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18 जनवरी, 2021|6:07|IST

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आतंक के खिलाफ बदलें रणनीति

जब पूरी दुनिया कोरोना महामारी के रूप में सबसे बडे़ मानवीय संकट से जूझ रही है, तब भी आतंकवाद में कोई कमी नहीं दिख रही। तनावग्रस्त इलाकों में दहशतगर्दों से सुरक्षा बलों की जंग पहले की तरह जारी है। आलम यह है कि मार्च और अप्रैल महीने में सैनिकों के अलावा 100 से अधिक आम नागरिक आतंकी घटनाओं के शिकार बने। इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में दो अलग-अलग घटनाओं में 50 से अधिक लोगों की जान ली, तो बोको-हरम ने चाड और नाइजीरिया में 130 से अधिक सुरक्षा बलों को मौत के घाट उतार दिया। इसी तरह की वारदात इराक, फ्रांस, माली जैसे देशों में भी हुई हैं। भारत भी कोई अपवाद नहीं है। यहां कश्मीर में पाकिस्तान-पोषित आतंकवाद का सुरक्षा बल लगातार मुकाबला कर रहे हैं। बीते रविवार को ऐसी ही मुठभेड़ में एक शीर्ष अधिकारी सहित हमारे पांच जवान शहीद हो गए। संभवत: इन्हीं वजहों से सोमवार को गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ-साफ कहा कि जब दुनिया कोविड-19 से मुकाबला कर रही है, तो कुछ लोग आतंकवाद जैसा वायरस फैलाने में व्यस्त हैं।
देखा जाए, तो यह एक मासूम उम्मीद है कि कोरोना-काल में दहशतगर्द अपनी हरकतों से बाज आ जाएंगे। आतंकवाद का अर्थ ही है, निर्दोषों की जान लेकर आतंक फैलाना। अलबत्ता, उनके लिए अभी ही सबसे मुफीद समय माना जाएगा, क्योंकि दुनिया की हर सरकार अपने-अपने नागरिकों को जानलेवा कोरोना वायरस से बचाने में जुटी है। लिहाजा आतंकवाद से पीड़ित तमाम देशों के सामने अभी दोतरफा चुनौती है- उन्हें आतंकवाद से भी लड़ना है और कोरोना से भी।
भारत के लिए समस्या कहीं अधिक गंभीर है। हम अपने उस पड़ोसी देश से मानवता की उम्मीद लगाए बैठे हैं, जहां की हुकूमत दशकों से आतंकवाद को खाद-पानी देती रही है। पाकिस्तान की परछाई दक्षिण एशिया में ही नहीं, विश्व की तमाम आतंकी गतिविधियों पर देखी गई है। ईरान, अफगानिस्तान, भारत के अलावा अमेरिका और यूरोप की आतंकी घटनाओं में भी वह शामिल पाया गया           है। फिर भी, तमाम देश पाक-प्रायोजित आतंकवाद को खत्म करने में विफल साबित हुए हैं। आखिर क्यों? 
दरअसल, इस्लामाबाद पर दबाव बनाने को लेकर दुनिया के हर देशों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं। ये सीमाएं उन्होंने अपने-अपने हित के हिसाब से तय की हैं। संयुक्त राष्ट्र और फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) जैसी संस्थाएं भी इन्हीं सीमाओं से संचालित होती हैं। जैसे, संयुक्त राष्ट्र ने पाकिस्तान को 146 आतंकियों की सूची कार्रवाई के लिए सौंपी, मगर इनमें से सिर्फ  19 दहशतगर्दों के अपने यहां होने की बात उसने कुबूल की। इसी तरह, अपनी टेरर-वाच लिस्ट के 7,600 में से 3,800 नाम पाकिस्तान ने पिछले कुछ महीनों में बिना किसी औचित्य के हटा दिए। क्या यह हैरत की बात नहीं है कि उसकी खोखली दलीलों को दुनिया आसानी से मानती रही है?
