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उन्हें जरूरी लगाम से परहेज क्यों

सोशल मीडिया के क्षेत्र में हाल ही में दो अलग, लेकिन महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं। एक ओर, सरकार ने सामग्री (कंटेंट) पर अपने एकतरफा विचारों के लिए ट्विटर पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, एक अन्य मोर्चे पर...

उन्हें जरूरी लगाम से परहेज क्यों
Manish Mishraप्रांजल शर्मा, डिजिटल नीति विशेषज्ञThu, 27 May 2021 11:35 PM
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सोशल मीडिया के क्षेत्र में हाल ही में दो अलग, लेकिन महत्वपूर्ण घटनाक्रम हुए हैं। एक ओर, सरकार ने सामग्री (कंटेंट) पर अपने एकतरफा विचारों के लिए ट्विटर पर सवाल उठाए हैं। दूसरी ओर, एक अन्य मोर्चे पर वाट्सएप (फेसबुक के स्वामित्व वाले) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में भारत के नियामक कानूनों को चुनौती दे दी है। आइए देखें कि इन दोनों घटनाओं में क्या समानता और क्या अंतर है। विवाद लंबे समय से चल रहा है, लेकिन अभी जो अलग व नया है, उससे हम शुरुआत कर सकते हैं। वाट्सएप ने अपने नए गोपनीयता नियम घोषित किए हैं, जो उसे यूजर्स अर्थात उपयोगकर्ताओं की व्यक्तिगत सूचनाएं जुटाने और अपने ग्राहकों (कंपनियों) को देने की अनुमति देंगे। फेसबुक अब वाट्सएप, इंस्टाग्राम और मैसेंजर का मालिक है और वह इन सभी के यूजर्स की सूचनाओं को जुटाना चाहता है। ऐसे नियमों को लेकर भारत सरकार ने फेसबुक पर सवाल खडे़ किए हैं।
सरकार फर्जी और दुर्भावनापूर्ण सूचनाओं के तेज प्रसार को लेकर भी चिंतित है। इस संबंध में उसने फेसबुक और वाट्सएप को एक प्रावधान करने के लिए कहा है, जहां जरूरत पड़ने पर सामग्री या कंटेंट केप्रवर्तक या मूल लेखक की पहचान की जा सके। जहां तक दो लोगों के बीच के संदेश का प्रश्न है, तो वे सुरक्षित हैं और सरकार की मांग से प्रभावित नहीं होंगे। पर कुछ मामलों में एक नियत प्रक्रिया के तहत सरकार जानना चाहती है कि कौन ऐसे कंटेंट तैयार कर रहा है, जो आपराधिक या हानिकारक हो सकते हैं। नए आईटी नियमों में एक ‘ट्रेसबिलिटी क्लॉज’ शामिल है, जिसके तहत अधिकारी सूचना के पहले प्रवर्तक का पता लगाने के लिए किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से सूचनाएं मांग सकेंगे। वाट्सएप का कहना है, उसकी तकनीक इसकी इजाजत नहीं देती और उसका यह भी दावा है कि इससे उपभोक्ता की निजता को ठेस पहुंचेगी। हालांकि, फेसबुक जैसी कंपनी के ऐसे विचार को मानना मुश्किल है। उसने तो निजता पर हमला करने और व्यक्तिगत डाटा बेचने का व्यवसाय किया है। यदि वाट्सएप के दावे के अनुसार, तकनीक ‘ट्रेसबिलिटी’ (कंटेंट के मूल लेखक की खोज) की अनुमति नहीं देती, तो उसे इसका समाधान खोजना चाहिए, जो ‘ट्रेसबिलिटी’ को संभव कर सके। अब ट्विटर के मुद्दे पर नजर डालते हैं। सवाल है, क्या कॉरपोरेट मुख्यालय में बैठे कुछ लोग तय कर सकते हैं कि दुनिया के लिए अच्छी सामग्री क्या है? जनवरी 2021 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को हटाने के लिए ट्विटर, फेसबुक साथ आ गए थे। क्या ये कंपनियां एकतरफा फैसले कर सकती हैं, किसे मंजूरी हो और किसे नहीं? ऐसी कंपनियों के आलोचकों के पास उनके पक्षपात और अपारदर्शी फैसलों को लेकर कई वाजिब सवाल हैं। हर लोकतंत्र में सेंसरशिप और अभिव्यक्ति की आजादी का मुद्दा कानून की उचित प्रक्रिया द्वारा तय होता है। विशिष्ट कानून, न्यायपालिका और सरकारी एजेंसियां एक प्रक्रिया के तहत अभिव्यक्ति की आजादी के मुद्दों पर फैसले करती हैं। क्या हम कुछ कंपनियों के कुछ लोगों को दुनिया के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तय करने को मंजूरी दे सकते हैं? ट्विटर ने तो सामग्री के साथ छेड़छाड़ या ‘मैनुपुलेटेड मीडिया’ का टैग जोड़ना शुरू कर दिया है, पर ऐसे फैसले कैसे लिए जाते हैं, इसमें कोई पारदर्शिता नहीं है।
