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10 अगस्त, 2020|2:06|IST

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मुफ्त लाभ बांटने में फंसे राज्य 

तमिलनाडु देश का वह राज्य है, जहां से जनता को बेहद मामूली दरों पर (लगभग मुफ्त) सुविधाएं देने का चलन शुरू हुआ। इसकी शुरुआत सीएन अन्नादुरई के साथ हुई है। सन 1969 में जब इस सूबे का नया नामकरण हुआ (मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु रखा गया), तब प्रथम मुख्यमंत्री अन्नादुरई ने बेहद रियायती दरों पर चावल देना शुरू किया था। देश में यह पहला मौका था, जब चुनावी फायदे के लिए अनाज में सब्सिडी दी गई थी। मगर चुनावी राजनीति के अलावा अन्नादुरई सामाजिक कल्याण के हिमायती भी थे। वह द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम यानी द्रमुक के संस्थापक थे। पेरियार की पार्टी द्रविड़ कषगम से अलग होकर उन्होंने यह पार्टी बनाई थी। उनका एक प्रमुख लक्ष्य गरीबों का कल्याण भी था। उन्होंने भूखे को भोजन देना चाहा, इसलिए यह योजना तैयार की गई। मगर कुछ समय बाद इसे वापस ले लिया गया।
अन्नादुरई से पहले, मद्रास राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री और कांग्रेसी नेता के कामराज एक अनग रूप में मुफ्त सुविधाएं दे चुके थे। उन्होंने मिड-डे मील योजना शुरू की थी, जिसके तहत स्कूल आने वाले बच्चे को एक वक्त का खाना दिया जाता था। इसका आश्चर्यजनक परिणाम निकला। चूंकि हर गांव में प्राथमिक विद्यालय था और प्रत्येक पंचायत में उच्च विद्यालय, इसलिए उनमें नामांकन बढ़ गया और छात्रों के स्कूल छोड़ने की दरें घट गईं। बाद के मुख्यमंत्रियों ने इस योजना का विस्तार किया और इसे पोषक आहार योजना बना दिया, क्योंकि खाने के मेनू में अंडा भी शामिल किया गया था। 
अन्नादुरई के बाद जब करुणानिधि मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने कई अन्य सुविधाएं जोड़कर इसका दायरा बढ़ाया। मगर बाद के वर्षों में जयललिता ने ऐसी रियायतों को मुख्यधारा का हिस्सा बना दिया और हर वह सामान कमोबेश मुफ्त में देने लगीं, जिसकी चाहत लोगों को होती है। मसलन, टीवी, ग्राइंडर, मिक्सी, साइकिल, पालना, नवजात के जरूरी सामान, बकरी, यहां तक कि मंगलसूत्र के लिए सोना भी। हालांकि, अर्थशास्त्री हमेशा ही ऐसी रियायतों या मुफ्त सुविधाओं की हंसी उड़ाते हैं, क्योंकि उनकी नजरों में इनसे मुल्क के आर्थिक मूल्य नहीं बढ़ते। राजनेता महज इसलिए इसे अपनाते हैं, क्योंकि उन्हें यह मतदाताओं को लुभाने का सरल तरीका लगता है। फिर भी, ऐसी रियायतें तमिलनाडु में गहरे तक पैठती गईं और दूसरे सूबों में भी फैलने लगीं।
अविभाजित आंध्र प्रदेश ऐसे ही राज्यों में एक था। करिश्माई अभिनेता से राजनेता बने एन टी रामाराव ने 1982 के अपने चुनावी अभियान में दो रुपये किलो चावल देने का वादा किया, जिसका कांग्रेस ने मजाक उड़ाया। पर जनवरी, 1983 में रामाराव प्रचंड बहुमत के साथ चुनाव जीते। इसके बाद, एनटीआर के दामाद चंद्रबाबू नायडू को कुरसी मिली, जिन्होंने राज्य को बिल्कुल अलग दिशा में आगे बढ़ाया। उन्होंने हैदराबाद के बाहर ‘साइबराबाद’ बसाया, जहां पर ऊंची-ऊंची चमकीली इमारतें सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों का ठिकाना बनीं। चंद्रबाबू नायडू के प्रयासों से कई वैश्विक आईटी कंपनियों ने राज्य में अपना कामकाज शुरू किया।