भारत अपने इस पड़ोसी देश से किस कदर परेशान है, यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है। यहां आतंकवाद एक ऐसा युद्ध बन गया है, जो अनवरत चलता ही जा रहा है। ऐसे में, यह सोच गलत है कि पाकिस्तान कोरोना-संकट का फायदा उठाकर भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है। यह आतंकवाद के ट्रेंड को नजरअंदाज करने जैसा होगा। बेशक हंदवाड़ा की घटना की जितनी निंदा की जाए, वह कम है, लेकिन यह कश्मीर में दहशतगर्दी में अचानक वृद्धि का संकेत नहीं है। यह सही है कि कश्मीर को समस्या बनाने के लिए पाकिस्तान वहां लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन यह भी सच्चाई है कि जम्मू-कश्मीर में उसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम हुआ है। यहां तो पिछले कुछ महीनों से सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई के कारण मौत का आंकड़ा बढ़ा है। इस साल 3 मई तक यहां 105 जान गई थी, जिनमें से 74 आतंकी थे, 22 सैनिक और नौ आम नागरिक। पिछले साल से तुलना करें, तो इस साल शुरुआती चार महीनों में सुरक्षा बलों और आम लोगों की जान कम गई है। वर्ष 2019 में सुरक्षा बल के 26 जवानों और 14 नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, जबकि इस दौरान 54 आतंकियों को मार गिराया गया था।
जाहिर है, भारत के खिलाफ पाकिस्तान का एजेंडा बदला नहीं है। उसे जब और जहां भी मौका मिलेगा, वह हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करेगा। यही वजह है कि हमें अपनी लड़ाई के लिए दूसरे देशों का मुंह नहीं ताकना चाहिए। दुनिया का कोई मुल्क हमारी यह जंग नहीं लड़ सकता, फिर चाहे वह सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका ही क्यों न हो। व्हाइट हाउस ने जिस तरह से अफगानिस्तान से पीछे हटने का फैसला किया, उससे ही साबित हो गया है कि पाक-प्रयोजित आतंकवाद से अमेरिका भी पार नहीं पा सका। इसीलिए हमें हल्के-फुल्के सौंदर्यात्मक उपायों से बचना चाहिए। जरूरी यह है कि जहां आतंकवाद का बीजारोपण हो रहा है, वहां लगातार कार्रवाई की जाए। महज एक बालाकोट से हमें कुछ हासिल नहीं हो सकता। यह समझने की जरूरत है कि पहल हमें करनी होगी। जवाबी कार्रवाई की बजाय हमें अपनी क्षमता बढ़ाकर दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी। अगर हम अपनी रणनीति नहीं बनाएंगे, तो स्वाभाविक तौर पर दूसरे (दुश्मन) की रणनीति का हिस्सा बन जाएंगे। षड्यंत्रकारियों का निशाना बनने के बाद जवाबी कार्रवाई करना सामरिक दृष्टि से बहुत बेहतर रणनीति नहीं मानी जाती।
अफसोस, लगातार होते आतंकवादी हमलों के बाद भी हम ऐसी कोई रणनीति नहीं बना सके हैं। अब तक की तमाम सरकारों ने मानो एक अनकही चुप्पी ओढे़ रखी है। यही कारण है कि पाकिस्तान पर हम प्रभावकारी दबाव नहीं बना पाते। आतंकवाद फैलाने के नाम पर उससे संबंध तोड़ते हैं और कुछ दिनों के बाद फिर उससे रिश्ते सामान्य बनाने की ओर बढ़ जाते हैं। यह परंपरा टूटनी चाहिए। पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अपनाने से बेशक आतंकवाद का समूल अंत नहीं हो, लेकिन हम अपना घर काफी हद तक बचा सकते हैं। क्या इस दिशा में सरकार आगे बढ़ेगी?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 6 may 2020