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1 जून, 2020|11:37|IST

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क्षेत्रीय गढ़ों की दरकती जमीन

इस आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की भारी जीत का विश्लेषण तमाम तरह से जारी है। इसका एक बहुत बड़ा कारक यह है कि राजनीति के जातीय समीकरणों में भाजपा ने एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है, जिसका दूरगामी असर भारतीय राजनीति में होगा। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद इसे देश का दूसरा बड़ा सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन कहा जा सकता है। 

मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई। ये क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादातर जनता पार्टी प्रयोग की टूट-फूट से बनी थीं या कांग्रेस के केंद्रीय आधिपत्य के विरोध में स्थानीय अस्मिता के सवाल पर खड़ी हुई थीं। इन पार्टियों का आधार मुख्य रूप से पिछड़ी जातियां थीं या बसपा की तरह दलित समूह थे। मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय भी भारत में अमूमन किसी पिछड़े समुदाय जैसा ही है, इसलिए मुलायम सिंह यादव या लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं के साथ मुसलमान भी जुडे़ थे। ऐसा लगने लगा था कि अब भारत की राजनीति का भविष्य इन्हीं क्षेत्रीय पार्टियों से जुड़ा है और कांग्रेस या भाजपा जैसी पार्टियों को अगर केंद्र में राज करना है, तो इन पार्टियों के साथ सत्ता में साझीदारी करनी पड़ेगी, और ज्यादातर राज्यों में उन्हें इन पार्टियों पर ही निर्भर होना पड़ेगा। लोकसभा में भाजपा ने पिछले चुनाव में भी पूर्ण बहुमत पाया था और अब ज्यादा बड़ा बहुमत पाया है। क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा को रोकने या उसे अपने ऊपर निर्भर बनाने में नाकाम रही हैं। इसकी एक बड़ी वजह इन पार्टियों के चरित्र में बदलाव है। 

कभी ये क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा व्यापक समूहों का प्रतिनिधित्व करती थीं। जैसे मुलायम सिंह के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी में तमाम पिछड़े समूह इकट्ठे थे। यादवों के अलावा राजभर, कुर्मी वगैरह जातियां भी उनके साथ थीं। यही स्थिति राजद की भी थी, जिसके साथ पिछड़ों के अलावा कुछ दलित जातियां भी थीं। इसी तरह, उत्तर प्रदेश में बसपा व्यापक रूप से दलितों की पार्टी थी, बल्कि देश भर के दलित उसकी ओर उम्मीद  से देखते थे। 

अब इन पार्टियों का आधार संकुचित होता दिख रहा है। अन्य पिछड़े या दलित समुदायों को यह शिकायत होने लगी कि इन पार्टियों में किसी एक जाति को विशेष तरजीह दी जा रही है और उनकी उपेक्षा हो रही है, या सत्ता के लाभ का बराबर बंटवारा नहीं हो रहा है। इन पार्टियों का नेतृत्व किसी एक बड़े नेता या परिवार के पास ही था, इसलिए उन पर यह आरोप लगने लगा कि वे अपनी जाति को ज्यादा महत्व देते हैं। धीरे-धीरे सपा और राजद की पहचान यादवों की पार्टी तक सिमट गई। बसपा भी उत्तर प्रदेश के जाटवों की पार्टी बन गई। कर्नाटक में देवेगौड़ा की पार्टी वोक्कलिगा की पार्टी हो गई। यह समस्या हर जगह दिखी। हरियाणा में चौटाला और हुड्डा परिवारों से यह शिकायत रही कि उनकी राजनीति जाटों तक सीमित है, तो महाराष्ट्र में कांग्रेस, राकांपा की राजनीति में मराठा वर्चस्व के खिलाफ असंतोष बढ़ने लगा। अपना जनाधार सीमित करके ये पार्टियां अपनी ताकत भी खोने लगीं। ताकत कम होने के अंदेशे से असुरक्षित होकर नेता अपनी बुनियाद यानी अपनी जाति से और ज्यादा जुड़ते गए, जबकि अन्य जातियां उनसे और ज्यादा छिटकने लगीं। समावेशी नीति बनाने और संसाधनों के वितरण का दायरा न्यायपूर्ण ढंग से बढ़ाने की बजाय ये पार्टियां अपने खास या अपेक्षाकृत ताकतवर लोगों को खुश करके राजनीति चलाती रहीं। सामाजिक न्याय की एक सुविधाजनक व्याख्या उन्होंने अपने लोगों को रेवड़ी बांटने की कर ली। प्रभाव का दायरा बढ़ाने की बजाय अपने लोगों के प्रति वफादारी उन्हें महत्वपूर्ण लगी, जिसका नतीजा अब दिख रहा है। 


