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दुनिया बदल सकती है यह दोस्ती

शशांक, पूर्व विदेश सचिवPublished By: Naman Dixit
Wed, 28 Jul 2021 11:27 PM
दुनिया बदल सकती है यह दोस्ती

जनवरी, 2021 में जो बाइडन के राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के बाद यह तीसरा मौका था, जब अमेरिकी सरकार का कोई वरिष्ठ नेता भारत आया। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन कल देर शाम नई दिल्ली से कुवैत की ओर रवाना हो चुके हैं, लेकिन उनसे पहले रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और जलवायु परिवर्तन मामलों पर अमेरिकी राष्ट्रपति के विशेष दूत जॉन कैरी की भारत यात्रा यह  संकेत दे चुकी है कि बाइडन सरकार नई दिल्ली को कितनी अहमियत दे रही है।
ब्लिंकन का यह दौरा द्विपक्षीय संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय रिश्तों की दशा-दिशा तय करने वाला माना जाएगा। हिंद प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के अलावा अफगानिस्तान में क्षेत्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर कहीं अधिक मजबूती से मिलकर काम करने की सहमति बनी है। ऐसा माना जा रहा है कि अफगानिस्तान बातचीत का केंद्र रहा, क्योंकि अमेरिका जिस तरह से वहां से निकला है, उससे भारत भी चिंतित है। रात के अंधेरे में अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान छोड़ा और हवाई जहाज से वे अपने देश के लिए रवाना हुए। भले ही अमेरिका ने अफगान हुकूमत को इसके बारे में स्पष्ट कर दिया था, लेकिन छिपते-छिपाते अमेरिकी फौज की रवानगी कई एशियाई देशों को वियतनाम युद्ध की याद दिला गई। सन 1975 में साइगॉन (हो ची मिन्ह शहर) से अमेरिकी फौज अपने दामन पर हार का दाग लेकर इसी तरह लौटी थी। अफगानिस्तान से उसकी घर वापसी को भी कई देश इसी रूप में देख रहे हैं। भारत के साथ दिक्कत यह है कि अफगानिस्तान के बुनियादी ढांचे के निर्माण और व्यापार परियोजनाओं में उसने तकरीबन तीन अरब डॉलर का निवेश कर रखा है। इतना ही नहीं, नई दिल्ली ने वहां के सभी 34 प्रांतों में 400 से अधिक परियोजनाएं शुरू की हैं। चूंकि वहां अब तक कोई स्थिर सरकार का गठन नहीं हो सका है और तालिबान अपने प्रभाव क्षेत्र के लगातार बढ़ने का दावा कर रहा है, इसलिए नई दिल्ली इन विकास-कार्यों के भविष्य को लेकर चिंतित है। एक तर्क यह दिया जा सकता है कि तालिबान शायद इन परियोजनाओं को नुकसान न पहुंचाए, मगर जिस तरह से पाकिस्तान लगातार भारत के बारे में दुष्प्रचार कर रहा है और अमेरिकी फौज की वापसी को भारत की हार के रूप में दुष्प्रचारित कर रहा है, उससे खतरा यह है कि कहीं पाकिस्तानपरस्त आतंकवादी तालिबान की आड़ में इन विकास-कार्यों के लिए खतरा न बन जाएं। नई दिल्ली वाशिंगटन से यह भरोसा चाहता है कि वह अफगानिस्तान को उसके हाल पर छोड़ देने के बजाय एक ठोस रणनीति के  तहत उसकी मदद करता रहे।
