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ओपिनियनकम से कम पूजा के सामान हों देशी 

रितु कुमार, फैशन डिजाइनरPublished By: Rohit
Thu, 08 Oct 2020 10:39 PM
कम से कम पूजा के सामान हों देशी 

वह 2017 के फरवरी महीने की एक सर्द सुबह थी। मैं पेरिस में थी। हम एवेन्यू मोंटेन्यू गली से गुजर रहे थे, जो एफिल टावर को चैंप एलिसिस से जोड़ती है। यह फैशन दुनिया की सबसे ग्लैमरस सड़क है। इसे यूरोप के हाउते कॉउचर (इस डिजाइन में मशीन से सिलाई नहीं की जाती) डिजाइनरों का घर भी कहा जाता है। मुझे वहां यह देखकर आश्चर्य हुआ कि एलवीएमएच स्टोर में दाखिल होने के लिए चीनी ग्राहक कतार में इंतजार कर रहे हैं। जब मैं स्टोर में प्रवेश करने वाली थी, तभी दो चीनी महिलाएं मेरे पास आईं। उन्होंने मुझे लुई विटॉन से किसी भी कीमत की दो हैंडबैग खरीदने की गुजारिश की। दरअसल, स्टोर में ब्रिकी के लिए कोटा सिस्टम लागू था और चूंकि उन दोनों को कोटा के तहत रियायत मिल चुकी थी, इसलिए उन्हें मेरी मदद की दरकार थी।
इस साल फरवरी में मैं फिर से उसी गली में थी। अर्थव्यवस्था काफी मुश्किल दौर से गुजर रही थी, जिसकी तस्दीक धनाढ्य ग्राहकों की कमी से हो रही थी। वहां एकमात्र खरीदार चीनी थे, और खरीद पर कोटा प्रणाली के दिन कमोबेश लद चुके थे। मगर मामला सिर्फ उपभोग का नहीं है। दरअसल, चीनी अब फैशन की दुनिया में भी अपनी ताकत का लोहा मनवा रहे हैं, क्योंकि वे संसार के लगभग सभी लग्जरी कपड़ों व सामान का निर्माण और आपूर्ति करते हैं। लेकिन कोविड-19 के कारण तस्वीर पूरी तरह बदलने लगी है और बाजार से चीनी सामान गायब होने लगे हैं।
हालांकि, भारतीय बाजार पर चीन की नजर कायम है और वह बहुत मामूली कीमत पर लोकप्रिय भारतीय शिल्प के नकली-उत्पाद बेचना चाहता है। चीनी जब किसी बाजार में उतरते हैं, तो वे लागत पर ध्यान नहीं देते। उनके उत्पादों की कीमतें उनकी राजनीतिक नीति से तय की जाती हैं। इसका मतलब यह है कि भारत के फैशन और विवाह कारोबार में उतरने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। भारतीय उपभोक्ताओं के मूल्यों और उनकी आदतों का अध्ययन करके चीनी जल्द ही कलेक्शन जुटाने में माहिर रहे हैं। दुर्भाग्य से भारतीय हस्त शिल्प के मामले में चीन मशीन-निर्मित विकल्पों से उत्पादन करना चाहता है। वह यहां के शिल्प कौशल की मशीनी नकल कर रहा है, जबकि आज भी भारत के 1.6 करोड़ शिल्पकार रोजाना अपने हाथों से यह काम कर रहे हैं।
जाहिर है, उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। खासकर यह देखते हुए कि भारतीय शिल्पकार कोविड-19 संकट के कारण पहले से ही बेरोजगारी का सामना कर रहे हैं। इस पर गंभीर चिंतन होना चाहिए कि भारतीय बाजार आज क्यों चीन के नकल वाले उत्पादों से भरे पड़े हैं, जबकि वे सस्ते कपड़ों पर बनाए जाते हैं? अब तो इस फेहरिस्त में कई अन्य बड़े नाम भी हैं, जैसे बनारसी और चंदेरी साड़ियां; सिंथेटिक पर छापी जा रही राजस्थानी बंधेज कलाकारी; गुजरात और कच्छ की मिरर वर्क कशीदाकारी; कांथा, सुजनी, फुलकारी और लखनऊ कढ़ाई, जो चीन में मशीन द्वारा सिंथेटिक पर बनाई जा रही हैं; बंजारा बैग और कोल्हापुरी चप्पल, जो अब ज्यादातर झिंजियांग