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पाकिस्तानी कब्जे में नाराज कश्मीरी

पाकिस्तान में ‘कश्मीर’ को कोई सांविधानिक दर्जा हासिल नहीं है। हमने हमेशा जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना है, जबकि वहां पीओके को लेकर ऐसी सोच नहीं है। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) ...

पाकिस्तानी कब्जे में नाराज कश्मीरी
Monika Minalसुशांत सरीन, सीनियर फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशनWed, 15 May 2024 11:42 PM
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पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) के दिन-ब-दिन बिगड़ते हालात किसी एक  घटना की उपज नहीं हैं। अभी वहां जो जन-विद्रोह चल रहा है, उसके बीज पिछले डेढ़ साल के घटनाक्रमों में छिपे हैं। पिछले साल की शुरुआत में सब्सिडी हटाने के कारण आटे के दाम अप्रत्याशित रूप से बढ़ गए थे, तब भी लोग आक्रोशित हुए थे। मगर स्थिति जैसे-तैसे संभाल ली गई। इसके बाद मई के आसपास बिजली के बिल को लेकर वे मुखर हुए। उनका आरोप था कि पीओके में बना मंगला बांध 1,500-2,000 मेगावाट बिजली पैदा करता है और उत्पादन-दर ढाई से तीन रुपये प्रति यूनिट है, पर उपभोक्ताओं से 50-60 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली बिल वसूला जाता है। इस आंदोलन ने पूरे पाकिस्तान को उद्वेलित कर दिया और बिजली-शुल्क में कटौती की मांग मुल्क के हर कोने से उठने लगी। इसे भी पाकिस्तानी हुक्मरानों ने बड़ी मुश्किलों से संभाला, लेकिन लोगों में गुस्सा बना रहा।
पीओके के अवाम की इस नाराजगी को अवामी एक्शन कमेटी ने आकार दिया। यह कोई सियासी तंजीम नहीं है, बल्कि इसमें सिविल सोसाइटी के लोग हैं। वास्तव में, पीओके में नेताओं के लिए अब कोई जगह बची ही नहीं। यहां मुख्यधारा के राजनीतिक दल तो अप्रासंगिक हैं ही, पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ में तोड़-फोड़ के बाद यहां एक खिचड़ी सरकार काम कर रही है, जिसकी हैसियत न इस्लामाबाद में है और न स्थानीय लोगों के मन में। अवामी एक्शन कमेटी की मांग ऐसे में प्रासंगिक बन गई। उसने आटे और बिजली-बिल के साथ-साथ कुछ राजनीतिक मुद्दों को भी अपने चार्टर में जगह दी। छात्र संघों की पुनर्बहाली, सरकारी अफसरों या निर्वाचित प्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं का अंत, चुनाव, संपत्ति टैक्स आदि मसलों को भी इसने उठाया। हालांकि, उसका मुख्य जोर आटा और बिजली बिल पर ही रहा, इसलिए माना जाता है कि ताजा विरोध-प्रदर्शन आर्थिक मुद्दों से जुड़ा है और यदि हुकूमत महंगाई का तोड़ निकाल लेती है, तो हालात संभल सकते हैं।
मगर इस पूरे मामले में जो बात अलग से नजर आई, वह है लोगों का आक्रोश। यह संभवत: पहला मौका था कि वे इस कदर नाराज हुए। राजधानी मुजफ्फराबाद तक निकाले गए ‘लॉन्ग मार्च’ को रोकने के फौजी उपायों ने इस आग में घी डालने का काम किया। इसीलिए हमने पुलिस वालों की पिटाई देखी, सड़कों पर यातायात अवरुद्ध होते देखा और सरकार-विरोधी नारेबाजी सुनी। बेशक, स्थानीय सुरक्षा बलों का खौफ आम लोगों में पहले भी नहीं था, मगर इस्लामाबाद के रेंजर्स से वे टकराते नहीं थे। मगर इस बार रेंजर्स से भी प्रदर्शनकारियों ने दो-दो हाथ किए।