भारत और अमेरिका के रिश्ते में ‘क्वाड’ भी काफी अहमियत रखता है। भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान से मिलकर बना यह संगठन अभी भले ही वैधानिक जामा नहीं पहन सका है, लेकिन इसने चीन के साथ तनाव बढ़ने पर अपनी सुरक्षा और आर्थिक संबंधों को तेजी से मजबूत बनाना शुरू कर दिया है। मार्च, 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसकी एक वर्चुअल मीटिंग बुलाई थी, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान के शासनाध्यक्ष क्रमश: स्कॉट मॉरिसन, नरेंद्र मोदी और योशीहिदे सुगा ने ऑनलाइन शिरकत की थी। उस बैठक में उन्होंने कोविड-19 टीके को लेकर एक कार्य-समूह का गठन किया था और तय किया था कि जापान की आर्थिक मदद व ऑस्ट्रेलिया की लॉजिस्टिक सहायता से भारत हिंद प्रशांत के देशों के लिए अमेरिकी वैक्सीन की एक अरब खुराक बनाएगा। जॉनसन ऐंड जॉनसन में तकनीकी गड़बड़ियों की वजह से टीका-निर्माण में देरी का आशंका पैदा हो गई है, लिहाजा नई परिस्थिति में इस निर्णय को किस कदर साकार किया जाएगा, इस पर भी ब्लिंटन से चर्चा हुई होगी। कोरोना के डेल्टा प्लस वेरिएंट के बढ़ते मामले और हिंद प्रशांत के देशों में भारत के शामिल होने के कारण नई दिल्ली वैक्सीन-निर्माण को लेकर ज्यादा सक्रियता दिखा रही है। भारत हरसंभव उत्पादन करने के लिए तैयार है, लेकिन उसे इसके लिए कच्चे माल की जरूरत है, जो अमेरिका ही मुहैया करा सकता है। वैसे, क्वाड से अमेरिका के हित भी खासा जुड़े हुए हैं। दो महासागरों को समेटने वाला हिंद प्रशांत क्षेत्र अमेरिका के समुद्री हितों को बखूबी पूरा करता है। 2019 में इन महासागरों से 19 खरब डॉलर मूल्य का अमेरिकी व्यापार गुजरा। संयुक्त राष्ट्र की मानें, तो इस साल दुनिया के कुल निर्यात के 42 फीसदी और आयात के 38 फीसदी उत्पाद यहां से गुजर सकते हैं। स्वाभाविक है, इस कारोबार का एक बड़ा खिलाड़ी अमेरिका होगा।
ब्लिंकन के इस दौरे में हथियारों की खरीद का मसला भी उठा होगा और भारत में कथित मानवाधिकार हनन का भी। मगर ये ऐसे मसले हैं, जो हरेक बातचीत का हिस्सा तो होते हैं, लेकिन इन पर काई खास गंभीरता नहीं दिखाई जाती। अलबत्ता, अमेरिका में भारतवंशियों को होने वाली दिक्कतें अब आपसी बातचीत का मुख्य मसला बनती जा रही हैं। अमेरिका की वीजा नीति पर भारत सवाल उठाता ही रहता है, अब अनिवासी भारतीयों पर होने वाले नस्लीय हमले भी चिंता की वजह बन गए हैं। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि एशियाई मूल के लोगों के खिलाफ किसी तरह की शारीरिक या भावनात्मक हिंसा नहीं होनी चाहिए। अच्छी बात है कि बाइडन प्रशासन भी इस दिशा में संजीदा है और अनिवासी भारतीयों ही नहीं, तमाम प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कह रहा है। कुल मिलाकर, ब्लिंकन की यह यात्रा कई मायनों में उल्लेखनीय साबित हुई है। विदेश मंत्री बनने के बाद वह पहली बार भारत आए थे और यहां उन्होंने बाइडन प्रशासन का यह मंत्र दोहराया कि अमेरिका और भारत के बीच संबंधों को मजबूत करने का सिलसिला जारी रहना चाहिए। इसमें किसी तरह की कोई रुकावट नहीं आनी चाहिए। अच्छी बात है कि भारत सरकार की तरफ से भी उन्हें सकारात्मक जवाब मिला है। दोनों देशों की यह जुगलबंदी आने वाले दिनों में वैश्विक व्यवस्था को कई रूपों में प्रभावित कर सकती है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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