ये पार्टियां अपेक्षाकृत शक्तिशाली जातियों के वर्चस्व वाली पार्टियां हैं, इसलिए सामाजिक-आर्थिक तौर पर बेहतरी की गुंजाइश भी इन जातियों के कुछ हिस्सों के लिए ज्यादा है। अक्सर जब लोग सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर बेहतर स्थिति में पहुंचते हैं, तब उन्हें जाति के संरक्षण की जरूरत उतनी नहीं रहती या उनकी वर्गगत पहचान जातिगत पहचान के मुकाबले कुछ अधिक मजबूत हो जाती है। ऐसे में, जरूरी नहीं कि वे अपनी जाति के आधार पर ही वोट करें। हो सकता है कि वे किसी और वजह से भाजपा या अन्य पार्टी को वोट दें। ऐसा पिछले चुनाव में देखने में आया है। समृद्धि और सत्ता के असमान वितरण से वर्चस्वशाली जाति के वंचित सदस्य भी असंतुष्ट हो सकते हैं, जैसा कि जाट और मराठों के आंदोलनों में देखने में आया है। ऐसे में, वे जाति के परंपरागत नेतृत्व से छिटक भी सकते हैं। इसके अलावा, लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, शरद पवार और एच डी देवेगौड़ा के प्रति लोगों की जो वफादारी है, वह तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, पार्थ पवार या निखिल देवेगौड़ा को विरासत में पूरी नहीं मिल सकती। 

भाजपा ने बहुत मेहनत से इन क्षेत्रीय पार्टियों से असंतुष्ट पिछड़ी और दलित जातियों के बीच काम किया और उनके असंतोष को ज्यादा हवा दी। इन छोटे-छोटे समूहों का कुल संख्या बल वर्चस्वशाली जातियों के वोटों से ज्यादा बैठता है। विकास में साझीदारी और हिंदुत्व के गोंद ने इन जातियों को भाजपा के उच्चवर्णीय आधार से जोड़ दिया। इसीलिए भाजपा ने जो मुख्यमंत्री बनाए हैं, उनमें वर्चस्वशाली पिछड़ी जातियां गायब हैं। उनमें कहीं ब्राह्मण, कहीं राजपूत, तो कहीं पंजाबी खत्री हैं, जो सब उच्चवर्णीय हैं। 

ऐसा नहीं है कि राजनीति में पिछड़ों और दलितों का महत्व घट गया है, लेकिन उनके राजनीतिक आधार के बंट जाने से उनकी ताकत कम हुई है और नेतृत्व भी उनसे छिन जाने का खतरा खड़ा हो गया है। भाजपा के हिंदुत्व की वजह से अल्पसंख्यक भाजपा विरोधी पार्टियों को वोट देने के लिए मजबूर हैं, पर विकल्प की इच्छा उनके मन में भी है। अपने आधार को विस्तृत करने के लिए इन पार्टियों के नेताओं को अपना संकुचित नजरिया बदलना होगा, सचमुच सामाजिक न्याय के सिद्धांत को अपनाना होगा और अपनी जाति के दायरे के बाहर देखना होगा। सामाजिक न्याय की लड़ाई अपने सुरक्षित और आरामदेह किलों में रहकर नहीं लड़ी जा सकती। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 30 May by Famous Cartoonist Rajendra Dhodapkar