एक तर्क यह दिया जा रहा है कि पीओके की नई पीढ़ी अपने बुजुर्गों की तरह नहीं सोचती। दरअसल, पुराने जमाने के कश्मीरी पाकिस्तान के अधीन रहना पसंद करते हैं, पाकिस्तानी पंजाबियों के इशारे पर चलते हैं, कभी आवाज नहीं उठाते और भारत को अपना दुश्मन समझते हैं, मगर वहां के नौजवान पीओके का वाजिब हक लेने के लिए मुखर हैं। पाकिस्तान सरकार के प्रति भी उनका नजरिया अलग है और वे मानते हैं कि टैक्स लेने के बावजूद संसदीय प्रतिनिधित्व से उनको दूर रखना गलत है। इस पीढ़ी को भारत के जम्मू-कश्मीर का विकास भी लुभाता है।
पाकिस्तान में ‘कश्मीर’ को कोई सांविधानिक दर्जा हासिल नहीं है। अपने यहां भी अनुच्छेद 370 था, पर हमने हमेशा जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग माना है, जबकि पाकिस्तान में पीओके को लेकर ऐसी सोच नहीं है। उसके मुताबिक, यह ऐसा क्षेत्र है, जिसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है और इसका निर्धारण ‘यूएन रिजॉल्यूशन’ या संयुक्त राष्ट्र की दखल से होगा। यहां का अपना संविधान है, मगर उसका पाकिस्तान से सांविधानिक जुड़ाव नहीं है। यहां आर्थिक गतिविधियां नाममात्र की हैं, रोजगार के साधन सीमित हैं। हां, पाकिस्तान का इस पर नियंत्रण है, इसलिए यहां चुनाव कराए जाते हैं और लोगों को पासपोर्ट दिया जाता है, पर उनको पाकिस्तान की नागरिकता नहीं मिलती। यहां के लोग नेशनल असेंबली (संसद) के लिए वोट नहीं कर सकते और न ही ऊपरी सदन में उनका कोई नुमाइंदा है। नेशनल फाइनेंस कमीशन का कुछ हिस्सा इसको जरूर मिलता है, पर इसमें भी इसका अमल-दखल नहीं है।
यही कारण है कि मौजूदा हालात संभाल लिए जाने के बावजूद कहा जा रहा है, पीओके के लोग कोई भी रुख अख्तियार कर सकते हैं। वैसे, पाकिस्तान के सभी सरहदी इलाकों में ऐसा हो रहा है, फिर चाहे वह बलूचिस्तान हो, खैबर पख्तूनख्वा हो या गिलगित-बाल्टिस्तान। सभी क्षेत्रों में पाकिस्तानी हुक्मरानों से नाउम्मीदी दिख रही है और रियासत से अवाम का सामाजिक रिश्ता टूट रहा है। लिहाजा, जैसे-जैसे रियासत कमजोर होगी, इस तरह के आंदोलन तेज हो सकते हैं। चूंकि पीओके में हुकूमत ने घुटने टेक दिए हैं, इसलिए इसका यह संदेश भी जा सकता है कि अगर बड़ी संख्या में लोग घरों से बाहर निकल सकें, तो अपनी बात मनवा सकते हैं। ऐसा कभी इमरान खान ने भी कहा था कि हम 30-35 हजार लोग यदि सड़कों पर आ जाएं, तो पाकिस्तानी जनरलों की सलवारें गीली हो जाएंगी। जाहिर है, अलग-अलग इलाकों में चल रहा आंदोलन पाकिस्तान की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को ध्वस्त कर सकता है। 
यहां चुनौती भारत के लिए भी है। अगर पीओके में हालात बहुत बिगड़ते हैं और लोगों का पलायन भारतीय कश्मीर में होता है, तो उनके साथ हमारी सत्ता क्या बर्ताव करेगी? क्या ‘राइट टु रिटर्न’ यानी उनको वापस भेजने का कोई कानूनी प्रावधान हमारे यहां है? इतना ही नहीं, पाक अधिकृत कश्मीर को हम अपना हिस्सा मानते हैं, तो वहां के नागरिकों के साथ हमारा सुलूक क्या होगा या उनको क्या अधिकार दिए जाएंगे? और, अगर वहां के लोग भारत के साथ जुड़ने की मांग शुरू करते हैं, तो किस तरह हम उन्हें मदद कर सकेंगे? क्या भारत वहां कोई कार्रवाई करेगा या वहां के अलगाववादियों की सहायता करेगा या हाथ पर हाथ धरे बैठ जाएगा- यह भी हमारी एक अन्य चुनौती होगी।
सवाल यह भी है कि पीओके का हंगामा यदि अन्य सरहदी इलाकों में फैलता है, जैसा हमने पिछले दिनों पाकिस्तान अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान में देखा था, तब हमारा रुख क्या होगा? ऐसे में, अभी इन विरोध-प्रदर्शनों पर नजर बनाए रखना ही उचित है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)