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26 जनवरी, 2021|1:24|IST

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अपेक्षा और उपेक्षा के बीच फंसे हम

पिछली तीन शताब्दियों में राज्य बहुत शक्तिशाली हुआ है। इस शक्ति ने जहां उसे नागरिकों की जिंदगी में दखल देने के असीमित अधिकार दे दिए हैं, वहीं उसकी हद में रहने वाले निवासियों की अपेक्षाएं भी इस सीमा तक बढ़ गई हैं कि सुरक्षा, परिवहन, शिक्षा या स्वास्थ्य जैसे हर मसले पर वे राज्य के सकारात्मक हस्तक्षेप की उम्मीद करने लगे हैं। यह राज्य के प्रभावी दखल का ही नतीजा है कि कोविड-19 महामारी पूर्व की प्लेग, हैजा या सौ साल पहले फैली स्पेनिश फ्लू जैसी बीमारियों सा तांडव नहीं कर सकी। पुराने अनुभवों के अनुसार, दशकों में तैयार होने वाला टीका भी एक वर्ष से कम में तैयार हो गया। भारत में भी पिछले कुछ वर्षों में राज्य शक्तिशाली तो हुआ और नागरिकों की अपेक्षाएं भी बढ़ीं, पर दोनों के बीच के द्वंद्व से बड़ी दिलचस्प स्थितियां भी पैदा होती रही हैं।
पिछले एक हफ्ते में कई सौ यात्री लंदन से भारत आए और आशंका के अनुसार उनमें से कुछ कोरोना पॉजिटिव भी निकले। हवाई अड्डों पर उनकी जांच और संक्रमित मरीजों को अस्पताल तक ले जाने के लिए एंबुलेंस की व्यवस्था भी थी। लेकिन अमृतसर, दिल्ली या बेंगलुरु हवाई अड्डों पर जो कुछ हुआ, वह भयावह हद तक मनोरंजक था। दुनिया के किसी भी सभ्य समाज में एक मरीज की सबसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होगी कि जैसे ही उसे पता चलेगा, वह बीमार है; वह तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहेगा। यहां कुछ ऐसा हुआ कि बहुत से मरीजों को जब खुद के कोरोना पॉजिटिव होने का पता चला, तब वे सामने खडे़ डॉक्टरों से मुंह चुराकर भाग खडे़ हुए। यह अविश्वसनीय व्यवहार जनजातीय इलाकों के भोले-भाले निवासियों का नहीं, बल्कि विलायत पलट महानगरों में रहने वालों का था। पर ध्यान से देखें, तो यह काफी हद तक स्वाभाविक भी था।
कोरोना-काल कई अर्थों में देश की स्वास्थ्य सेवाओं के लिए चुनौती जैसा रहा। पहले चक्र में ही स्पष्ट हो गया था कि पिछले सत्तर वर्षों में हमने चिकित्सा-क्षेत्र में जरूरी निवेश नहीं किया है और हमारी सुविधाएं किसी बड़ी महामारी के दौरान भारी संख्या में मरीजों की देखभाल करने में समर्थ नहीं हैं। दूसरा दौर उन उपकरणों के अभाव की शिनाख्त का था, जो किसी संक्रामक रोग से लड़ने के लिए जरूरी हैं। इसे राज्य की शुरुआती सफलता कहेंगे कि कुछ हफ्तों में ही अस्पतालों में बेड, वेंटीलेटर या डॉक्टरों के लिए पीपीई किट जैसी जरूरी सामग्रियां जुटा ली गईं, पर उस खौफ का क्या करेंगे, जिसके चलते मरीज डॉक्टर को देखते ही भाग खडे़ होते हैं! सन 1950 या 60 के दशक में कुंभ जैसे बडे़ मेलों में खौफनाक सी दिखने वाली हैजे की सूइयों को देखकर कांपते-भागते ग्रामीणों के चित्र देखकर हंसने वाले शहरी खुद भी कोरोना अस्पतालों को देखकर क्यों भाग रहे हैं, इसे समझने के लिए चंद उदाहरण काफी हैं।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में राज्य के मंत्री और पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान को जब अस्पताल कर्मियों के व्यवहार का सीधा अनुभव हुआ, तो वह वहां से भाग खड़े हुए और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के एक निजी अस्पताल में भर्ती हुए। दुर्भाग्य से वह वहां भी जीवित नहीं बचे, पर जिन कारणों से सरकारी अस्पताल से भागे थे, उनसे तो उन्हें छुट्टी मिली ही होगी। इन कारणों को समझना हो, तो पूर्व आईएएस अधिकारी और जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर के अनुभवों को पढ़ना उचित होगा। 
