फोटो गैलरी

अगला लेख

अगली खबर पढ़ने के लिए यहाँ टैप करें

Hindi News ओपिनियनसात दशक की सबसे बड़ी जमीनी जंग

सात दशक की सबसे बड़ी जमीनी जंग

यूक्रेन में लगा झटका वास्तविक है। यह 1940 के दशक के बाद का सबसे बड़ा भूमि युद्ध हो गया है, जो 15 महीने से जारी है। पूरी योजना उलट गई है। अमेरिका और नाटो ने इस विश्वास के साथ रूस-यूक्रेन विवाद में...

सात दशक की सबसे बड़ी जमीनी जंग
Amitesh Pandeyजोरावर दौलत सिंह, फेलो, सीपीआर, दिल्लीFri, 02 Jun 2023 10:02 PM
ऐप पर पढ़ें

यूक्रेन में लगा झटका वास्तविक है। यह 1940 के दशक के बाद का सबसे बड़ा भूमि युद्ध हो गया है, जो 15 महीने से जारी है। पूरी योजना उलट गई है। अमेरिका और नाटो ने इस विश्वास के साथ रूस-यूक्रेन विवाद में हस्तक्षेप शुरू किया था कि यह छद्म युद्ध यूरोप में रूसी प्रभाव को कम करने का एकमात्र तरीका है। इसका मकसद रूस को आकार में छोटा करना और विश्व में बहुध्रुवीय व्यवस्था को समाप्त करना भी था। कागज पर यह शैतानी न सही, पर एक चतुर रणनीति थी। अनुमान था कि नाटो हथियारों से लैस यूक्रेन जल्दी ही रूस पर भारी पड़ेगा। कम से कम पश्चिमी नीति-निर्माताओं ने यह अनुमान तो लगाया ही था कि रूस वर्षों तक एक और अफगानिस्तान में फंसा रहेगा, जबकि अमेरिका एक महाशक्ति के रूप में पुनर्जीवित होकर काबिज हो जाएगा। 
जो सोचा गया था, उसके उलट हो गया। यह छद्म युद्ध हर मोर्चे पर एक ऐसे संघर्ष में बदल गया, जिसे एक सीमित महायुद्ध के रूप में वर्गीकृत करना ज्यादा सटीक होगा। अमेरिका एक बड़े लक्ष्य लेकर चला था, पर अब उसके लक्ष्य में कमी आई है। इस बार विश्व समुदाय पश्चिम के पीछे लाइन लगाकर खड़ा नहीं हुआ, बल्कि ईमानदारी से दूर रहा है। रूस को बदनाम करने और अमेरिकी प्रतिबंधों को गले लगाने की नाटो की योजना के प्रति गजब का इनकार दिखा है। दूसरी ओर, ग्लोबल साउथ या गरीब, विकासशील देशों को अपने हितों को आगे बढ़ाने और एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के स्वागत का मौका मिल गया है। अब दुनिया के कमजोर देश भी प्रमुख देशों के साथ बेहतर सौदेबाजी कर सकते हैं। भारत की विदेश नीति को भी इस प्रवृत्ति के तहत देखा जा सकता है। आज दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, मध्य-पूर्व और यहां तक कि पूर्वी एशिया के कुछ हिस्सों में भी यह प्रवृत्ति देखी जा सकती है। 
महाशक्तियों का भू-राजनीतिक संतुलन बदलता हुआ लग रहा है। यह चीन की ओर झुकता हुआ लग रहा है और अमेरिका के सामने मुश्किलें बढ़ी हैं। वाशिंगटन ने मास्को और बीजिंग के बीच दरार पैदा करने की भी कोशिश की है, ताकि वह चीन के साथ नए पश्चिमी तालमेल का फायदा उठा सके। अमेरिकी नीति-नियंताओं ने रूस से चीन को दूर करने की कोशिश में शी जिनपिंग शासन को अंतरराष्ट्रीय अदालत में लाने की कवायद की है, मगर इसका बहुत कम फायदा हुआ है। ऐसा लगता है कि रूस के साथ अपनी साझेदारी को खतरे में डालने के लिए चीन तैयार नहीं है। ताईवान के संदर्भ में चीन को लगता है कि अमेरिका शायद उसके साथ भी वही करेगा, जो उसने रूस के साथ किया है। 
