फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियनलेखन से भी बड़ा काम मनुष्य होना

लेखन से भी बड़ा काम मनुष्य होना

आपने क्या किसी प्रिय की मृत्यु की कामना की है? मैंने कम से कम एक मामले में बड़ी शिद्दत से चाहा है कि उस जीवन का अंत हो ही जाए, जिससे मेरी अनगिनत खुशगवार यादें जुड़ी रही हैं। कई बार मृत्यु मुक्ति का...

लेखन से भी बड़ा काम मनुष्य होना
Pankaj Tomarविभूति नारायण राय, साहित्यकार व पूर्व कुलपतिMon, 27 Nov 2023 10:49 PM
ऐप पर पढ़ें

आपने क्या किसी प्रिय की मृत्यु की कामना की है? मैंने कम से कम एक मामले में बड़ी शिद्दत से चाहा है कि उस जीवन का अंत हो ही जाए, जिससे मेरी अनगिनत खुशगवार यादें जुड़ी रही हैं। कई बार मृत्यु मुक्ति का पर्याय बन जाती है और इस बार भी यही होने जा रहा था। 17 नवंबर की सुबह फोन पर आवाज सुनाई दी कि आपके चालीस साल पुराने दोस्त चले गए, तो मुझे यही एहसास हुआ। यह हिंदी के रचनाकार से रा यात्री या सेवा राम यात्री की रात में सोते-सोते चले जाने की सूचना थी, जो न जाने क्यों दुख से अधिक तकलीफ से छुटकारे की अनुभूति करा रही थी।
उनका चले जाना, कई तरह की स्मृतियां लेकर आया था। मृत्यु को लेकर हर परंपरा अंततोगत्वा किसी दार्शनिक उलझन में फंसती रही है। हमारे यहां भी किसी के अंत पर कहा जाता है कि वे चले गए। मेरे और उनके बीच अक्सर यह शरारती नोक-झोंक होती रहती थी। कहां चले गए? फिर यह पूछा जाता कि कहां से आए थे या आए ही क्यों थे? उर्दू शायर जौक के शेर की यह पंक्ति दोहराई जाती कि न अपनी खुशी से आए न अपनी खुशी चले।  यात्री जी संशयवादी आस्तिक थे और मैं घनघोर नास्तिक, सो इस आवाजाही की छेड़छाड़ बड़ी दिलचस्प होती।
यात्री जी ने अपनी लंबी रचनात्मक यात्रा में साठ के आसपास किताबें लिखीं, बीसियों शोधार्थियों ने उन पर काम किया और उनमें से कुछ ने उन्हें पुस्तकाकार छापा भी, कई पत्रिकाओं ने उन पर अंक निकाले, किसी लेखक को संतुष्टि देने के लिए पर्याप्त होना चाहिए, पर वे निरंतर असंतुष्ट रहे। उनके द्वारा दिए गए कई साक्षात्कार हिंदी के स्थापित आलोचकों द्वारा अपनी उपेक्षा की शिकायतों से भरे पड़े हैं। उनकी शिकायतों में दम भी था। कमलेश्वर की अंतरंग मंडली के एक सदस्य, अपने समय की सबसे महत्वपूर्ण कहानी पत्रिका सारिका  के नियमित लेखक होने के बावज़ूद उन्हें वह सब नहीं मिला, जिसके वह अधिकारी थे। बहरहाल, एक लेखक के रूप में उनका मूल्यांकन तो समय करेगा, मैं तो आज उन्हें एक मनुष्य के रूप में याद करना चाहता हूं और मुझे यह कहने में अतिशयोक्ति नहीं लग रही कि वह एक अद्भुत मनुष्य थे।

रवींद्र कालिया ने 1990 के दशक में यात्री जी पर अपने संस्मरण लिखते समय जिस ऊंचा कद, गोरे रंग, काले बाल, घुटनों के नीचे तक सफेद लंबा कुरता, ढीला पायजामा, कंधे पर समाजवादी झोला, पीछे-पीछे कुत्तों की लंबी कतार, गाजियाबाद की किसी सड़क पर लंबे-लंबे डग भरते हुए, जिस आदमी की तस्वीर खींची थी और जो बात-बात में जिंदादिली से ठहाके लगाता था, मैं उन्हीं यात्री जी से 1985 में पहली बार मिला था और वही छवि हमेशा मेरी स्मृति में बसी रही। इसलिए कई वर्षों से जिस व्यक्ति को बिस्तर पर असहाय लेटे छीजता देख रहा था, उसे इस रूप में स्वीकार करना बड़ा मुश्किल सा लगता ।
पिछले छह-सात वर्षों से यात्री जी बिस्तर पर पड़े थे। हर बार उनके पास जाने पर एहसास होता कि उनके शरीर का धीरे-धीरे क्षय हो रहा है। अपने बहुत से करीबियों को मैंने ऐसी ही कारुणिक स्थिति में देखा था, पर उनकी असहायता तो अंदर तक छील देने वाली थी। कई कारण थे। उनका सुदर्शन व्यक्तित्व किसी डूबते सूरज सा आभामय हो गया था और एक ऋषितुल्य सफेद दाढ़ी के पीछे से दो बेधती आंखें आपको बेचैनी से भर देती थीं। हिलने-डुलने से माजूर और बोलने की असमर्थ सी कोशिश करते शरीर की सबसे बड़ी यंत्रणा उसकी स्मरण शक्ति थी, जो अभी भी पहले जैसी ही सतर्कथी। किसी स्थान, व्यक्ति या घटना की विस्मृति उन्हें व्याकुल करती। उन्होंने अपने पास एक डायरी और कलम रख ली थी और जिद कर भूले नाम या चेहरे याद करने की कोशिश करते। 

