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ओपिनियनमैं तो खेलूंगी श्याम संग फाग

सोनल मानसिंह, सुप्रसिद्ध नृत्यांगना व राज्यसभा सांसदPublished By: Manish Mishra
Sun, 28 Mar 2021 10:58 PM
मैं तो खेलूंगी श्याम संग फाग

होली शब्द सुनते ही मन अतीत में लौट जाता है। वे भी क्या दिन थे! मैं बंबई (अब मुंबई) में पली-बढ़ी हूं। वहीं मेरा जन्म हुआ, और करीब 18 साल तक मैं वहां रही। उम्र के हिसाब से हरेक होली में हमने खूब मस्ती की। हम बच्चे एक-दूसरे पर पानी भरे गुब्बारे फेंका करते थे। टेसू के फूल से रंगीन पानी बनाते थे। पानी की टंकी को ही रंग-बिरंगी कर देते थे। बहुत ही प्यार, दुलार और उल्लास से हम होली मनाया करते। पानी के हौद में रंग डालकर उसी में लेट जाते। चूंकि, गुजिया जैसे तमाम विशेष मिष्ठान्न घर में ही बनते थे, तो बनते-बनते ही वे आधा हम बच्चों के पेट में गायब हो जाते थे। उन दिनों में बचपना हम सब पर तारी था।
अब वह अंदाज नहीं रहा। अब तो रंगों से लेकर खान-पान तक, सब कुछ बाजार तय करने लगा है। उस वक्त ‘ऑर्गेनिक’ जैसे शब्द चलन में नहीं थे, क्योंकि सारे रंग ऑर्गेनिक ही हुआ करते थे। लेकिन अब टेसू के पेड़ कहां दिखते हैं! होली अब बहुत बदल गई है। फिर भी, मैं यही मानती हूं कि आभासी होली कोई नहीं खेल सकता। ‘वर्चुअल’ तरीके से खेलना भी नहीं चाहिए। इस दिन घरों से जरूर बाहर निकलें। धूप में जाएं। सूर्यदेव को नमस्कार करें और एक-दूसरे को रंग लगाएं। आजकल के बच्चे वैसे भी धूप का सेवन नहीं करते, जिसके कारण उन्हें विटामिन-डी की गोलियां निगलनी पड़ती हैं। अभी भले ही कोरोना का संक्रमण फिर से बढ़ने लगा हो, लेकिन मुंह पर मास्क बांधकर भी होली खेलें। अपने परिवार व अगल-बगल के साथ खूब मस्ती करें, क्योंकि जीवन अब बहुत गंभीर हो गया है। बोझिल जिंदगी को हल्का बनाने के लिए होली का पूरा मजा लें। वैसे, होली सिर्फ मस्ती और उल्लास का पर्व नहीं है। यह त्योहार हमें कई सीख भी देता है। पौराणिक कथाएं कहती हैं कि होलिका के जलने और भक्त प्रह्लाद के अग्नि से बच निकलने की खुशी में होली मनाते हैं। यह घटना सबक है कि दुष्टता पर हमेशा सद्गुण की जीत होती है। दूसरा सबक यह है कि अहंकार मनुष्य को मारता है। अहंकार किसी शक्तिशाली और बलशाली को भी घुटने पर ला देता है। तीसरा संदेश है, ईश्वरीय शक्ति के ऊपर कुछ नहीं है, इसलिए हमें इसके शरणागत हो जाना चाहिए। चौथी सीख, अगर हमें कोई वरदान हासिल है, तो उसका उपयोग अच्छे कामों में किया जाना चाहिए। आज के संदर्भ में वरदान का अर्थ है, हर मनुष्य को मिला खास कुदरती गुण। इसका सदुपयोग होना चाहिए, न कि दुरुपयोग। और आखिरी बात, अंधकार हमेशा नहीं रहता, प्रकाश उसे खत्म करता ही है। होली से एक दिन पूर्व हम होलिका जलाते हैं। होलिका जब जल जाती है, तब अग्निदेव को प्रणाम करते हैं, उनका पूजन करते हैं और रंग की शुरुआत करते हैं। यानी, होली आसुरी ताकतों पर दैवीय शक्तियों के विजय का पर्व भी है।