पश्चिमी हाथों में वास्तविक तुरुप का इक्का हमेशा से अर्थव्यवस्था ही रही है : अमेरिकी डॉलर का विरासती प्रभुत्व, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं पर उसका नियंत्रण और किसी पर सामूहिक प्रतिबंध लगाने की क्षमता। इसी वजह से अमेरिका को वास्तव में लगा कि वह न सिर्फ रूस को अस्थिर कर सकता है, बल्कि वैश्वीकरण का एक नया अध्याय भी लिख सकता है। फिर भी चौंकाने वाले नाटकीय प्रभाव सामने आए हैं। झटका रूस को लगने के बजाय यूरोप को ज्यादा लगा है। यूरोप में ऊर्जा व औद्योगिक संकट खड़ा हो गया और रूसी अर्थव्यवस्था पर वैसा असर नहीं हुआ, जैसा अमेरिका व नाटो ने चाहा था। आज यूरोपीय अर्थव्यवस्थाएं बढ़ती महंगाई से जूझ रही हैं। जर्मनी जैसे औद्योगिक दिग्गज देश मंदी की चपेट में आ गए हैं। वैश्विक प्रतिस्पद्र्धा में यूरोप पिछड़ रहा है। अर्थशास्त्री अब इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि यूरोपीय समृद्धि और औद्योगिक शक्ति के लिए रूसी उत्पाद व ऊर्जा कितनी महत्वपूर्ण थी। 
आखिर रूस कैसे बच गया, वह भी सरलता से? वस्तुत: नाटो के देश जो चाहते थे, उसका पालन गैर-पश्चिमी दुनिया ने नहीं किया। कई अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के साथ चीन और भारत ने पश्चिमी बाजारों की जगह ले ली। इससे रूस को नई जीवन रेखा मिली और अन्य देशों को सस्ती ऊर्जा से लाभ हुआ। अभी भी राजस्व से भरपूर मास्को अपनी आर्थिक स्थिरता के लिए जरूरी औद्योगिक घटकों, मशीनरी व उपभोक्ता वस्तुएं खरीदने में सक्षम है। अतीत में रूस के साथ जर्मनी की जो भूमिका थी, उसमें अब चीन उतर आया है। चीन के साथ रूस का व्यापार 2023 में 200 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
इस युद्ध ने पश्चिम के पूरे भू-राजनीतिक दांव पर सवाल उठा दिए हैं। प्रारंभिक चरण में रूस को गहरा झटका लगा, लेकिन बाद में मास्को ने अलग रणनीति अपनाई। उसने नए क्षेत्रों पर कब्जा करने की पारंपरिक कवायद के बजाय यूक्रेन में स्थित सैन्य ढांचे को नष्ट करना और नीचा दिखाना शुरू कर दिया। रूस विशाल खुले मैदानों में बड़े टैंकों से लड़ाई के साथ ही, यूक्रेनी मोर्चों पर सीधे हमला करने लगा। यूक्रेन के रणनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण शहरों व कस्बों में भीषण संघर्ष छेड़ दिया। रूस तमाम प्रमुख शहरी लड़ाई में जीत गया है, इससे उसे पूर्वी यूक्रेन में बढ़ने में मदद मिलेगी। साथ ही, रूस ने कीव सहित पूरे यूक्रेन में सैन्य, रसद,कीमती बुनियादी ढांचे पर हमले में अपनी आक्रामक मारक क्षमता का खूब इस्तेमाल किया है।
कुछ तथ्य उत्तरोत्तर स्पष्ट होते जा रहे हैं। यूक्रेनी सैन्य बल की बुनियाद काफी हद तक नष्ट हो गई है। नाटो अभी इस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। न केवल यूक्रेन, बल्कि नाटो देशों में भी एक बड़े और लंबे युद्ध को चलाए रखने की औद्योगिक क्षमता गंभीर रूप से घटी है। नाटो देशों ने 70 अरब डॉलर से अधिक की सैन्य सहायता भेजी है, जिसमें से अधिकांश हिस्सा अमेरिका से आया है। वास्तविक बाधा अब पश्चिमी उत्पादन क्षमता है, क्योंकि नाटो के योजनाकारों ने इतने लंबे युद्ध की उम्मीद नहीं की थी। आप विचार करके देखिए, रूस एक दोपहर में जितने गोले-बारूद दाग देता है, उतना गोला-बारूद बनाने में अमेरिका को दो महीने लग जाएंगे। 
नाटो की हथियार प्रणालियां कम पड़ गई हैं, जिन्हें युद्ध की दिशा बदलने के लिए तैनात किया गया था। रूसी सेना कम से कम निम्नलिखित क्षमताओं में नाटो से आगे दिखती है - वायु रक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, तोपखाने / काउंटर आर्टिलरी और हाइपरसोनिक मिसाइलें। चिंता बढ़ रही है, नाटो समर्थन से यूक्रेन यदि टकराव बढ़ाता है, तो जाहिर है, रूस भी तगड़े जवाबी हमले के लिए तैयार है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)