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10 अप्रैल, 2020|10:31|IST

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उम्मीदों और आशंकाओं का समझौता

विवेक काटजू, पूर्व राजदूत

अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं हुआ, तो आज दोहा (कतर) में अमेरिका और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच होने वाला समझौता ऐतिहासिक बन सकता है। समझौते में तालिबान अमेरिका को यह आश्वासन देंगे कि अफगानिस्तान में वे किसी भी अंतरराष्ट्रीय आतंकी गुटों (जैसे अल-कायदा, आईएस) का समर्थन नहीं करेंगे, वहीं अमेरिका अफगानिस्तान में मौजूद अपने सैनिकों की वतन वापसी की समय-सीमा तय करेगा। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका अपनी पूरी फौज को वापस बुला लेगा या कुछ हजार सैनिकों को आतंकवाद के खिलाफ मोर्चा लेने के लिए अफगान हुकूमत की मदद के वास्ते वहां छोड़ देगा। तालिबान ने बेशक यह घोषणा की थी कि वे किसी भी विदेशी सैनिक को अफगानिस्तान में बर्दाश्त नहीं करेंगे, मगर जानकार मानते हैं कि तालिबान भी कुछ अमेरिकी सैनिकों की गुप्त रूप से मौजूदगी पर संभवत: सहमत है, ताकि आईएस जैसी तंजीमों से मुकाबला करना आसान हो जाए।

इस समझौते के बाद जल्द ही तालिबान और अफगानी हुकूमत व मुल्क के अन्य राजनीतिक वर्गों के प्रतिनिधियों में भी वार्ता होने की उम्मीद है, जिसमें देश में अमन कायम करने और अफगानिस्तान के सांविधानिक व राजनीतिक भविष्य पर चर्चा होगी। चूंकि दोनों पक्षों की सोच में काफी अंतर है, इसलिए इस वार्ता में बुनियादी अड़चनें आएंगी। बहरहाल, बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले महीनों में तालिबान पूरी तरह से हिंसा का रास्ता छोड़ने को तैयार होंगे? अभी ठीक-ठीक यह कह पाना कठिन है, पर वे हिंसा कम करने पर शायद राजी हो जाएं। उम्मीद यह भी है कि आज अमेरिकी रक्षा मंत्री और नाटो के सेक्रेटरी जनरल काबुल में एलान करेंगे कि अफगानिस्तान को आने वाले वर्षों में पश्चिमी देशों की सहायता मिलती रहेगी, विशेष रूप से वे अफगानी फौज को समर्थन देते रहेंगे। इस पूरे घटनाक्रम का एक तार अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से भी जुड़ता है, जिसमें डोनाल्ड ट्रंप यह एलान करने की स्थिति में होंगे कि अफगान युद्ध समाप्त करने का वादा उन्होंने पूरा किया और अपने सैनिकों की वतन वापसी मुमकिन कराई। लेकिन यह सवाल बना रहेगा कि क्या आज के घटनाक्रम से अफगानिस्तान में शांति बहाल हो पाएगी?

चार दशक से भी अधिक समय से अफगानिस्तान अस्थिर है। 1973 में जबसे राजा जहीर शाह का तख्ता-पलट उनके चचेरे भाई दाऊद खान ने किया, तभी से यह देश अशांत है। पांच साल बाद 1978 में जहीर शाह और उनके परिवार को वामपंथी नेताओं ने मार डाला, जिससे सोवियत संघ सक्रिय हो गया और 25 दिसंबर, 1979 को अपनी सेना अफगानिस्तान में भेज दी। सोवियत संघ का मानना था कि वामपंथी नेता अफगानिस्तान में अपनी पकड़ मजबूत कर लेंगे, लेकिन अफगानियों ने विदेशी हस्तक्षेप को खारिज कर दिया। वह शीत युद्ध का जमाना था, लिहाजा अमेरिका ने मौका देखकर वियतनाम में अपनी शिकस्त का सोवियत संघ से बदला लेने का निश्चय किया। उसने सऊदी अरब जैसे अपने मित्र राष्ट्रों की मदद से पाकिस्तान के जरिए जेहादी गुटों की मदद की और सोवियत फौज को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। इसमें चीन ने भी गुप्त रूप से उनका साथ दिया।

