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पंजाब में पुरानी सियासत के चंद झोंके

चर्चाएं कई बार असल तस्वीर को पीछे धकेल देती हैं। लोकसभा चुनाव के जो नतीजे पंजाब से आए हैं, उनके बारे में यही कहा जा सकता है। सारी बातचीत या तो अपने उग्र तेवरों के लिए सुर्खियों में रहे अमृतपाल सिंह...

पंजाब में पुरानी सियासत के चंद झोंके
Pankaj Tomarहरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकारSun, 16 Jun 2024 10:42 PM
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चर्चाएं कई बार असल तस्वीर को पीछे धकेल देती हैं। लोकसभा चुनाव के जो नतीजे पंजाब से आए हैं, उनके बारे में यही कहा जा सकता है। सारी बातचीत या तो अपने उग्र तेवरों के लिए सुर्खियों में रहे अमृतपाल सिंह तक सिमट गई है, जिन्होंने बतौर निर्दलीय खडूर साहिब से चुनाव जीता है या फिर, फरीदकोट से चुनाव जीतने वाले सरबजीत सिंह खालसा की बात हो रही है, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के हत्यारे बेअंत सिंह के बेटे हैं। इन दोनों की जीत से पंजाब की राजनीति में आया दूरगामी असर वाला बड़ा राजनीतिक बदलाव विमर्श से बाहर हो गया है। यहां तक कि इसकी चर्चा भारतीय जनता पार्टी भी नहीं कर रही, जिसने भले ही पंजाब में एक भी सीट न जीती हो, लेकिन अपने आधार का विस्तार यहां सिर्फ उसी ने किया है।
पहले बात उन चरमपंथियों की करते हैं, जिनको पंजाब की भाषा में ‘खाड़कू’ कहा जाता है। आज चुनावी जीत को लेकर सरबजीत सिंह खालसा भले चर्चा में हों, लेकिन एक दौर वह था, जब उनकी मां विमल कौर खालसा और उनके दादा सुच्चा सिंह, दोनों ने ही लोकसभा चुनाव जीता था। भारत के लोकतंत्र और इसकी संसद की जो ताकत है, उसकी धारा चंद खाड़कुओं के जीतकर आ जाने से बाधित नहीं होती। यह उस समय भी नहीं हुई थी और अब भी इसकी कोई आशंका नहीं है। बात सिर्फ इतनी है कि पंजाब अचानक ही उस दौर में वापस लौटता दिख रहा है, जब विमल कौर खालसा, सुच्चा सिंह और सिमरनजीत सिंह जैसे लोग आसानी से चुनाव जीत जाते थे।
इस बार पंजाब के चुनाव में एक और बदलाव दिखाई दिया, जिसे बहुत से विश्लेषक खडूर साहिब व फरीदकोट के चुनाव नतीजों से भी ज्यादा खतरनाक मानते हैं। हालांकि, हरसिमरत कौर बादल बठिंडा सीट से चुनाव जीतने में सफल रही हैं, लेकिन अकाली दल बुरी तरह ध्वस्त हो गया है। पिछले विधानसभा चुनाव में लगातार गिरते-पड़ते हुए भी उसे 25 फीसदी से ज्यादा वोट मिल गए थे। मगर इस बार उसे मिलने वाले वोट 13 फीसदी से कुछ ही ज्यादा हैं। अगर हम बादल परिवार के गढ़ बठिंडा की सीट को अलग करके देखें, तो बाकी पंजाब में तो उसकी हालत और खराब है।
देश की इस दूसरी सबसे पुरानी पार्टी के अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहंुच जाने से जो चिंताएं खड़ी होती हैं, वे बहुत बड़ी हैं। अकाली दल का मूल आधार पंजाब का वह वर्ग है, जिसे पंथक वोटर माना जाता है। मगर इसके साथ ही व्यवहार में अकाली दल कुछ अलग तरह से धर्मनिरपेक्ष और उदारपंथी भी दिखाई देता रहा है। उसके विधायक दल और यहां तक कि मंत्रिमंडल में सिख व हिंदू ही नहीं, मुस्लिम भी जगह पाते रहे हैं। इस बार भी उसके तीन उम्मीदवार हिंदू थे। पंजाब का पिछले कुछ दशकों का इतिहास यही बताता है कि यहां जब-जब अकाली दल राजनीतिक रूप से कमजोर होता है, तब-तब खाड़कू तत्व ताकतवर होने लगते हैं।