चंद्रबाबू औद्योगिक विकास के जरिए राज्य में विकास लाना चाहते थे, मगर 2004 में उन्हें सत्ता से बाहर होना पड़ा। दरअसल, हैदराबाद और आसपास के इलाके तरक्की तो कर रहे थे, लेकिन ग्रामीण इलाकों में अंधियारा पसर रहा था। नतीजतन, ग्रामीण जनता ने उन्हें नकार दिया। कांग्रेस ने वाईएसआर रेड्डी के नेतृत्व में सत्ता हासिल की, और लोक-लुभावनवाद की फिर से वापसी हो गई। हालांकि, 2014 में तेलंगाना और आंध्र के रूप में प्रदेश के बंटवारे ने चंद्रबाबू नायडू की मदद की और वह सत्ता में लौटने में कामयाब हुए। मगर 2004 से कोई सबक न लेते हुए उन्होंने एक बार फिर अपनी भव्य योजनाओं को आकार देना शुरू किया। उन्होंने अमरावती में एक शानदार राजधानी बनाने का वादा किया। उन्होंने वैश्विक सलाहकार नियुक्त किए और सिंगापुर को टक्कर दे सकने वाले शहर के रूप में अमरावती को बसाने की योजना पर काम शुरू किया। हालांकि, उनका यह सपना अधूरा ही रहा, क्योंकि 2019 में उन्हें वाईएसआर के बेटे जगन मोहन रेड्डी ने चुनावी मात दे दी।
वाईएसआर कांग्रेस के इस युवा मुख्यमंत्री को सत्तासीन हुए बमुश्किल एक साल हुए हैं, पर इन्होंने नए तरह के लोक-लुभावनवाद को जन्म दिया है। अनुसूचित जाति/ जनजाति की लड़की को शादी के लिए एक लाख रुपये नकद देने के अलावा यहां 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को पेंशन के रूप में 2,250 रुपये हर महीने मिलेंगे। 10,200 करोड़ रुपये की एक योजना के तहत करीब 50 लाख किसानों को सालाना 13,500 रुपये दिए जाएंगे। स्वास्थ्य योजना में 2,000 बीमारियों को शामिल किया गया है, जिससे 1.42 करोड़ लोगों को लाभ मिल रहा है। एक योजना माओं के लिए भी है, जिसके तहत उन्हें अपने बच्चे को 12वीं क्लास तक निजी और सरकारी स्कूलों में पढ़ाने के लिए 15,000 रुपये सालाना दिए जा रहे हैं। अनुमान है कि सूबे में इतनी सारी योजनाएं और मुफ्त स्कीम हैं कि चार आदमी के एक परिवार को हर साल आसानी से दो लाख रुपये का लाभ मिलता है। चूंकि इनमें से कई नकद हस्तांतरण योजनाएं हैं, इसलिए पैसे सीधे लाभार्थियों को मिलते हैं। 
यह स्थिति तब है, जब राज्य का राजस्व 68,000 करोड़ रुपये कम हो गया है और इसका कर्ज बढ़कर इसके सकल घरेलू उत्पाद का 34 प्रतिशत हो चुका है। उद्योगपतियों की नाराजगी मोल लेकर जगन मोहन पहले ही अपने पांव पर कुल्हाड़ी मार चुके हैं। जिन लोगों ने चंद्रबाबू नायडू के ड्रीम प्रोजेक्ट पर विश्वास करते हुए अमरावती में निवेश किया था, वे भी खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे हैं, क्योंकि जगन मोहन रेड्डी इस सपने को तोड़ने पर आमादा हैं। 
किसी भी कीमत पर वोटरों को लुभाने का प्रयास न सिर्फ अर्थव्यवस्था, बल्कि शासन-प्रशासन के लिहाज से भी बुरा तरीका है। इसका असर हमने तमिलनाडु में देखा है, जहां कुशल-अकुशल श्रमिक कम हो गए हैं और उन्हें अन्य राज्यों से लाया जाता है। मुफ्त सुविधाओं ने यहां की कार्य-संस्कृति को खूब चोट पहुंचाई है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 7 july 2020