हर्ष कोरोना मरीज के रूप में राजधानी के एक राष्ट्रीय महत्व के संस्थान में भर्ती हुए। उनके दिल दहलाने वाले अनुभव सोशल मीडिया पर गश्त कर रहे हैं और बकौल उनके ये आधी से भी कम तकलीफों को बयां करते हैं। इनके मुताबिक, इस संस्थान के लिए मरीज भेड़-बकरी से अधिक कुछ नहीं हैं। उन्हें वार्ड रूपी जेलों में भर्ती करके संस्थान के कर्मचारी गायब हो जाते हैं। होटलों के बंद होने से बेरोजगार हुए बैरों को इन वार्डों में सेवा के लिए भर्ती कर लिया गया है, जो बिना किसी प्रशिक्षण, पापी पेट के लिए अपनी जान हथेली पर रखकर, मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रहे हैं। लगभग हर दूसरे दिन किसी न किसी न्यूज चैनल पर कोरोना ज्ञान बांटते इस संस्थान के निदेशक से पूछा जाना चाहिए कि वे मोटे-मोटे वेतन पाने वाले अपने डॉक्टरों और नर्सों को मरीज देखने के लिए क्यों नहीं मजबूर कर सकते? अगर महंगे सुरक्षा उपकरणों से लैस होकर भी इनकी जान खतरे में है, तो निजी अस्पतालों के कर्मी कैसे मरीजों को देखते हैं या अप्रशिक्षित गरीब होटल बैरों की जान की क्या कोई कीमत नहीं है? यह भी पूछा जा सकता है कि मरीजों के वार्डों में सफाई क्यों नहीं होती या जनता की गाढ़ी कमाई से खरीदे गए वेंटीलेटर काम क्यों नहीं करते? पर इन सवालों को पूछ सकने में सक्षम प्रभु वर्ग तो खुद के कोरोना ग्रस्त होते ही निजी अस्पतालों की ओर लपकता है।
भारतीय नागरिकों की राज्य से अपेक्षाएं और राज्य की संस्थाओं से हासिल होने वाली निराशा दिन-प्रतिदिन इसलिए भी बढ़ रही है, क्योंकि लोकतंत्र ने उनकी उम्मीदें बढ़ा तो दी हैं, पर उसी रफ्तार से संस्थाओं का प्रदर्शन नहीं सुधरा है। आप किसी भी सरकारी दफ्तर में जाएं, आम जनता अभी भी याचक है। पुलिस साधारण नागरिक के साथ दुव्र्यवहार करती है और आदतन मुकदमे नहीं लिखती, सरकारी विद्यालयों में शिक्षक अपवाद-स्वरूप ही पढ़ाते हैं या दफ्तरों में कर्मचारियों को देर से आकर भी काम न करते और गप्प लड़ाते देखकर किसी को आश्चर्य नहीं होता। आम आदमी की मुसीबतें इसलिए भी बढ़  जाती हैं कि निजी क्षेत्र सिर्फ मुनाफे के लिए काम करता है और अधिक धन कमाने के वास्ते कुछ भी कर सकता है। निजी अस्पताल या शिक्षण संस्थान आम जन की पहुंच के बाहर हैं।
यह एक सभ्यता-संबंधी समस्या है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि मनुष्य हमारी चिंता के केंद्र में कब आएगा? अगले कुछ वर्षों में हम विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था होंगे, पर तब भी मानव विकास के सूचकांक पर दुनिया के निचले पायदान पर शायद सबसे पिछडे़ मुल्कों के साथ खड़े होंगे। 21वीं शताब्दी की तीसरी दहाई कुछ ही दिनों में शुरू होने जा रही है, तो क्या हमें प्रयास नहीं करना चाहिए कि जनता की बढ़ती अपेक्षाओं के अनुकूल सरकारी संस्थाओं का आचरण भी एक सभ्य समाज के अनुकूल हो? निस्संदेह, यह हमारे इतिहास की एक लंबी और मुश्किल यात्रा होगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:hindustan opinion column 29 december 2020