से आयात किए जाते हैं; मंगोलियाई ऊन से बनी नकली कश्मीरी शॉल, जिस पर पश्मीना का टैग लगाया जाता है इत्यादि। चीन से आयातित इन उत्पादों में से एक भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो अब यहां के छोटे-बड़े बाजार में भी उपलब्ध नहीं हो। इससे बेशक स्थानीय स्तर पर रोजगार-सृजन में मदद मिली है, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि इसके बदले में वे स्थापित शिल्प क्षेत्रों से काम छीन भी रहे हैं।
भारत एकमात्र देश है, जिसने अपनी फैशन पहचान को छोड़ा नहीं, बल्कि उसका संरक्षण किया है। इसे नया रूप दिया गया है, जो पारंपरिक तिमिर चित्र, शिल्प और कपड़ा-निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है। देखा जाए, तो सही मायने में मेक इन इंडिया उत्पाद। यह एक चमत्कार है, और पहेली भी, जब हम इसकी तुलना जापान और मैक्सिको जैसे देशों से करते हैं। वहां ऑर्गेनिक कपडे़ अब म्यूजियम की शान बन गए हैं और देश पेरिस की रैंप की नकल करने लगे हैं। 
जिन-जिन लोगों से मैंने बात की, उनमें से अधिकांश ने परेशान करने वाला यही रुझान बताया कि भारतीय त्योहारों के समय बाजार में चीन की घुसपैठ बढ़ जाती है। बेशक वहां से रंग-बिरंगी झालरें आयात की जा सकती हैं, हालांकि इसे बनाना भी कोई रॉकेट साइंस नहीं है और इसे आसानी से अपने यहां तैयार किया जा सकता है, मगर अपने यहां दीये; गणेश, दुर्गा, लक्ष्मी व सरस्वती की मूर्तियां; राधा और कृष्ण के सेट भी वहीं से आयात किए जाते हैं, जबकि वह हमारी धार्मिक प्राथमिकताओं को लेकर कतई संवेदनशील नहीं है। इनके आयात की समीक्षा की जानी चाहिए। अपने यहां ये लगभग पवित्रता से बनाए जाते हैं, क्योंकि मिट्टी और पुआल से बनाई जाने वाली काया हाथ से तैयार की जाती है। ये उत्पाद आमतौर पर ग्रामीणों द्वारा त्योहार के मौसम में ही बनाए जाते हैं। वैसे भी, अपने यहां पूजा के लिए मिट्टी की वस्तुएं बनाने का अनुष्ठान गहरा व ऐतिहासिक है। इतना ही नहीं, ये प्राकृतिक तरीके से नष्ट भी किए जा सकते हैं और इनका पुनर्निर्माण भी संभव है। इसीलिए हमें धार्मिक वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाकर अपने कुम्हारों की रक्षा करनी चाहिए। ऐसी आयातित वस्तुओं पर प्लास्टिक की परत होती है और पूजा के बाद जब इनका विसर्जन किया जाता है, तो ये नदियों को प्रदूषित करती हैं। कोविड-19 के कारण वैसे ही कुम्हारों को इस साल ऑर्डर कम मिले हैं, ऐसे में, चीन से दिवाली से जुड़े उत्पादों को आयात करना समझदारी नहीं है।
जब हम ‘आत्मनिर्भर भारत’ की वकालत करते हैं, तो देश को गैर-आवश्यक वस्तुओं के आयात की समीक्षा करनी ही चाहिए। पहले से तनावग्रस्त शिल्प क्षेत्र को आज संरक्षण की जरूरत है, शिंजियांग और शिआमेन से प्रतिस्पद्र्धा करने की नहीं, जहां डिजिटल मशीनों से नकली कढ़ाई करके बिना किसी कीमत के नकल तैयार कर ली जाती है। त्योहारी मौसम शुरू होने से पहले चीन से होने वाले इन आयात पर तत्काल रोक लग जानी चाहिए, ताकि पहले से भयंकर मुश्किलें झेल रहे हमारे शिल्पकारों की रक्षा हो सके।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)
 

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