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ओपिनियनअभी लंबा चलेगा यह विवाद

शशांक, पूर्व विदेश सचिवPublished By: Rohit
Tue, 08 Sep 2020 09:54 PM
अभी लंबा चलेगा यह विवाद

वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन लगातार समझौते का उल्लंघन कर रहा है। सोमवार को एक बार फिर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवानों ने पूर्वी लद्दाख में हमारी एक फॉरवर्ड पोजिशन के करीब आने की कोशिश की और जब हमारे सैनिकों ने उन्हें रोका, तो उन्होंने फार्यंरग शुरू कर दी। पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे पर हुई यह गोलीबारी गलवान की खूनी झड़प की अगली कड़ी है। इससे पहले सन 1975 में एलएसी पर गोलियां चली थीं, जिसमें चीन के सैनिकों ने असम राइफल्स के जवानों पर घात लगाकर हमला किया था। इन घटनाओं से साफ है कि वह लगातार हमें परख रहा है। वह जांचने की कोशिश कर रहा है कि किस हद तक हम अपनी सीमा की रक्षा के लिए मुस्तैद हैं।
सवाल यह है कि एलएसी पर हालात काबू में क्यों नहीं आ रहे हैं? इसके कई कारण हैं। पहली वजह तो चीन की कुत्सित मंशा है। वह यह जानता है कि भारत शांति का हिमायती देश है और बातचीत के जरिए ही हरेक मसले को सुलझाने की ख्वाहिश रखता है। सन 1962 में उसने इसका अनुभव किया है। इसीलिए वह वक्त-वक्त पर सीमा पर अपनी फौज की गतिविधियां बढ़ाता रहता है, ताकि भारत के कुछ और इलाकों को अपने कब्जे में ले सके। उल्लेखनीय है कि सीमांकन का काम चीन की वजह से ही अब तक नहीं हो सका है, और इसी के कारण वह हमारे कई हिस्सों को अब अपना बताने लगा है।
ताजा गोलीबारी की एक वजह ‘ग्रे जोन’ में भारत की मजबूत होती स्थिति भी है। ग्रे जोन, दरअसल वह इलाका होता है, जहां दोनों देशों के सैनिक पेट्रोलिंग करते हैं और एक-दूसरे के आमने-सामने आते रहते हैं। लद्दाख के इसी इलाके में 1962 में चीन ने हिमाकत की थी। तब से कमोबेश यहां उसी का दखल ज्यादा रहा है, पर स्पेशल फ्रंटियर फोर्स की पिछली कार्रवाई के बाद हमारी स्थिति यहां मजबूत हुई है। चीन इसी से खार खा रहा है। वह किसी न किसी तरह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इन इलाकों पर अपना कब्जा चाहता है। लेकिन ऐसा करते हुए वह शायद भूल  रहा है कि आज का भारत  सन 1962 के दौर से काफी आगे निकल चुका है। 
चीन की समझ में यह भी नहीं आ रहा कि भारत अब रक्षात्मक के साथ-साथ आक्रामक प्रतिक्रिया क्यों दिखाने लगा है? वह बेशक यह दावा करे कि अमेरिका की शह पर भारत जवाब देने लगा है, मगर हकीकत यही है कि भारत ने अपनी चीन-नीति में व्यापक बदलाव किए हैं। सबसे पहले तो उस पर आर्थिक निर्भरता कम की गई, फिर सैन्य नीति में बदलाव करते हुए वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पेट्रोलिंग करने वाले जवानों का यह अधिकार दे दिया गया कि वे आत्मरक्षा में गोली चला सकते हैं। इन सबसे चीन को दोतरफा चोट पहुंची है। आर्थिक निर्भरता कम होने से जहां भारतीय बाजार पर कब्जा करने और इस बिना पर भविष्य में मोलभाव करने की उसकी योजना पर पानी फिर गया है, तो जवानों को आत्मरक्षार्थ गोली चलाने की अनुमति मिलने से हमारी फौज का मनोबल बढ़ गया है। उल्लेखनीय है कि पहले इसी एक नीति की वजह से चीन हमारी सेना को कमतर समझता था।
पड़ोसी देश द्वारा लगातार की जा रही उकसावे की कार्रवाई के बावजूद भारत ने जिस तरह से जवाब देते हुए भी संयम का परिचय दिया है, वह कई मायनों में हमारे हित में है। इससे बीजिंग को यह सबक मिला है कि बेशक सीमा का निर्धारण न होने से वह सीमावर्ती इलाकों में स्थाई ढांचा खड़ा न करे, लेकिन जब तक यथास्थिति बहाल नहीं की जाएगी, तब तक भारतीय फौज पीछे नहीं हटेगी। अलबत्ता, उसे जैसे को तैसा का जवाब दिया जाएगा। यह उसके लिए अप्रत्याशित है। भारतीय फौज को यह संकेत दिया जा चुका है कि उसके हाथ अब खुले रखे जाएंगे। बीते कुछ वर्षों से उसकी समस्याओं पर खासतौर से गौर किया गया है और उन्हें दूर किया जा रहा है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत खुलेआम यह कह चुके हैं कि यदि सैन्य और कूटनीतिक स्तर की वार्ता से सफलता नहीं मिलती है, तो चीनी सेना के अतिक्रमण को रोकने के लिए सैन्य विकल्प भी आजमाया जा सकता है। यह साफ संदेश है कि भारत सैन्य समाधान निकालने में भी सक्षम है।
भारत की जवाबी कार्रवाई का यह भी अर्थ है कि हमारी सरकार ‘इंटिग्रेटेड रिस्पॉन्स’ की नीति पर आगे बढ़ रही है। इसका मतलब यह है कि चीन के साथ टकराव को रोकने के लिए सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक, हर स्तर पर समान रूप से आगे बढ़ा जाएगा। 10 सितंबर को दोनों देशों के विदेश मंत्रियों एस जयशंकर और वांग यी के बीच होने वाली संभावित मुलाकात भी इसी की एक कड़ी है। यह बताता है कि नई दिल्ली बातचीत से ही समस्या का समाधान चाहती है, लेकिन बीजिंग की तरफ से यदि उकसाने की कोशिश की गई, तो उसे मुंहतोड़ जवाब भी दिया जाएगा। इसी वजह से केंद्र सरकार ने पड़ोसी देशों के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से आगे बढ़ाया है। नई दिल्ली का मकसद उप-महाद्वीप पर चीन का बढ़ता दबाव खत्म करना है। उल्लेखनीय है कि भारत को घेरने के लिए चीन अगल-बगल के सभी देशों में अपना निवेश बढ़ा रहा है, मगर नई दिल्ली भी अफगानिस्तान, भूटान जैसे पड़ोसी राष्ट्रों के साथ द्विपक्षीय रिश्तों को नया रूप देकर अपनी योजना साफ कर चुकी है।
यहां एक बात भारत के नागरिकों को भी समझ लेनी चाहिए। यह लड़ाई काफी लंबी चलने वाली है। कयास यही है कि संयम के बोल शायद ही अभी चीन समझना चाहेगा। वह बाहरी और भीतरी कई तरह की चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में, वह भारत के साथ एक नया मोर्चा खोलकर अपनी जनता और दुनिया का ध्यान बंटाना चाहता है। अच्छी बात यही है कि भारत उसकी इस योजना को समझ चुका है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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