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7 अप्रैल, 2020|6:40|IST

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समाज के तनाव में फेक न्यूज

पवन दुग्गल

सोशल मीडिया पर फेक न्यूज, यानी फर्जी खबरें पहले ही कम नहीं थीं, पर दिल्ली में हुए दंगों से पहले और बाद में तो जैसे इनकी बाढ़ ही आ गई। हालात बिगाड़ने में इसकी भूमिका कमतर नहीं मानी जा रही। स्थिति यह है कि हर व्यक्ति कहीं न कहीं से गलत इलेक्ट्रॉनिक सूचनाएं हासिल कर रहा है और धड़ल्ले से उसका प्रसारण करके उसे बढ़ावा दे रहा है। मगर इसका बेजा फायदा वे लोग उठा रहे हैं, जिनका इससे स्वार्थ जुड़ा है। जाहिर है, देश और समाज फर्जी खबरों की बड़ी कीमत चुका रहे हैं। समस्या यह है कि फर्जी खबरों से निपटने के लिए हमारे पास कोई खास कानून नहीं है। फिलहाल सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी ऐक्ट) व भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) ही बतौर विकल्प उपलब्ध हैं।

फर्जी खबरों का मतलब होता है, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड। जब कोई इसे तैयार करता है, तो आईपीसी की धारा-469 के तहत उस पर मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। मगर यह प्रावधान तब लागू होता है, जब उस फर्जी खबर से किसी की मानहानि हो। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके किसी के साथ यदि धोखाधड़ी की जाती है, तो वह कहीं ज्यादा गंभीर व दंडनीय अपराध माना जाता है। तब आईपीसी की धारा-468 के तहत मामला दर्ज किया जाता है, जिसमें सात साल तक के कारावास का प्रावधान है। लेकिन बीते कुछ समय से यह देखने में आया है कि फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के मामले में हमारी पुलिस अमूमन आईपीसी की  धारा-468 या 469 का इस्तेमाल नहीं करती। यही कारण है कि फेक न्यूज के अपराध में शायद ही कोई  जेल जाता है।

कोढ़ में खाज यह है कि फर्जी वीडियो या खबरों को प्रसारित करके लोगों को उकसाने वालों पर कानूनी प्रावधान लागू ही नहीं होता। वर्ष 2008 में आईटी ऐक्ट 66-ए के तहत लोगों को गुमराह करने वाली जानकारियों का प्रचार-प्रसार दंडनीय अपराध तय किया गया था। मगर 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने श्रेया सिंघल व अन्य की जनहित याचिकाओं को स्वीकार करते हुए इसे असांविधानिक घोषित कर दिया। हां, आईटी ऐक्ट 67 के तहत पुलिस जरूर कार्रवाई कर सकती है, लेकिन यह प्रावधान मूलत: अश्लील सामग्रियों के ऑनलाइन प्रकाशन-प्रसारण के संदर्भ में है।   
यह हालत तब है, जब ‘डीप फेक’ के रूप में कहीं गंभीर चुनौती अपने यहां पांव पसार चुकी है। ‘डीप फेक’ में तकनीक झूठ को इतना ताकतवर बना देती है कि नंगी आंखों से उसकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इसमें किसी वीडियो में आवाज आदि बदलकर उसे इस तरह से नया रूप दिया जाता है कि आम आदमी के लिए उसे झुठलाना मुश्किल हो जाए। अव्वल तो देश में फर्जी खबरों से लड़ने के लिए कानून का अभाव है, फिर तकनीक दिनोंदिन उन्नत हो रही है, नतीजतन असामाजिक तत्व निर्भीक होकर इंटरनेट पर अपना एजेंडा चलाते हैं। देश के नीति-नियंताओं को यह संकल्प लेना होगा कि भारत को हम फेक न्यूज या डीप फेक की प्रयोगशाला नहीं बनने देंगे। अब इन पर अंकुश लगाना बहुत जरूरी हो गया है।

अभी तो महज शुरुआत है। वक्त बीतने के साथ इसके इतने घिनौने रूप आएंगे कि हमारा आपसी सौहार्द खत्म हो सकता है। आदर्श स्थिति तो यह है कि इन सबको रोकने के लिए खास कानून बनाया जाए और फर्जी खबरों के प्रकाशन-प्रसारण को घिनौना दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। मलेशिया ने हाल ही में ऐसा किया है। मगर इसके साथ-साथ हमें पुलिस महकमे और अपनी न्यायपालिका की क्षमता भी बढ़ानी होगी। देश के नेतृत्व को यह एहसास होना चाहिए कि फेक न्यूज या डीप फेक ऐसा जहर है, जो आम लोगों को धीरे-धीरे जहरीला बना रहा है। दिल्ली दंगे के संदर्भ में ही असली वीडियो के साथ फर्जी वीडियो खूब प्रसारित किए गए। इन वीडियो के सहारे लोगों को जमकर उकसाया गया। अन्य संवेदनशील मामलों में भी हमने ऐसा ही देखा है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि विकल्पहीनता की स्थिति में इंटरनेट सेवा रोक देने के उपाय अपनाए जाते हैं। मगर यह ठोस समाधान नहीं है। बल्कि यह कदम कितना नुकसानदेह हो सकता है, मिस्र इसका उदाहरण है। वहां की सरकार ने जैसे ही इंटरनेट सेवा बंद की, ‘अरब स्प्रिंग’ की शुरुआत हो गई और हुकूमत का तख्ता-पलट कर दिया गया। अपने यहां तो अब जीवन जीने के मौलिक अधिकार में इंटरनेट का इस्तेमाल शामिल कर लिया गया है। ऐसे में, बहुत ज्यादा दिनों तक इंटरनेट सेवा बंद रखना संभव नहीं। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक जानकारी जरूर रोकी जा सकती है, मगर वह भी तब, जब देश की अखंडता, प्रभुता और सुरक्षा के लिहाज से ऐसा करना आवश्यक हो, सार्वजनिक कानून-व्यवस्था को खतरा हो या फिर किसी कानून के उल्लंघन को रोकने की जरूरत पड़े। फिर, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जरूरी यह भी है कि इंटरनेट बंद करते ही सरकार इसकी वजह आम लोगों के बीच प्रसारित करे।

स्पष्ट है, फर्जी खबरों को रोकने के लिए हमें विशिष्ट कानून बनाने ही होंगे। जब तक यह नहीं होता, तब तक आईटी ऐक्ट-67 का इस्तेमाल किया जा सकता है, ताकि संवेदनशील इलाकों में भड़काऊ वीडियो प्रसारित नहीं हो पाएं। सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म पर भी यह दबाव बनाया जा सकता है कि फर्जी वीडियो या खबरों की जानकारी मिलते ही वे तुरंत उसे डिलीट करें। फिलहाल अदालती आदेश द्वारा ही ऐसा करना मुमकिन है, जो कि एक लंबी प्रक्रिया होती है। फर्जी खबरों का नुकसान तुरंत होता है, इसलिए इसे रोकने के उपाय भी जल्द अमल में लाए जाने चाहिए। नया कानून जब बनेगा तब बनेगा, फिलहाल तो मौजूदा कानूनी प्रावधानों का ही सकारात्मक इस्तेमाल जरूरी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Hindustan Opinion Column 28th February 2020