कभी देर रात परिवार के किसी बच्चे का फोन आता कि वे किसी नाम को भूल गए हैं और अस्पष्ट से संदर्भ देकर मुझसे मालूम करने को कह रहे हैं। सामने पाकर भी कई बार मुझे किसी बिसरे प्रसंग को दोहराने को कहते। अगर मैं बता पाता, तो वह थके चेहरे पर झलकने वाली खुशी के साथ डायरी में उसे दर्ज कर डालते। पिछले कुछ साल से यह डायरी उनके तकिए के बगल में पड़ी रहती। उसे लेकर बैठना चाहता हूं, ताकि समझ सकूं कि एक बड़ी रचनात्मक बेचैनी आसन्न मृत्यु के सामने किन स्मृतियों के साथ जीना चाहती थी। 
मुझे एक लेखक से ज्यादा बड़ा उनका मनुष्य वाला रूप लगता था। रवींद्र कालिया ने कुत्तों के लिए उनके कंधे पर लटकाए झोलों में रोटी लेकर चलने का जिक्र अपने संस्मरण में किया है, पर उनके संपर्क में आने वाला एक बड़ा समाज उनकी सज्जनता के गीत गाता रहा है। यह देखकर अद्भुत लगता था कि बीमारी के दौरान जब तक वह बोलने लायक रहे, उनकी चिंता के केंद्र में अपना समय और समाज ही रहा। देश-दुनिया में आजकल जो हो रहा है, वह क्यों हो रहा है और हमें जो दुनिया मिली है, उसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है, यही वे प्रश्न थे, जो सात दशकों के अपने लेखन में पूछते रहे थे और उनकी सतर्क चेतना व कमजोर शरीर को परेशान करते रहते थे। 
मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि तीन वर्ष पहले जब उनकी आवाज समझ में आ सकती थी , जिस आखिरी किताब का उन्होंने मुझसे जिक्र किया, वह रसूल हम्जातोव की मेरा दागिस्तान  थी। वह उसे लेखकों की नोटबुक कहते थे और मेरे समेत हर लेखक को बार-बार पढ़ने की सलाह देते थे। वह हिंदी समाज व लेखक के आपसी रिश्तों को समझने में भी मदद करते थे। जहां ज्यादातर लेखकों से आस-पड़ोस बेखबर रहता है, वह ऐसे लेखक थे, जिनका पता 1980 के दशक के अपेक्षाकृत छोटे गाजियाबाद में रेलवे स्टेशन के रिक्शे वाले से आस-पड़ोस के चाय, पान वालों से आप पूछ सकते थे। यह शायद खुद को सामान्यजन से जोड़ने के उनके स्वभाव से संभव हुआ था। 

इन दिनों उनसे अपनी मुलाकात के कई मार्मिक प्रसंग हैं। मैंदो-तीन महीने में एकाध चक्कर उनके घर के लगा आता था। त्रासदी यह थी कि उनके बिस्तर पर पड़े रहने के दौरान दो बेटियों और पत्नी की मृत्यु हुई और उन्होंने बिस्तर पर पड़े-पड़े ही उनसे विदा ली। एक बार मेरा हाथ पकड़े उनके झर-झर आंसू बह रहे थे। अस्फुट स्वरों में वह एक ही वाक्य बार-बार दोहरा रहे थे, अब मुझे इस यातना से मुक्ति मिलनी चाहिए। अपने प्रिय ओम प्रकाश गर्ग से बमुश्किल कहा गया यह वाक्य दिल को छील देने वाला था, ..मुझे इस सलीब से उतार लीजिए, गर्ग साहब। वह सलीब से उतरे जरूर पर लंबी यातना झेलने के बाद।
(ये लेखक के अपने विचार हैं) 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें