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बंगाल में नाक और साख का सवाल

लोकसभा सीटों के लिहाज से तीसरे सबसे बड़े राज्य में दोनों बड़े दावेदारों यानी तृणमूल व भाजपा पर अपनी पुरानी सीटों को बचाने और उनकी तादाद बढ़ाने की गंभीर चुनौती है।  कसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42...

बंगाल में नाक और साख का सवाल
Monika Minalप्रभाकर मणि तिवारी, वरिष्ठ पत्रकारWed, 10 Apr 2024 11:27 PM
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लोकसभा सीटों के लिहाज से तीसरे सबसे बड़े राज्य में दोनों बड़े दावेदारों यानी तृणमूल व भाजपा पर अपनी पुरानी सीटों को बचाने और उनकी तादाद बढ़ाने की गंभीर चुनौती है। 
कसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 सीटें राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी भाजपा के लिए नाक और साख का सवाल बन गई हैं। इन सीटों के लिए सात चरणों में मतदान होना है। इंडिया गठबंधन के सहयोगी दलों यानी कांग्रेस और वाम मोरचा के साथ सीटों पर तालमेल के बजाय तृणमूल कांग्रेस राज्य की तमाम सीटों पर अकेले लड़ रही है। कांग्रेस और वाम मोरचा ने सीटों पर समझौता किया है। दूसरी ओर, भाजपा भी तमाम सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
इन दोनों दावेदारों यानी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा पर इस बार अपनी पुरानी सीटों को बचाने और उनकी तादाद बढ़ाने की गंभीर चुनौती है। यही वजह है कि दोनों पार्टियों के शीर्ष नेताओं ने बेहद आक्रामक चुनाव अभियान शुरू किया है। बीते लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को 22 और भाजपा को 18 सीटें मिली थीं। दो सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं, जबकि लेफ्ट या वाम मोरचा का खाता भी नहीं खुला था।
यूं तो सीटों के लिहाज से तीसरा बड़ा राज्य होने के कारण बंगाल तमाम दलों के लिए हमेशा अहम रहा है, पर इस बार दोनों प्रमुख दलों के बीच कांटे की लड़ाई के कारण इसकी अहमियत ज्यादा ही बढ़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले चरण के मतदान के पहले ही आधा दर्जन चुनावी रैलियों को संबोधित कर चुके हैं। दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पीछे नहीं हैं। भाजपा ने राज्य में कम से कम 35 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। दूसरी ओर, तृणमूल ने भी ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के प्रयास में 26 नए चेहरों को मैदान में उतारा है।
विश्लेषकों का कहना है कि भाजपा को नागरिकता (संशोधन) कानून और संदेशखाली कांड का फायदा मिल सकता है। वह नागरिकता कानून के जरिए राज्य की एक करोड़ से ऊपर की मतुआ आबादी को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रही है। इसी तरह संदेशखाली कार्ड के जरिये पार्टी के तमाम नेता राज्य में महिलाओं की स्थिति का प्रचार कर रहे हैं। राज्य में कम से कम पांच सीटों पर मतुआ वोटर निर्णायक हैं, इनमें महुआ मोइत्रा की कृष्णनगर सीट भी है, पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी लगातार प्रचार कर रही है कि सीएए के तहत आवेदन करते ही नागरिकता छिन जाएगी। ममता इस कानून को एनआरसी से भी जोड़ रही हैं। ऐसे में, फिलहाल इस कानून का फायदा या नुकसान किसे होगा, बताना मुश्किल है। भाजपा के लिए शिक्षक भर्ती और राशन घोटाला भी एक प्रमुख मुद्दा है।
ममता बनर्जी समेत तृणमूल कांग्रेस के तमाम नेता केंद्रीय एजेंसियों के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगा रहे हैं। साथ ही, केंद्रीय योजनाओं के मद में कोई पैसा नहीं देने का आरोप भी उठ रहा है। ममता और पार्टी के नेता राज्य सरकार की ओर से शुरू की गई लक्ष्मी भंडार, कन्याश्री, सबुज साथी और युवाश्री के अलावा विधवा और बुजुर्ग पेंशन जैसी योजनाओं का जमकर प्रचार कर रहे हैं। राज्य के 7.18 करोड़ वोटरों में 3.59 करोड़ महिलाएं  शामिल हैं। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में इन योजनाओं ने महिलाओं का करीब 55 प्रतिशत वोट पार्टी को दिलाया था। उसके बाद लक्ष्मी भंडार योजना शुरू की गई है। केंद्रीय योजनाओं की काट के तौर पर राज्य सरकार और तृणमूल कांग्रेस अपने मजबूत तंत्र के जरिए अपनी योजनाओं का तृणमूल स्तर तक प्रचार करने में कामयाब रही है। हालांकि, इन योजनाओं के तहत मिलने वाले लाभ में भ्रष्टाचार के आरोप उठते रहे हैं, लेकिन पार्टी के नेता दावा करते हैं कि इसका कोई असर नहीं होगा।
उत्तर 24-परगना जिले में विभिन्न घोटालों में पार्टी के मजबूत नेताओं की गिरफ्तारी ने भी तृणमूल की चिंता बढ़ा दी है। वहां संगठन संभालने वाले मंत्री ज्योतिप्रिय मल्लिक राशन घोटाले में जेल में हैं, तो कोलकाता और हुगली जिले में चुनावी जिम्मा संभालने वाले पार्थ चटर्जी भी शिक्षक भर्ती घोटाले में हवालात में हैं। संदेशखाली की घटना और उस मामले में शाहजहां शेख समेत पार्टी के कई नेताओं की गिरफ्तारी भी पार्टी के लिए सिरदर्द बन गई है। संदेशखाली इलाका बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र के तहत है। पार्टी ने इस सीट से पिछली बार जीतने वाली अभिनेत्री नुसरत जहां को टिकट नहीं दिया है। संदेशखाली कांड के दौरान उनकी काफी किरकिरी हुई थी। इसी तरह बीरभूम व आसपास के जिलों में पार्टी के चुनाव अभियान की जिम्मेदारी उठाने वाले बाहुबली नेता अणुब्रत मंडल भी पशु तस्करी मामले में दिल्ली के तिहाड़ जेल में हैं। पिछले चुनाव में पार्टी का मजबूत स्तंभ रहे पार्थ चटर्जी जेल में हैं, तो शुभेंदु अधिकारी भाजपा में।
इसके साथ ही तृणमूल कांग्रेस नागरिकता कानून का डर दिखा कर अल्पसंख्यक वोटरों को एकजुट करने के प्रयास कर रही है। मोटे अनुमान के मुताबिक, राज्य में इस तबके की आबादी 30 प्रतिशत से ज्यादा है। पार्टी भाजपा के राम मंदिर और नागरिकता कानून के मुद्दे को अपने सियासी हित में इस्तेमाल करते हुए इस तबके में बिखराव रोककर एकजुट करने का प्रयास कर रही है। पिछले चुनाव में अल्पसंख्यक वोटों के विभाजन के कारण भाजपा को उत्तर दिनाजपुर और मालदा जिलों की एक-एक सीट पर जीत मिली थी। तृणमूल कांग्रेस का लक्ष्य अबकी इस बिखराव को रोकना है।
दक्षिण बंगाल के पांच जिलों में फैले गंगा के मैदानी इलाकों में लोकसभा की 16 सीटें हैं। भाजपा ने पिछली बार इनमें से महज तीन सीटें जीती थीं। इन इलाकों में तृणमूल ने छह नए चेहरों को मैदान में उतारा है। 
भाजपा उत्तर बंगाल में मजबूत समझी जाती है। पिछली बार उसने इलाके की आठ में सात सीटें जीत ली थीं, पर इस बार उसे वहां भी अंतरकलह से जूझना पड़ रहा है। उसकी सबसे बड़ी चिंता दक्षिण बंगाल में पार्टी का संगठन कमजोर होना है। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी के अलावा उसके पास कोई बड़ा चेहरा नहीं है। जंगलमहल इलाके में लोकसभा की आठ सीटें हैं। पिछली बार इनमें से भाजपा को पांच और तृणमूल को तीन सीटें मिली थीं, पर तब मेदिनीपुर इलाके के धाकड़ नेता शुभेंदु अधिकारी तृणमूल में थे। उनके 2019 में भाजपा में जाने के बाद सियासी समीकरण बदला है।
कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने तृणमूल पर भाजपा से तालमेल का आरोप लगाते हुए अपना चुनाव अभियान शुरू किया है। दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी भी इंडिया ब्लॉक के इन दोनों सहयोगी दलों के खिलाफ यही यानी भाजपा से गोपनीय तालमेल के आरोप लगा रही हैं। तय है, भाजपा और तृणमूल के बीच कांटे की टक्कर में गंगा के मैदानी इलाकों के साथ ही, जंगलमहल इलाका, उत्तर बंगाल और दक्षिण बंगाल का मतुआ बहुल इलाका अहम भूमिका निभाएगा।
    (ये लेखक के अपने विचार हैं)