कुछ लोग होली को छेड़छाड़ से जोड़ते हैं। आज के सतही संगीत की चर्चा बेमानी है, लेकिन वाराणसी की होली में, बृज की होली में या बिहार-राजस्थान की होली में जो पुराने गीत गाए जाते हैं, उनमें गालियों का प्रयोग भले ही आज हमें अभद्र लगे, लेकिन वे गीत दरअसल मन का गुबार निकालने का माध्यम होते थे। महिलाएं भी इनमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। वे खूब गाना गाती थीं, नाचती थीं और जमकर इजहार करती थीं। इस तरह, वे अपने मन की भड़ास निकाल लेती थीं। सब इसे मजाक में लेते थे। कोई दिल से नहीं लगाता था। यह मनोवैज्ञानिक चुनौतियों से पार पाने का तरीका था। शास्त्रीय नृत्य-संगीत या साहित्य भी इन सबसे अछूता नहीं रहा है। आज भी अगर कोई बृज में पारंपरिक होली मनाता है, राजस्थान के फाग गाता है, बरसाने की लट्ठमार होली खेलता है या घूमर जैसे नृत्य करता है, तो माहौल कहीं अधिक रस से सराबोर हो जाता है। भरतनाट्यम् भले ही दक्षिण भारत की नृत्य शैली हो और वहां उत्तर भारत की तरह होली नहीं मनाई जाती हो, लेकिन हमने इसमें भी रंगों को शामिल किया है। मत मारो पिचकारी श्याम तोहे देऊंगी मैं गारी  या मैं तो खेलूंगी श्याम संग फाग  जैसे गीतों पर भी हमने भरतनाट्यम् और ओडिसी की प्रस्तुतियां दी हैं। 
बेशक आज शास्त्रीय संगीत का वह दौर नहीं रहा। यामिनी कृष्णमूर्ति, सरोजा वैद्यनाथन, पद्मा सुब्रमण्यम जैसे हम लोग या यूं कहें कि हमसे भी पहले की बाला सरस्वती, शांता राव, कमला लक्ष्मण या रुक्मिणी देवी जैसी नृत्यांगनाओं वाला वक्त आज नहीं है। लेकिन हर दौर में शास्त्रीय संगीत की आत्मा वही है, व्याकरण वही है और उद्देश्य भी। हमारे समय में टीवी नहीं था। यदि था भी, तो गिने-चुने घरों में। सोशल मीडिया जैसे शब्द तो बने भी नहीं थे। उस समय कानों-कान हमारी कला का प्रचार होता था, जिसका प्रभाव आज के अत्याधुनिक संचार साधनों की तुलना में कहीं ज्यादा था। कलाकारों के लिए यह काफी मायने रखता था। उस समय यह चिंता नहीं होती थी कि कोई अंगूठा ऊपर या नीचे करके हमें आंकेगा। हम अपना प्रत्येक कार्यक्रम आखिरी मानकर करते थे और दर्शकों की वाहवाही लूटते थे। अब फेसबुक, यू-ट्यूब जैसे मंचों पर खुद को साबित करना पड़ता है। अनगिनत लोग यहां अपनी कला का प्रदर्शन जरूर कर रहे हैं, लेकिन इसकी गारंटी नहीं है कि उन्हें कल याद किया जाएगा, जबकि हम लोग आज भी कलाप्रेमियों के जेहन में बसते हैं। यह इसलिए संभव हुआ, क्योंकि दर्शक और कलाकार, जब आमने-सामने होते हैं, तब उनके बीच ऐसा सूत्र बनता है, जो दिल को बांधता है। यह टीवी, कंप्यूटर देखकर नहीं हो सकता। इसी डोर में होली भी हम सबको बांधती है। इसलिए हम खूब होली खेलें। कल रात होलिका में हमने अपनी नकारात्मकता और निराशा की आहूति दे दी होगी। आज का दिन रंगों का है। हम यही मानकर होली खेलें कि हमारा जीवन भी रंग-बिरंगा रहे, और दूसरों के जीवन में भी हम रंग बिखेरते रहें।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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