आइए अब उन मुद्दों पर नजर डालते हैं, जो भारत में वाट्सएप और ट्विटर से जुडे़ विवादों के बीच आम हैं। मूल रूप से हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि भारत सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनियों के लिए सबसे बड़ा खुला बाजार है। चीन ने इन कंपनियों को ब्लॉक कर रखा है और अपनी अलग घरेलू सोशल मीडिया कंपनियां बना रखी हैं। इसलिए इन कंपनियों के पास अपने विस्तार के लिए केवल भारत जैसा क्षेत्र है। भारत की आबादी और बाजार का आकार अमेरिका और यूरोप से भी बड़ा है। ये कंपनियां बिना किसी नियम-कानून के इन बाजारों में अपना विस्तार चाहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के सभी लोकतंत्र अब इन कंपनियों की ताकत पर सवाल उठा रहे हैं और चुनौती दे रहे हैं। भले ही ट्विटर और फेसबुक की डोनाल्ड ट्रंप को हटाने में भूमिका रही हो, लेकिन नए राष्ट्रपति जो बाइडन की सरकार भी इन कंपनियों की लगाम कसने में लगी है। बाइडन प्रशासन को भी पता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गोपनीयता तय करने की शक्ति निजी कंपनियों पर नहीं छोड़ी जा सकती। यूरोप ने सख्त कानून बनाए हैं। अमेरिकी सीनेट ने भी सोशल मीडिया दिग्गजों से सवाल किए हैं। अमेरिका में इन कंपनियों को छोटे उद्यमों में बांट देने के लिए बड़ा आंदोलन चल रहा है, ताकि वे अपने बडे़ आकार का दुरुपयोग न कर सकें। भारत को इन कंपनियों पर सख्त होना पड़ेगा और ऐसे नियमों को लागू करना होगा, जो समाज के लिए अच्छे हों। अगर अमेरिका और यूरोपीय संघ इन कंपनियों के नियमों को सख्त कर सकते हैं, तो भारत भी कर सकता है। कुछ आलोचक भारत पर उत्तर कोरिया जैसा बनने या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का आरोप लगा रहे हैं। यह बिल्कुल भ्रामक है। एक समाज के रूप में हमें मांग करनी चाहिए कि एक उचित, पारदर्शी प्रक्रिया और स्वतंत्र एजेंसी द्वारा सोशल मीडिया प्रबंधित हो। यह एजेंसी तय करे कि स्वतंत्रता और गोपनीयता क्या है। ट्विटर और वाट्सएप को भी ऐसी कानूनी प्रक्रिया मंजूर करनी चाहिए, ताकि सरकार द्वारा मांगे जाने पर जरूरी सूचनाएं उसे मुहैया हों। याद रहे कि दूरसंचार सेवा ऑपरेटर भी सरकार द्वारा मांगे जाने पर प्रासंगिक सूचनाएं साझा करते हैं, और इसकी बदौलत लाखों अपराध सुलझे हैं। जब सरकार ने मांग की थी कि प्रत्येक सिम कार्ड खरीदार को एक पहचान दस्तावेज जमा करना होगा, तब दूरसंचार कंपनियों ने विरोध किया था। लेकिन सरकार ने उन्हें मजबूर कर दिया और हम अब उसके फायदे देख सकते हैं। फोन टेप के लिए भी एक तय प्रक्रिया है और सरकार में कोई न कोई ऐसे फैसलों के लिए जवाबदेह होता है। ऐसा नहीं हो सकता कि निजी कंपनियां अपने फायदे के लिए हमारी निजता पर हमला करें और जब चाहे, हमारे डाटा का इस्तेमाल करें। एक उचित प्रक्रिया और कानूनों के साथ सरकार को अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए सूचना मांगने का पूरा अधिकार है। निजता और अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई भी फैसला निजी कंपनियों को नहीं, राष्ट्रीय संस्थानों को लेना चाहिए। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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