याद कीजिए, राजीव-लोंगोवाल समझौते और उसके बाद की राजनीति को। ये अकाली ही थे, जिन्होंने उग्रवाद को जनमानस से खत्म करने में स्थानीय स्तर पर एक बड़ी भूमिका निभाई थी। ठीक वैसे ही, जैसे कभी पश्चिम बंगाल में नक्सलवाद के विस्तार पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने नकेल कसी थी। मगर अब जो अकाली दल हमारे सामने है, उससे क्या वैसी किसी भूमिका की उम्मीद की जा सकती है? जनता पर उसका प्रभाव तो लगातार कम हो ही रहा है, उसके पास अब लोंगोवाल, तोहड़ा और प्रकाश सिंह बादल जैसे कद्दावर नेता भी नहीं हैं, जिनकी बात तब पूरा पंजाब शिद्दत से सुनता था।
लोकसभा की सात सीटें जीतने के बाद कांग्रेस भले ही पंजाब की सबसे बड़ी विजेता बन गई है, लेकिन पिछली बार के मुकाबले न सिर्फ उसकी एक सीट कम हुई है, बल्कि उसे मिलने वाले मतों का प्रतिशत भी 14 फीसदी गिर गया है। हालांकि, सभी संसदीय सीटों पर चतुष्कोणीय या पंचकोणीय मुकाबला होने के कारण वह 26 फीसदी वोट पाकर पहले नंबर पर  है। आजादी के बाद से आज तक कांग्रेस पंजाब की राजनीति में अकाली दल के खिलाफ एक मजबूत स्तंभ की तरह खड़ी रही है। अकाली दल के कमजोर होने के बाद उसके मजबूत होने की जो उम्मीद बांधी जा सकती थी, वह उतनी मजबूत नहीं हो पा रही है। माना जाता है कि अगर आम आदमी पार्टी ने अकाली दल के आधार में सेंध लगाई है, तो भाजपा ने कांग्रेस के मतदाता वर्ग को अपनी ओर खींचा है।
भारतीय जनता पार्टी ने बडे़ पैमाने पर कांग्रेस और कुछ हद तक आम आदमी पार्टी से नेताओं का आयात किया, लेकिन उसने पंजाब में राजनीति करने का अपना पुराना मुहावरा इस बार पूरी तरह बदल दिया। पंजाब में पार्टी के 13 में से सिर्फ दो उम्मीदवार उसके पुराने परंपरागत नेता थे, बाकी सभी आयातित थे। उसने पंजाब के स्थानीय समीकरणों के हिसाब से सोशल इंजीनियरिंग की कोशिश की और बड़ी संख्या में वोट भी हासिल किए। सबसे बड़ी बात यह है कि18 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल करके उसने अकाली दल को बहुत पीछे छोड़ दिया।
पिछले आम चुनाव तक कहा जाता था कि मोदी का जादू भले ही पूरे देश में फैला, लेकिन उसने पंजाब के शंभू बॉर्डर को कभी पार नहीं किया। शंभू बॉर्डर अंबाला के आगे की वह सीमा है, जहां से पंजाब शुरू होता है। इस बार जब बाकी भारत में यह जादू कुछ हद तक उतार के लक्षण दिखा रहा है, तो पंजाब में उसने हल्का-फुल्का ही सही, असर दिखाना शुरू कर दिया है। हालांकि, चुनाव नतीजे यह भी बताते हैं कि पंजाब के शहरी क्षेत्रों में भाजपा ने जैसी पैठ बनाई है, वैसी अभी ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं बनी है। 
पिछला विधानसभा चुनाव जीतकर पंजाब में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी को भले ही इस बार पहले जैसा समर्थन नहीं मिला, फिर भी वह दूसरे नंबर की पार्टी बनी हुई है। पंजाब की राजनीति में यह सबसे नई खिलाड़ी है और पंजाब जिस तरह की समस्याओं से जूझ रहा है, उसमें इस पार्टी की राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमताओं की अग्नि-परीक्षा अभी बाकी है। वह भी तब, जब पंजाब फिर से उसी दौर में पहुंचता दिख रहा है, जब इस राज्य का घटनाक्रम देश ही नहीं, पूरी दुनिया की चिंता का विषय बन गया था। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)