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11 जुलाई, 2020|9:23|IST

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यह दुनिया सिर्फ इंसानों की नहीं

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया कई तरह की खबरों से विचलित हुई है, इनमें सबसे बड़ा मसला पर्यावरण से जुड़ा रहा है। इस दौरान आर्थिकी और कुदरत से जुड़ी आपदाओं से भी हमारा वास्ता पड़ा, जिनको अंतत: प्रकृति के अतिक्रमण से जोड़कर ही देखा गया। पिछले कुछ समय की घटनाओं का यदि विश्लेषण करें, तो अब नए मिजाज के साथ हर वर्ष तूफान आ रहे हैं, जो जमकर तबाही मचाते हैं। अभी अम्फान से हुई तबाही के निशान मिटे भी न थे कि निसर्ग तूफान का सामना करना पड़ा है। इतना ही नहीं, पिछले दो-तीन दशकों में हमने कई बीमारियों के नाम भी पहली बार सुने। इनमें बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला और अब कोरोना जैसे महारोग मनुष्य द्वारा पारिस्थितिकी तंत्र को न समझ पाने के कारण ही पनपे हैं। साफ है, हम प्रकृति को समझने में पूरी तरह विफल रहे हैं।
दरअसल, हमने अपने जीवन-चक्र में कभी इस बात को महत्व ही नहीं दिया कि हर तरह की हलचल प्रकृति से जुड़ी होती है। पहले बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएं दशक भर पर अपना बड़ा असर डालती थीं, लेकिन हाल-फिलहाल के वर्षों में तो मानो ये रोजाना की घटनाओं का हिस्सा बन चुकी हैं। उल्लेखनीय यह भी है कि आज का समाज धीरे-धीरे इनसे न जूझ पाने की स्थिति में पहुंच चुका है। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि अब होने वाले ये आक्रमण सर्वव्यापी और कहीं ज्यादा असरकारी हैं। हमने कभी भी उस पारिस्थितिकी तंत्र को समझने की कोशिश ही नहीं की, जिससे प्रकृति और पृथ्वी जुड़ी है। हमने एक ही तंत्र को दुनिया में सबसे ज्यादा महत्व दिया, वह है आर्थिक तंत्र। इसी तंत्र को बेहतर बनाने के लिए हमने विज्ञान की हर पहल झोंक दी, ताकि आरामतलबी का हमारा जीवन बना रहे। इतना ही नहीं, इस दरम्यान पारिस्थितिकी तंत्र में सबसे बड़ा हिस्सा मनुष्य ने अपने कब्जे में रखा। 
पिछले दो-तीन दशकों से दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी जिस प्रजाति की बढ़ी है, वह मनुष्य ही है। पहले पारिस्थितिकी किसी भी प्रजाति की संख्या तय करती थी, लेकिन जब से मनुष्य ने अपने जीवन की रक्षा के लिए विशेष प्रयास शुरू किए हैं, दुनिया में उसकी संख्या तेजी से बढ़ती गई है। अदृश्य विषाणु और कीटाणु की बात यहां इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि वे हमेशा गौण स्थिति में रहे हैं और किसी छेड़छाड़ के बाद अपनी संख्या का प्रदर्शन कर पाते हैं। मनुष्य की अपने लिए जुटाने की भावना और अन्य जीवों को न समझने की मूर्खता का ही नतीजा है कि आज हम एक बड़े और अनोखे संकट में फंसे हुए हैं। 
19वीं शताब्दी की शुरुआत से लेकर आज तक हमने करीब 41 फीसदी उभयचर प्रजातियों को गंवा दिया। इतना ही नहीं, समुद्री जीवों को भी खतरे में डाल दिया। इसके अलावा,  दुनिया की 10 फीसदी कीट प्रजातियां अब हमारे बीच नहीं हैं। हमने समुद्र से भी 33 फीसदी कोरल रीफ को इस दुनिया से दूर कर दिया। इसी तरह, हमने करीब 90 फीसदी फसलों की प्रजातियों को पूरी तरह नष्ट कर दिया। 16वीं शताब्दी से आज तक नौ फीसदी पालतू जानवरों की प्रजातियां भी अब हमारे साथ नहीं हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, हम सभी तरह की करीब 80 लाख प्रजातियों को खो चुके हैं और लगभग 10 लाख खत्म होने के कगार पर हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि किस तरह हमने अपनी चारों तरफ प्रकृति के अन्य जीवों को दुनिया से विदा कर दिया है। ऐसा लगता है, हम अपनी बनाई मुसीबतों के साथ दुनिया में अकेले रह गए हैं।
समुद्र का हाल भी हमने बुरा कर दिया है। वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार माना जाता है कि समुद्र कार्बन उत्सर्जन का 60 फीसदी हिस्सा अवशोषित करते हैं, पर कार्बन उत्सर्जन के लगातार बढ़ने के कारण आज वहां भी 400 डेड जोन बन चुके हैं, मतलब अब इनमें जीवन नहीं दिखाई देते। वेटलैंड, यानी दलदली भूमि का किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान है, लेकिन पिछले 300 वर्षों में हमने दुनिया की 15 फीसदी दलदली भूमि गंवा दी है। औद्योगिक क्रांति के बाद वन भी 68 फीसदी घट गए हैं और वर्ष 1992 से 2000 के बीच लाखों हेक्टेयर वन को अपनी जरूरतों के चलते हमने स्वाहा कर दिया है। इसके बदले में वन लगाने की हमारी पहल लगभग शून्य के बराबर है। 
असल में, मानव ने कभी यह सोचा ही नहीं कि अन्य जीव-जंतु, जो प्रकृति ने हमारे साथ पैदा किए थे, उनका भी संतुलन में योगदान है। आज भी हमारा जीवन अगर प्राकृतिक दृष्टिकोण से सुरक्षित है, तो शायद अन्य जीवों के कारण ही। आज कोरोना की महामारी ने सबको यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया है कि पारिस्थितिकी तंत्र के प्रति जो हमारा कर्तव्य है, उसका निर्वाह किया जाना चाहिए। हम दरअसल, उनसे पूरी तरह से विमुख हो गए थे, इसीलिए हम आज एक ऐसे मोड़ पर आ गए हैं, जहां इसी प्रकृति का एक अंश अदृश्य रूप में हमारे बीच में आया और हमें यह सबक सिखा गया कि अन्य जीव भी दृश्य या अदृश्य होकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। प्रकृति के संदेश को समझ लें और यह स्वीकार कर लें कि पृथ्वी मात्र मनुष्य की नहीं, बल्कि सबकी है। ‘सबकी बात और सबका साथ’ नारा अपनाने की जरूरत है। यह नारा सिर्फ मनुष्य और उसके विकास तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें उन तमाम जीवों से जोड़कर देखे जाने की पहल करनी होगी, जिन्हें प्रकृति ने हमारे साथ पैदा किए। यह सब करने के बाद ही हम शायद इस पृथ्वी पर सुरक्षित रह सकेंगे और प्रकृति के कहर से स्वयं को बचा पाएंगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan Opinion column 5 may 2020