सोवियत संघ को सन् 1989 में अपनी फौज वहां से वापस बुलानी पड़ी और 1992 में मुजाहिदीन गुटों ने पाकिस्तान से अफगानिस्तान में प्रवेश किया। तालिबान ने 1996 में पाकिस्तान की मदद से ही काबुल को अपने कब्जे में ले लिया। अगले पांच साल में न सिर्फ उन्होंने मुल्क को जर्जर बना दिया, बल्कि ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में अल-कायदा जैसे गुटों ने भी वहां जगह बना ली। 9/11 हमला अल-कायदा ने ही किया, जिसके जवाब में अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला बोल दिया और नवंबर 2001 को तालिबान व अल-कायदा के कमांडरों को भागकर पाकिस्तान में पनाह लेनी पड़ी।

इस तरह आज का समझौता सामरिक रूप से अमेरिका की हार का संकेत है। बीते 18 वर्षों में तालिबान और उनके समर्थक देश पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अमेरिका के दांत खट्टे ही किए। अमेरिका को मात इसलिए मिली, क्योंकि उसने तालिबान से केवल रक्षात्मक लड़ाई लड़ी। पाकिस्तान स्थित तालिबान के ठिकाने को व्हाइट हाउस खत्म ही नहीं कर सका। यहां यह देखना भी जरूरी है कि तालिबान में क्या बीते वर्षों में कुछ बदलाव आए हैं और क्या अफगानिस्तान का राजनीतिक वर्ग एकजुट रह पाएगा? कुछ ही दिन पूर्व अफगानिस्तान के चुनाव आयोग ने अशरफ गनी को सितंबर में हुए चुनाव में विजयी घोषित किया, पर उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला व उनके साथियों ने इस नतीजे को स्वीकार नहीं किया। लिहाजा अफगान का राजनीतिक वर्ग यदि एक नहीं रह पाया, तो तालिबान इसका बेजा फायदा उठा सकते हैं। डर यह भी है कि सियासी मतभेद से अफगान की फौज भी कहीं 1990 के दशक की तरह टूट न जाए? यदि ऐसा कुछ हुआ, तो अफगानिस्तान फिर से गृह युद्ध की ओर बढ़ जाएगा।

स्थिर अफगानिस्तान पूरे एशिया क्षेत्र की स्थिरता के लिए जरूरी है। मगर पाकिस्तान का मकसद काबुल में ऐसी सरकार बनाना रहा है, जो उसके मातहत काम करे। अफगानिस्तान के नेतागण व अवाम स्वतंत्र रहना चाहते हैं। ऐसे में, देखना यह होगा कि तालिबान क्या रुख अपनाता है? हां, भारतीयों के साथ जब भी तालिबान ने अनौपचारिक बातचीत की है, उन्होंने जोर देकर यही कहा कि वे पाकिस्तान के पिट्ठू नहीं हैं। आज समझौते के वक्त दोहा में भारत के राजदूत भी मौजूद रहेंगे। अभी तक नई दिल्ली ने औपचारिक रूप से तालिबान से बातचीत नहीं की है। मगर यह हमारी गलत नीति रही है। वक्त का तकाजा है कि पुरानी हिचक छोड़कर हम तालिबान से बात करें। इसका यह कतई मतलब नहीं है कि हमने उनके सिद्धांतों को सहमति दे दी है।

अफगानिस्तान में भारत की इज्जत है, क्योंकि हमने उसके अंदरूनी मामलों में कभी दखल नहीं दिया। यह नीति कायम रहनी चाहिए। अपने हितों की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि अफगान सरकार के साथ-साथ वहां की तमाम राजनीतिक इकाइयों से हमारे संबंध मजबूत रहें। इसके लिए हमें अफगानिस्तान को दी जा रही सभी मदद जारी रखनी होगी, जिसमें सामरिक क्षेत्र भी शामिल है। आज के घटनाक्रम से अफगानिस्तान में शांति बहाल होती है, तो पाकिस्तान की अनिच्छा के बावजूद हमारे हितों को लाभ होगा। इस्लामाबाद शायद ही अब तालिबान लड़ाकों को हमारे खिलाफ कर या करवा पाए। फिर भी, हमें सावधानी तो बरतनी ही होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 29th February 2020