरुपति वेंकट कवुलु कहा करते, जो तेलुगु के दो महान कवि थे और मिलकर अपनी रचनाएं लिखा करते थे।

रेड्डी ने जहां शारीरिक अक्षमता को हराया, वहीं सुषमा स्वराज ने सामाजिक अक्षमता को परास्त किया। लैंगिक भेदभाव आज भी हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में एक बड़ा मसला है, जिससे महिलाओं को कई मुश्किलों से जूझना पड़ता है। मगर सुषमा स्वराज ने इसे नकार दिया। जयपाल की तरह उन्होंने भी अपने शब्दों, कर्मों और उपलब्धियों से दुर्जेय सामाजिक बाधाओं को पार किया। हरियाणा की रूढ़िवादी सामाजिक-व्यवस्था में जन्म लेने वालीं सुषमा का राजनीतिक सफर राज्य सरकार में सबसे कम उम्र की कैबिनेट मंत्री बनने से शुरू हुआ और अपना कार्यकाल पूरा करने वाली देश की पहली विदेश मंत्री तक जारी रहा। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है।

दोनों में अंतर की बात करें, तो जयपाल और सुषमा, दोनों का झुकाव अलग-अलग वैचारिक धाराओं की तरफ था। हालांकि एक बार दोनों एक साथ (कुछ दिनों के लिए ही सही) आए भी, जब आपातकाल के बाद वे जनता पार्टी में थे। फिर भी, भारत को समर्थ बनाने के लिए दोनों जीवन भर प्रतिबद्ध रहे।

जयपाल और मैं संयुक्त आंध्र प्रदेश की राजनीति में काफी समय तक साथ रहे। जनता के महत्व के मुद्दे हम मुखरता से राज्य विधानसभा में उठाते और राज्य सरकार की चूक और काम-काज का बखूबी विश्लेषण करते। विधानसभा में एक कार्यकाल पहले आने की वजह से जयपाल मुझसे सीनियर थे, पर राजनीति के मेरे शुरुआती वर्षों में और 1978 में जब मैं पहली बार आंध्र प्रदेश विधानसभा में पहुंचा, तब वह मेरे मित्रवत मार्गदर्शक रहे। हम हर दिन एक-दूसरे के घरों पर नाश्ता के लिए मिलते और विधानसभा के उस दिन के एजेंडे को तय करने के लिए आपस में सलाह-मशविरा करते।

बेशक जयपाल का जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ था, लेकिन वह समानता का और अधिकारपरक आधुनिक नजरिया रखते थे। इसी ने उनके राजनीतिक जीवन को भी गढ़ा। उन्होंने कभी बुनियादी नैतिक और राजनीतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया और न ही अपनी पार्टी के नेतृत्व या प्रतिष्ठान के खिलाफ आवाज उठाने से वह हिचके। हम दोनों अक्सर देश की राजनीति में आए बदलाव और क्रमिक विकास के बारे में चर्चा किया करते थे।

सुषमा तो राजनीति में मुझसे बहुत करीब थीं। हमारा अपनापन हर बीतते दिन के साथ उनके निधन तक मजबूत होता गया। जब मैं सुषमा को अंतिम सम्मान देने के लिए गया था, तो उनकी बेटी बांसुरी फूट-फूटकर रोने लगी। मां को याद करके बताया कि वह कहा करती थीं, ‘मैं जब भी वैंकया से मिलती हूं, तो बेफिक्र हो जाती हूं, क्योंकि कोई बहन जैसे अपने बड़े भाई को सारी समस्याएं बताकर चिंतामुक्त हो जाती है, उसी तरह मैं भी उनसे मिलकर अपनी मुश्किलों से बाहर निकल आती हूं’। ओह! क्रूर किस्मत ने एक स्नेही बहन मुझसे छीन लिया।

सुषमा स्वराज को भारत की जनता ने बहुत प्यार दिया, क्योंकि उन्हें भारतीय संस्कृति के प्रतीक और हमारे देश के बुनियादी मूल्यों के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता था। उनकी पोशाक, उनका व्यवहार, शब्दों का चयन, अभिव्यक्ति की शैली, उनकी गर्मजोशी और स्नेह, विनम्रता, बड़े-बुजुर्गों के प्रति उनका सम्मान, तार्किक अभिव्यक्ति की क्षमता, दूसरों को चोट पहुंचाए बिना बोलने की अद्भुत कला आदि ने उन्हें आधुनिक समय के सबसे प्रशंसनीय राजनेताओं में शुमार किया। वह एक ऐसी नेता थीं, जिन्हें न सिर्फ दलगत राजनीति से ऊपर सभी नेताओं से सम्मान मिला, बल्कि उनके मुरीद अनगिनत आम लोग भी रहे।

जयपाल और सुषमा, ईश्वर प्रदत्त वक्ता थे। जयपाल की ताकत अंग्रेजी भाषा पर उनकी असाधारण निपुणता और विद्वता थी, तो सुषमा स्पष्ट अभिव्यक्ति, विशुद्ध हिंदी और संस्कृत व भारतीय संस्कृति की व्यापक समझ की धनी थीं। जब कभी ये दोनों संसद में बोलने के लिए उठे, उन्हें गंभीरता से सुना गया। राजनीतिक जीवन के लिहाज से जहां सुषमा का करियर अनवरत ऊपर चढ़ता गया, तो जयपाल ने उतार-चढ़ाव भी देखे। मगर दोनों ने खूब सम्मान कमाया। वे दोनों ऐसे राजनीतिक नेताओं से जुड़े थे, जिनके पास ज्ञान और अनुभव का विशाल खजाना था। इन दोनों के वाक्पटु, तार्किक और जोशीले भाषण आज भी युवा राजनेताओं के लिए प्रेरक हो सकते हैं।

आज बेशक ये दोनों सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके शब्द जिंदा हैं। वैसे, उनके भावोत्तेजक भाषण और पैनी दृष्टि रखने वाले लेखन को पढ़कर उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। उनसे जुड़े यादगार पल हमारी राष्ट्रीय चेतना में सदा के लिए शामिल हो गए हैं। आने वाले कई वर्षों तक ये दोनों प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column August 10